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नोटबन्दी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर व जन मानस पर असर:- लेखक:- मनीष पाण्डेय अधिवक्ता पत्रकार एम0काॅम, एल0एल0बी0, एम0बी0ए0 (एच0आर0) 8 नवम्बर की रात जब अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपना सम्बोधन देना शुरू किया , तो एक बारगी जनता का मन कई आंशकाओं से ग्रसित हो गया, अचानक अफवाहो का बाजार गर्म हो गया, जितनी मुँह उतनी बाते, इन कई अंजानी आशंकाओं से भयाक्रांत हो लोगन्यूज चैनलो से चिपक कर बैठ गये, किसी को स्वप्न में उम्मीद नहीं थी कि प्रधानमंत्री मोदी देश में 500 - 1000 के नोट बंद करने जा रहे है। देश की जनता को लगा कि लगता है कि मोदी जी पाकिस्तान के साथ युद्ध की घोषणा करने जा रहे है वे लगातार आक्रमक अंदाज में बोले जा रहे थे और लेाग बस अलपक निगाहांे से टी0वी0स्क्रीन को निहारे जा रहे थे फिर जैसे ही उन्होने नोटबंदी की घोषणा की , उसके परिणाम व प्रक्रिया स्वरूप जो हँगामा मचा, उसे पूरे विश्व ने बखूबी से देखा, क्या कालाधनिये, भ्रष्टाचारी, हवालिये, आर्थिक आतंकिये, सभी बस किम्कर्तव्यविमूढ़, भौजक्के, विवकशून्य होकर रह गये, बस सबके मँुह से यही निकला अरे यह क्या कर दिया मोदी ने? इस ल...