अल्लामा इकबाल की मजहबी कट्टर मानसिकता का बुरा परिणाम भुगतता भारत?

अल्लामा इकबाल की कट्टर मजहबी विचारधारा का बुरा परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है?
मनीष पांडेय
उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद स्थित फरीदपुर के कमला नेहरू कम्पोजिट विद्यालय में पिछले दिनों एक मुस्लिम शिक्षक वजीरउद्दीन और मुस्लिम शिक्षिका द्वारा विद्यालय के बच्चों को एक उर्दू कविता का गायन"लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी"प्रतिदिन कराया जाता है, अधिकतर यह कविता मदरसों में गाई जाती है, सवाल यह नहीं है कि कविता या नज्म उर्दू में है, सवाल यह भी नहीं कि वह एक हिंदू नाम वाले विद्यालय में गाई जाती है पर सवाल यह उठता है कि इस उर्दू कविता को लिखने वाले मोहम्मद अल्लामा इकबाल जिनकी वजह से पाकिस्तान शब्द का जन्म हुआ जिनके कारण भारत विभाजन की लकीरें खींची गई और जिनकी मजहबी कट्टरता के कारण सांप्रदायिक दंगों में लाखों हिंदुओं का कत्ल कर दिया गया ऐसे व्यक्ति की कविता का गायन भारत के स्कूलों में भला क्यों? मोहम्मद अल्लामा इकबाल ने किसी समय सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा लिखा था किंतु कुछ समय बाद ही उन्होंने अपनी मजहबी कट्टरता का प्रदर्शन करते हुए तराना ए मिल्की के माध्यम से यह लिखा कि
चीन ओ अरबहमारा, हिन्दोसताँहमारा
मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारातौहीद की अमानत, सीनों में है हमारेआसाँ नहीं मिटाना, नाम ओ निशाँ हमारादुनिया के बुतकदोंमें, पहले वह घर ख़ुदा काहम इस के पासबाँ हैं, वो पासबाँ हमारातेग़ों के साये में हम, पल कर जवाँ हुए हैंख़ंजर हिलाल का है, क़ौमी निशाँ हमारामग़रिब की वादियों में, गूँजी अज़ाँहमारीथमता न था किसी से, सैल-ए-रवाँ हमाराबातिल से दबने वाले, ऐ आसमाँ नहीं हमसौ बार कर चुका है, तू इम्तिहाँ हमाराऐ गुलिस्ताँ-ए-अंदलुस! वो दिन हैं याद तुझकोथा तेरी डालियों में, जब आशियाँ हमाराऐ मौज-ए-दजला, तू भी पहचानती है हमकोअब तक है तेरा दरिया, अफ़सानाख़्वाँ हमाराऐ अर्ज़-ए-पाक तेरी, हुर्मत पे कट मरे हमहै ख़ूँ तरी रगों में, अब तक रवाँ हमारासालार-ए-कारवाँ है, मीर-ए-हिजाज़अपनाइस नाम से है बाक़ी, आराम-ए-जाँ हमाराइक़बाल का तराना, बाँग-ए-दरा है गोयाहोता है जादा पैमा, फिर कारवाँ हमारा
आधुनिक हिन्दी में अर्थ 
केन्द्रीय एशिया (इक़बाल के ज़माने में "चीन" का मतलब अलग था) हमारा है, अरब हमारा है, भारत हमारा है
हम मुसलमान हैं और पूरी दुनिया हमारा वतन है
हमारा नामोनिशान मिटाना आसान नहीं होगा
एकेश्वरवाद का ख़ज़ाना हमारे दिलों में है
काबा सबसे पहला स्थान है जिसे हमने मूर्तिपूजकों से मुक्त किया
हम इसके रक्षक हैं और ये हमारा रक्षक है
वर्धमान कटार हमारा राष्ट्रीय चिह्न है
हमारी उपासना की पुकार पश्चिमी दुनिया की घाटियों में गूँजती है
हमारी शक्ति किसी को नहीं रोक पाएंगे
हे आकाश! यह असत्यता हमें नहीं रोकेंगे
सौ बार के लिए तू ने हमारी परीक्षण ली है
हे आन्दलुसिया का बग़ीचा! तुझको वह दिन याद है?
जब हम तेरी डालियों पर बसे हुए थे
हे दजला की लहरें! तू भी हमें पहचानती है
तू आज तक हमारी कहानियों को सुनाती है
हे पवित्र भूमि! हम तुम्हारे लिए खून बहाने के लिए तैयार है
यह खून अभी भी हमारे रगों में है
हमारा इस आंदोलन के अगुआ हमारा अपना मुहम्मद है
उनके नाम से हमारे दिलों को सुख शान्ति मिलते है
इक़्बाल का यह गीत एक स्पष्ट पुकार है
ताकि हमारे यह आंदोलन जारी पर रखा जा सकता है
अल्लामा इकबाल वह व्यक्ति हैं जिन जिन्होंने सर्वप्रथम टू नेशन थ्योरी विचारधारा को जन्म दिया था पाकिस्तान शब्द का जनक भी मोहम्मद इकबाल को माना जाता है पाकिस्तान में मोहम्मद अल्लामा इकबाल को उम्माह का विद्वान भी कहा जाता है उम्माह का अर्थ होता है मुस्लिमों का शासन यह कैसी विडंबना है कि नवंबर 8 अट्ठारह सौ 77 को सियालकोट में जन्मे मोहम्मद अल्लामा इकबाल एक कश्मीरी ब्राह्मण थे जिनके दादा कन्हैयालाल सप्रू पिता रतनलाल सप्रू जो कि बाद में इस्लाम अपनाकर नूर मोहम्मद बन गए थे और उन्होंने इमाम बीवी नाम की महिला से निकाह मोहम्मद इकबाल की पिता रतनलाल सप्रू उन दिनों कश्मीर में अफगान गवर्नर के रेवेन्यू कलेक्टर के रूप में कार्य किया करते थे पैसे के लेनदेन में कुछ गड़बड़ हुई तो गवर्नर ने रतनलाल शत्रु के सामने दो विकल्प रख दिए सर्वप्रथम यह कि या तो सलाम कबूल कर लो और दूसरा यह कि सिर्फ तन से जुदा करने की तैयारी कर लो रतनलाल सब तूने भाई बस पहला विकल्प चुना अर्थात इस्लाम कबूल करने का बाद में उन्होंने इमामा बीवी से निकाह किया जिनसे इकबाल का जन्म हुआ मोहम्मद इकबाल की प्रारंभिक शिक्षा मदरसों में हुई थी इसलिए प्रारंभ से ही इकबाल मजहबी कट्टरता से ग्रसित थे, मोहम्मद अल्लामा इकबाल मसूदी द्वारा मुस्लिम लीग के अध्यक्ष पद पर रहते हुए 30 दिसंबर 1930 को इलाहाबाद अधिवेशन में पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव रखा था मोहम्मद अल्लामा इकबाल स्पष्ट रूप से यह मानते थे कि इस्लाम में राष्ट्रवाद का समर्थन कभी नहीं किया इकबाल ने पूरी दुनिया में रह रहे मुसलमानों को एक ही राष्ट्र के हिस्से ग्रुप मंत्री जिसके नेता मोहम्मद हैं जो इस्लाम के पैगंबर हैं अब सवाल ये उठता है कि अगर ऐसे व्यक्ति की कविता भारत के स्कूलों में पढ़ाई अथवा गवाही जाती है तो यह राष्ट्र के प्रति मुसलमानों की शत्रुता के भाव नहीं है क्या? इस पूरे आलेख लिखने के दौरान जो एक चीज मैंने महसूस की वह यह कि जो हिंदू इस्लाम में धर्मांतरण हो गए वह हिंदू सनातन धर्म के लिए कहीं अधिक खतरनाक साबित हुए जैसी फारूक अब्दुल्ला का परिवार जिनके परदादा बालमुकुंद कौल हुआ करते थे और जिनके पूर्वज रघुराम शत्रु एक सूफी के द्वारा इस्लाम पंथ में धर्मातरित हो गए थे आज कश्मीर में 90% से ज्यादा कश्मीरी मुसलमानों के पूर्वज हिंदू है जोकि कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए जिहादी मुसलमानों के साथ मिलकर जिहाद छेड़े हुए हैं एक और धर्म आमंत्रित हिंदू का नाम लेना यहां प्रासंगिक होगा वह थे पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना,जिन्ना का परिवार मुख्य तौर पर गुजरात के काठियावाड़ के पनेली गांव का रहने वाला था। उनके दादा का नाम प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर था और वो हिंदू था। - उनके दादा प्रेमजी भाई लोहना जाति से थे , जिन्ना के पिता पूंजा लाल टक्कर मछलियों का व्यापार करते थे लोहाना जाती एक कट्टर हिंदू जाति है, जो कि धार्मिक मान्यताओं को मानती है और उन्हें पुंजालाल ठक्कर के मछली के व्यापार से घोर आपत्ति थी, कालांतर में घरवालों के विरोध और लोहाना जाति के अन्य गणमान्य लोगों के विरोध के चलते पुंजालाल ठक्कर परिवार से अलग होकर इस्लाम पंथ को अपना लिया था, मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा किस तरह भारत विभाजन की नींव रखी गई किस तरह उनकी मजहबी कट्टरता के कारण लाखों हिंदुओं का कत्ल कर दिया गया इसका इतिहास बताएं जाने की आवश्यकता शायद नहीं है
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
प्रधान संपादक दमक टाइम्स 
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा

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