राष्ट्रहित के लिए आवश्यकःसमान नागरिक संहिता
लेखक - मनीष कुमार पाण्डेय अधिवक्ता पत्रकार
        एम0काॅम0. , एल0एल0बी0, एम0बी0ए0 (एच0आर0)
  प्रदेश प्रवक्ता अखिल भारत हिन्दू महासभा उ0प्र0.
शरीयत अदालतो मुस्लिम पसर्नलाॅ बोर्ड जैसी संस्थाओं पर लगे बैन
कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक समारोह में कहा था है कि वे चाहते है कि देश में ऐसे कानूनोे को वे समाप्त करना चाहते है जिनकी प्रासंगिकता वर्तमान समय में लगभग समाप्त हो चुकी है उन्होने यह भी कहा कि ऐसे कानूनो को एक दिन में एक कानून समाप्त करने की उनकी मंशा है अर्थात वे चाहते है कि एक दिन में एक कानून की समाप्ति की जाऐ प्रधान मंत्री जी की सोच बिल्कुल सही है हम भारतवासी सैकड़ो वर्षो से ऐसे कानूनो को क्यों ढोऐ जो घिस पिट चुके है जो सभ्य समाज के लिए नासूर बन चुके है ऐसे कानून जो हमें राष्ट्रीयता नही बल्कि गुलामी,राष्ट्रद्रोह की ओर ढकेलती हो निश्चित रूप से ऐसी व्यवास्थाओं कानूनो को समाप्त कर उसकी जगह नये कानूनोे का सृजन करना ही राष्ट्रहित के लिए आवश्यक होगा परन्तु तब बड़ा आश्चर्य होता है जब राष्ट्र के लिए नासूर बन चुके अनु0 370 की समाप्ति की बात आती है तो प्रधानमंत्री जी प्रायः मौन ही साध लेते है सुप्रीम कोर्ट के यह कहने के बावजूद की केन्द्र सरकार देश में समान नागरिक संहिता लागू करे तब प्रधान मंत्री नरेन्द्रमोदी उस बात पर क्यो ध्यान नहीं देते है भारत एक लोकतंान्त्रिक देश है संविधान के अनु0 14 के अनुसार धर्म मूलवंश भाषा लिंग जाति आदि के आधार पर भेदभाव की आज्ञा संविधान नही देता है फिर ऐसी दशा में जब कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो वहाॅ धारा 370 लागू करने का भाला क्या औचित्य यह फैसला राष्ट्रघाती कदम नही है तो क्या है? सामान्य अर्थाे में समान नागरिक संहिता या यूनिफार्म  सिविल कोड का आशय भारत के सभी नागरिकों के लिए बिना भेदभाव किये समान विधि बनाये जाने से है अगल-अगल पंथो या धर्मो के लिए अलग-अलग कानून न होकर एक समान कानून बनाया जाये यही यूनिफार्म सिविल कोट का मुख्य उद्देश्य व भावना है  संविधान में दिये नीति निर्देेशक तत्व जो कि भाग 4 अनु0 36 से 51 में दिये गये है के अनु0 44 में राज्य को निर्देश दिया गया है कि भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करंे एस0 आर0 बोमई बनाम भारत संध ए0आई0आर0 1994 एस0सी0 1918 में सुप्रीम कोर्ट ने संसद में समान सिविल सहिता बनाने और लागू करने के अधिकार को मानते हुए सरकर से यह अपेक्षा की थी कि वह राष्ट्रीय एकता के हित में कानून बनाये उस समय न्यायालय ने खेद प्रकट करते हुए कहा था कि अनुच्छेद 44 पर कोई कार्यवाही नहीं हुई थी इसी प्रकार सरला मुद्गल बनाम भारत संघ ए0आई0आर0 1995 एस0सी0 1531 में दोबारा सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने की सिफारिश की थी इसी प्रकार पन्ना लाल बंशीलाल पिट्टी बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य 1996 (2) एस0सी0सी0 498 में भी न्यायालय ने धीरे धीरे सुधार करते हुए यूनिफार्म सिविल कोड की ओर बढ़ने की बात कहते हुए यह सुझाव दिया था कि अच्छा होगा यदि सुधार संम्बन्घित सुझाव समाज अथवा संप्रदाय के भीतर से ही आये कामन सिविल कोड अथवा यूनिफार्म सिविल कोड के विषय में अहमद खान बनाम शाहबानों ए0आई0आर0 1985 एस0सी0 945 को समझना बेहद अहम हेागा जिसमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिये मुस्लिम महिला अधिनियम 1996 को बनाया गया शाहबानो का निकाह 1932 में अहमद खान के साथ हुआ था निकाह से 3 पुत्र और 2 पुत्रियां हुई  1975 में अहमद खान ने शाहबानो को ससुराल से निकाल दिया तब 1978 में शाहबानों ने अहमद खान विरूद्ध दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत विद्धान न्यायाधीश प्रथम श्रेणी मजिस्टेªट इन्दौर की अदालत में 500 रूपये भरण पोषण हेतु वाद दायर (पिटीशन फाईल) किया था अहमद खान द्वारा नवम्बर 06 1978 में शाहबानों से अप्रतिसंहरणीय तलाक ;सततमअवबंइसम जंसंुद्ध ले लिया अहमद खान ने अपनी पिटीशन पर प्रतिरक्षा का यह अधिवाक दिया कि उसके द्वारा विवाह विच्छेद कर लेने के कारण शाहबानों उसकी पत्नी नहीं रही है अतः पत्नी के भरण पोषण पर उसकी कोई बाध्यता नही थी उसने यह भी अधिवाक् किया कि उसने पिछले दो वर्षो तक 200 रूपये प्रतिमाह की दर से स्त्री धन की शक्ल में धनराशि दी थी तथा इद्दत की अवधि में स्त्री धन के शक्ल में उसने शाहबानों को 3000 रूपये न्यायालय में जमा किये थे तब अगस्त 1979 मंे विद्वान जज ने गुजारे के रूप में 25 रूपये प्रतिवर्ष का शाही भत्ता देने का आदेश शाहबानों को दिया अहमद खान ने आरेाप लगाया कि वह अपने पेशे से 70000 रूपये प्रतिवर्ष कमाता है जुलाई 1980 मंे शाहबानों की पुर्नर्विचार की अर्जी पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय नें गुजारे की राशि बढ़ाकर 179.20 रूपये कर दी उच्चतम न्यायालय ने जब शाहबानो ने अपील की तो मुख्य न्यायमूर्ति श्री वाई0बी0चन्द्रचूड के अतिरिक्त न्यायमूर्ति  श्री डी0ए0देशाई न्यायमूर्ति श्री ई0एस0वेंकटारमैय्या , न्यायमूर्ति डी0चिन्नपा रेड्डी , तथा न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र नें पति की अपील को खर्चे के साथ खारिज करते हुए कहा की शाहबानों यदि चाहे तो दण्ड प्रक्रिया सहिता की धारा 127 (1) के तहत भरण पोषण के भत्ते में वृद्धि का आवेदन कर सकती है विद्धान न्यायाधीष ने यह भी कहा कि श्क्या मुस्लिम पर्सनल कानून पति पर अपनी तालक शुदा पत्नी के भरण पोषण के प्रबन्ध करने की कोई जिम्मेदारी नहीं डालता है निसंन्देह मुस्लिम पति को भले बुरे या अकारण भी जब अपनी इच्छा हो अपनी बीबी को छोड़ देने की सुविधा प्राप्त है परन्तु क्या इस सुविधा का सारा मोल इद्दत के काल में एक अदना सा भत्ता मात्र है? और क्या कानून अपनी असमानताओं में इतना निर्मम है कि इद्दत की अवधि में अपनी तालाकशुदा औरत के भरण पोषण के लिए पति जो कुछ दे तो बस क्या इतना तथ्य ही पर्याप्त है कि उसने जो कुछ दे दिया वह चाहे कितना भी कम क्यो न हेा क्या मुस्लिम कानून में बीबी को तालाक देने पर कोई धनराशि देने का प्रावधान है।श् शाहबानों के केस में देश में समान नागरिक संहिता कानून बनाने के लिए तेजी से सोचा जाने लगा एक देश दो विधान की आवश्यक्ता भला भारत में क्यों जब देश के सभी नागरिकों के लिए भारतीय कानून न्याय करने में सक्षम है तो शरीयत कानूनों की भला क्या आवश्यक्ता वो कानून जिसकी आड़ लेकर मुस्लिम महिलाआंे पर जुल्म कियें जाये ऐसी शरीयत व्यवस्थओं को खत्म करने की परम आवश्यकता है डा0 ताहिर महमूद नें अपनी पुस्तक मुस्लिम पर्सनल लाँ मंे भारत के सभी नागरिकों के लिए यूनिफार्म सिविल कोड बनाने की बात कही है इसी प्रकार डा0 पारस दिवान नें अपनी पुस्तक मुस्लिम लाँ इन मार्डन इण्डिया में कहा है कि श्जब  कोई शादी तलाक से खत्म हो जाती है तो इद्दत की मियाद में औरत गुजारे के लिए हकदार होती है इद्दत की मियाद खत्म होने पर औरत किसी भी हालात में गुजारे की हकदार नहीं होती मुस्लिम पर्सनल लाँ खाबिन्द के उपर उस औरत के गुजारे की कोई जिम्मेदारी नहीं डालता जिसे वो तलाक दे चुका है।श् जब शाहबानों का यह क्रान्तिकारी फैसला आया तो देश के तथाकथित मुल्ले मौलवियों मुस्लिम राज नेताओं ने इस फैसले का बड़ा विरोध किया था शरीयत को भारतीय कानून से ऊपर बताया था हमे यह समझना आवश्यक होगा कि इस देश में मुसलमान समान नागरिक कानून को क्यों नहीं लागू करवाने चाहते है इस विषय पर हमें सर्वप्रथम शरीयत व्यवस्थाओं कानूनों तथा इन कानूनों को लागू करने की जोर दार वकालत करने वाले मुस्लिम पर्सनल लाँ बोर्ड को समझना आवश्यक होगा समान नगरिक संहिता पर बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि जब सभी धर्माें के लिए अलग-अलग कानून होगा तो देश धर्मनिरपेक्ष क्यों और कैसे रहा? अक्सर यह कहा जाता है और समय समय पर यह सिद्ध भी हुआ है कि मुस्लिम जो रूढियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ है अत्याधिक धर्मभीरू है जो सम्पूर्ण विश्व को शरीयत के आधार पर इस्लामीकरण का सपना देख रहा हो को आधुनिक्ता व विकाश भला कैसे पसन्द हो सकता है शरीयत उसके लिए बड़ा है भारतीय कानूनों के प्रति न उसकी कोई आस्था है और ना ही विश्वास अक्सर इलैक्ट्रानिक टी0वी0 चैनलो पर जो मुस्लिम विद्धान भारतीय कानूनों के प्रति अपना विश्वास जताते हुए दिखलाई पड़ते है वह उनका मात्र दोमुहाँपन है सच्चाई  से कोसो दूर है इसी लिए जब मुसलमानों के विकास हेतु आधुनिकीकरण, यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने की बाते की जाती है तो मुसलमानों का एक बहुत बड़ा वर्ग उसके विरोध में हमेशा तैयार खड़ा रहता है उदाहरण के रूप में आप इसे यू समझ सकते है कि जब जब राष्ट्रवादी सरकारों ने मदरसों के आधुनिकीकरण की बातें की है तो न जाने क्यों बहुत से मदरसों ने इसका बड़ा विरोध किया इसी तरह जब जब देश में यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने की बाते सामने आयी तो मुस्लिम वर्ग द्वारा इसे नकारते हुए शरीयत को ही मानने की बातें कहीं गयी है यह शरीयत व्यवस्थायें क्या हैं इस पर संक्षेप में प्रकाश डालना आवश्यक होगा। मूल रूप से शरीयत सातवी शताब्दी में अरब मुल्को से आया किन्तु भारत में यह अंग्रेजों द्वारा अपनी तुष्टीकरण की नीति के तहत इसे 1937 में लाया गया इसकी प्रक्रिया की शुरूआत 1772 में ब्रिटिश गवरनर जनरल वारेन  हैस्टिंग्स के नाम पर योजना से हुई जो कालान्तर में शरीयत के रूप में लागू की गयी 1929 में जमीयत अल-उलेमा में बाल विवाह रोकने के विरूद्ध मुसलमानों को अवज्ञा आन्दोलन में शामिल होने की अपील की इस आन्दोलन का अन्त उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गयी जब मुसलमानों द्वारा सम्पूर्ण विश्व का इस्लामीकरण  करने के उद्देश्य से विश्व को दारूल हरब से दारूल इस्लाम बनाने की बात होती है तो कही न कहीं पूरे विश्व को शरीयत से चलाने की बात सामने आती है अधिकतर मुस्लिम कामन सिविल कोड को मुस्लिम संस्कृति के लिए घातक मानते है क्योंकि अगर देश में कामन सिविल कोड लागू हो गया तो शरीयत कानून की समाप्ति निश्चित रूप से है देश में शरिया कानूनों , व्यवस्थाओं को कोई लीगल मान्यता नहीं है विरोध कई स्तरों पर है शरीयत जो कुरान व हदीस पर आधारित व्यवस्थाएँ है जिन्हें मानना हर मुसलमान के लिए आवश्यक है शरीयत को आधार बनाकर मुल्ले मौलवी किस तरह से महिलाओं का शोषण करते है इसकी एक बानगी तीन बार तलाक या जुबानी तलाक में साफ साफ दिखाई पड़ती है विडम्बना यह है कि तलाक व भरण पोषण के विषय में कुरान कुछ कहता है और उसी कुरान व हदीस पर आधारित शरीयत व्यवस्थाऐ कुछ दूसरा ही राग अलापती है एक बड़ी प्रक्रिया का वर्णन करना आवश्यक समझता हूँ वह यह कि तीन बार जुबानी तलाक के बाद अगर वह महिला फिर से अपने पति के पास लौटना चाहती है तो उसे हलाला प्रक्रिया से गुजरना होगा हलाला के अन्तर्गत उस तलाकशुदा महिला को किसी दूसरे के साथ पहले तो निकाह करना होगा फिर उसके साथ एक रात गुजारनी होगी शारीरिक सम्बन्ध बनानें होगें उस व्यक्ति की पत्नी बनकर वह महिला रहेगी तब जब वह  दूसरा व्यक्ति उस महिला को फिर से तलाक दे देगा तब वह महिला अपने पहले पति के पास वापस लौट सकती है शरीयत एक प्रकार के और भी विवाह की अनुमति देता है इसे निकाह मुअक्कत अर्थात टाईम लिमिट मैरिज कहा जाता है जो खुले आम वैश्यावृत्ति को प्रोत्साहित करती है अरब के शेख अक्सर भारत आकर किसी गरीब मुस्लिम कन्या के साथ एैसे विवाह करते है और कुछ समय मौज मस्ती करते है और 3 बार तालाक बोलकर वापस अरब चले जाते है शरीयत एक और घृणास्पद व्यवस्था है जिसे हुदूद कहा जाता है इसके अनुसार यदि किसी मुस्लिम महिला के साथ बलात्कार होता है तो उस महिला के साथ चार पुरूष गवाह के रूप में होने चाहिए जो उसके साथ कृत्य की गवाही दे सकें अगर एैसा नहीं होता है तो सजा उस महिला को मिलेगी यह कानून भारत में भी लागू है मुसलमान शरीयत व्यवस्थाओं व फतवों से किस कदर बंधा हुआ है इसे निम्न उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है सर्वाेच्च न्यायालय नें एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने का आदेश जारी किया था उसी सम्बन्ध में एक रिसर्च स्काॅलर शुमाईला अंजुम नें तालाक व भरण पोषण भत्ते पर अपना सर्वे शुरू किया सर्वे में उसने तलाक व इद्दत पर कई प्रश्न पूछे जिसमें गुजारे भत्ते को सही ठहराते हुए औरतों को भी पुरूष की तरह तालाक देने की बात कही इस पर दरगाह आला हजरत के मौलाना मोहम्मद रजा कादरी तथा मजहबी सगंठन तालीम तहफ्फुज-ए-सुन्नियात  (टी0टी0एस0) ने इसका विरोध किया तथा मदरसा मंजरे इस्लाम से सुमाईला अंजुम के खिलाफ इस्लाम से बगावत का कुसूरवार ठहराते हुए फतवा जारी कर दिया पाठक गण यह बात आसानी से समझ सकते है कि जब देश में शरीयत अदालतें व्यवस्थाऐ मुस्लिम पर्सनल लाँ बोर्ड जैसी विध्वंशक आतंकी राष्ट्रदोही संस्थाए अस्तित्व में होगी तब तक युनिफार्म सिविल कोड भला कैसे लागू किया जा सकता है अतः यह कहना सही होगा कि कामन सिविल कोड लागू होने से पहले इन संस्थाओं अदालतों व्यवस्थाओं पर बैन लगाया जाना चाहिए मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड जो कामन सिविल कोड का सबसे बड़ा विरोधी है के विषय में लिखना सिर्फ समय की बर्बादी है शरीयत का समर्थन करने वाली मुस्लिम पर्सनल लाँ बोर्ड की उलटबशिया , मूर्खतापूर्ण  व तत्थों से परे बयानों की वजह से सुर्खियों में रहने की आदत सी हो गयी है पिछले दिनो ही आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाँ बोर्ड के मौलाना वली रहमानी ने जब मुस्लिम संगठनों इमामों को पत्र लिखकर यह कहा की हिन्दुत्व , ब्राम्हण वाद व वैदिक विचार धारा की वजह से इस्लाम खतरे में है तो उन्होने अपनी मूर्खतापूर्ण दूषित मानसिकता का परिचय देश के सामने दे दिया था इसी प्रकार मुस्लिम पर्सलन लाँ बोर्ड के ही अब्दुल रहमान कुरैशी जब अपनी दूषित मानसिकता से ग्रस्त होकर तथ्यों को नकारते हुए यह कहते है कि रामजन्मभूमि अयोध्या में नहीं बल्कि पाकिस्तान में है तो उनकी बुद्धिहीनता व मानसिक दिवालिया पन विश्व के सामने प्रकट हो जाता है सूर्यनमस्कार , योग आदि का विरोध करना मुस्लिम पर्सनल लाँ बोर्ड की फितरत में शामिल है विषय फिर वही घूम कर पहुच जाता है जहाॅ से शुरू हुआ था अर्थात् एक ओर जहाॅ सविधांन समानता की बातें करता है,धर्म मूल वशं जाति जन्मस्थान , लिंग के आधार पर विभेद न करने की बातें करता है किन्तु फिर भी संविधान मे दी गयी बातों को नकरते हुए विभेद होता है संविधान में कही से भी अल्पसंख्यक को कंही से भी नही परिभाषिय करता है फिर भी पूर्व प्रधांनमत्री मनमोहन सिंह देश के अर्थिक संसधानों पर सर्वप्रथम अधिकार मुसलमानों का है कहकर संविधान के किस अनुच्छेद का वर्णन करते है यह समझ से परे है ऐसे में अनुच्छेद 30 व 31 का भाला क्या औचित्य समना नागरिक संहिता जब लागू हो तो अनुच्छेद 30 व 31 को भी खत्म करना आवश्यक है। संक्षेप में संविधान में अनुच्छेद 30 जहाॅ शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और अनका प्रबन्ध का अधिकार अल्पसंख्यको को देता है वही अनुच्छेद 31 जो सम्पति के अधिकार को प्रदान करता है दोनो ही अनुच्छेद अल्पसंख्यकों को असीमित अधिकार प्रदान करते है सवाल यह उठता है कि जब सभी अधिकार अल्पसंख्यकों को लिए है तो बहुसंख्यकों के लिए क्या यह स्थिति उस दशा में अत्याधिक भयावह हो जाती है जब देश की सुप्रीम कोर्ट मुस्लमानों के लिए यह कहती है कि मुसलमान अल्पसंख्यक नही रहा तो मुसलमानों के लिए विशेष कानून,प्रविधान,सुविधाऐ भाल क्यों क्या ऐसी दशा में हमारे वोट बैंक व तुष्टीकरण में डूबे नेताओं, नीति निर्धाकांे को राष्ट्र हित में समान नागरिक संिहता लागू नहीं करनी चहिए क्या शरीयत अदालतों व व्यवस्थाअंों के सम्बन्ध में यह कहना सही होगा कि विश्व में इस्लामी आतंकवाद की जड़ अगर कही है तो वह कुरान,हदीस में है व कुरान व हदीस के आधार पर बनी शरीयत व्यवस्थाआंे है सुप्रीम कोर्ट भी शरीयत व्यवस्थाओं,कानूनोें को नही मानता है भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में शरीयत की उलट बासी मुर्खता पूर्ण फतवों का कोर्ट स्थान नही है सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति चन्द्रमौलि कुमार प्रसाद व न्यायमूर्ति पिनाकी चन्द घोष की पीठ ने अधिवक्ता विष्व लोचन मदान की याचिका पर यह ऐतिहासिक फैसला दिया है कि ‘‘कानूनों के जरिये स्थापति संस्था का आदेश बाध्यकारी होता है और उसका पालन न करने के परिणाम भुगतने पड़ते है शरई अदालत दारूल कजा या काजी कोर्ट ऐसी संस्थाऐ नही है दारूल कजा का न तो कानून के जरिऐ गठन हुआ है और ना ही सक्षम विधायिकाक से मान्यता ही प्राप्त है स्वतन्त्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था में नकी कोई जगह नही है।‘‘ शरीयत के मनमाने फैसले किस प्रकार  राष्ट्रहित के लिए घातक है यूनिफार्म सिविल कोड की राह में रोडा हे इस पर चर्चा, लेखन फिर कभी फिलहाल इतना समझना आवश्यक है कि ज्यादतर मुस्लिम कामन सिविल कोड का विरोध इसलिए ही करते है क्योकि कुरान व हदीस पर आधारित शरीयत में आगे सोच ही नही सकते यह कहना भी गलत नहीं होगा कि विश्व में लगभग सभी मुस्लिम आतकीं संगठन शरीयत कानूनों को मानकर विश्व को इस्लामीकरण करने का सपना पाले बैठे है, इस्लामिक राष्ट्र बनाने का दुवास्वपन देखने वाले आई0एस0आई0एस हो या फिर चाहे नाइजीरिया का बोकोहराम मुस्लिम वर्ग द्वारा कामन सिविल कोड का विरोध क्यो और किसलिए किया जा रहा है आसानी से समझा जा सकता है। एक बात पर और ध्यान दियें जाने की आवश्यकता है कि अक्सर भारत वर्ष में छोटी छोटी घटनाआंे को लेकर जिस तरह मुस्लिम जेहादी मानसिक्ता से ग्रसित होकर सड़कांें पर उतर कर आतंक फैलाते है उन्हें रोकनें के लिए भी कामन सिविल कोड एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है।
अंत में यह कहना सही होगा कि विभिन्न धर्माे में व्याप्त कुरीतियांे,परम्पराओं को समाप्त करने का समय आ चुका है इसकी शुरूआत विवाह, सम्पति-विरासत का उत्तराधिकार दत्तक ग्रहण , भरणपोषण तलाक आदि विषयों पर यूनिफार्म सिविल कोड लागू होना ही चाहिए इससे निश्चित रूप से सभी धर्माें पंथों मजहबों के बीच न सिर्फ राष्ट्र भावना पनपेगी बक्कि सच्चे अर्थों  में एकता सदभाव भी पैदा होगा।

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