भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति में व्याप्त मित्रताओं का एक तुलनात्मक अध्ययन
मनीष पांडेय
आज पूरा विश्व फ्रेंडशिप डे मना रहा है पाश्चात्य संस्कृति सभ्यता से वशीभूत बहुत से भारतीय भी बिना समझे बिना जाने बूझे कि वास्तव में हम भारतीयों के लिए यह फ्रेंडशिप डे मनाने का भला क्या औचित्य है एक अंधी दौड़ एक भेङ चाल में शामिल हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह हमारे सर पर वेलेंटाइन डे हग डे रोज डे किस डे चॉकलेट डे आदि आदि डे यो का बुखार पूरी तरह सिर चढ़कर बोलता है फ्रेंडशिप डे भी उन्हीं बुखारो में से एक बुखार है जो आज लाखों करोड़ों भारतीयों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है वर्ष 1935 अमेरिका सरकार द्वारा एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है उस व्यक्ति की मृत्यु के गम में उसका दोस्त आत्महत्या कर लेता है बस उसी दिन से यह मूर्खतापूर्ण परंपरा पूरे विश्व में शुरू हो जाती है फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाने की जिसे आज भारतीय भी बिना जाने पूछे पूरे मनोयोग से मनाने में जुटे हुए दरअसल हम भारतीयों की समस्या हमेशा से यह भी की हम पाश्चात्य संस्कृति के चकाचौंध से हमेशा प्रभावित रहे हैं और प्रभावित भी सीमाओं के अंदर नहीं बल की सीमाओं से बाहर जाकर हमने बिना सोचे समझे पाश्चात्य सभ्यता को अपनाया दुर्भाग्य रहा कि हमने उनकी संस्कृतियों की बुरी आदतों को अपने जीवन में समाहित किया और अपनी भारतीय संस्कृति से दूर होते चले गए जी हां सच ही है कि हम पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने में इतना डूब गए कि अपनी ही संस्कृति को भुला बैठे हम भूल गए कि भारतीय परंपरा में मित्रता के अनुपम उदाहरण मौजूद हैं लेकिन कभी हमारा ध्यान उस ओर गया ही नहीं मैं समझता हूं कि पूरे विश्व में जितने उदाहरण भारतीय परंपराओं में हैं भारतीय संस्कृति में है वैसी मित्रता के उदाहरण पूरे विश्व के किसी कोने में चले जाइए शायद ही मिले अब भला कृष्ण और सुदामा की अद्भुत अनुपम और अविश्वसनीय मित्रता को भला कौन भूल सकता है एक ब्राह्मण और एक यदुवंशी कुलश्रेष्ठ के बीच ऐसी अनुपम दोस्ती जिसमें मात्र तीन मुट्ठी चावल के के बदले तीनो लोक न्योछावर करने पर उतर आए हैं हम कैसे भूल सकते हैं दुर्योधन और कर्ण के बीच की दोस्ती दो विपरीत विचारधाराओं का अदभुत मिलन अगर देखना हो तो दुर्योधन और कर्ण की मित्रता को देखना और समझना आवश्यक हो जाता है किस तरह एक शूद्र पुत्र को अपना मित्र मान लेना और पूरे जीवन उस मित्रता का निर्वहन करना अगर यह सीखना हो तो दुर्योधन और कर्ण की मित्रता हमारे सामने हमारी मानस पटल पर छा जाती है गांधारी और कुंती कहने को तो रिश्ते में देवरानी और जेठानी लगती थी और जिनके पुत्रों के कारण महाभारत का युद्ध हुआ किंतु पूरे जीवन उनकी मित्रता में कभी कमी नहीं आई कोई कटुता नहीं आई कहते हैं कि स्त्री और पुरुष के बीच मित्रता कभी हो ही नहीं सकती जो कुछ और गिरी हुई मानसिकता के लोग हैं अक्सर उनके मुंह से स्त्री पुरुषों की मित्रता के संबंध में कुछ अनर्गल प्रलाप आप अक्सर सुनते होंगे किंतु भारतीय परंपरा में कृष्ण और द्रौपदी की मित्रता का जो उदाहरण हमारे सामने मौजूद है शायद ही अन्यंत्र कहीं देखने को मिले स्त्री और पुरुष के बीच की मित्रता का एक अदभुत मिलन जहां कृष्ण अपनी मित्रता का मनसा वाचा और कर्मणा तीनों से पालन करते हुए दिखाई देते हैं और कदम कदम पर द्रोपति पर आए हुए संकटों को हरण कर लेते हैं एक और उदाहरण भारतीय परंपरा मैं मौजूद है सीता और त्रिजटा का जब रावण सीता को हार कर ले गया और अशोक वाटिका में रखा तो उनकी पहरेदारी के लिए राक्षसी त्रिजटा की नियुक्ति की सीता का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था मानसिक रूप से संभल दिलाने का कार्य अगर किसी ने किया तो उस समय त्रिजटा ही ने किया इस तरह एक अद्भुत दोस्त दो विपरीत विचारधाराओं की दोस्ती सीता और त्रिजटा के बीच विकसित हुई मैं फिर से वापस लौटता हूं आज के विषय फ्रेंड शिप पर कुल मिलाकर कहने का अर्थ मेरा मात्र इतना ही है कि जब जब हम अपनी भारतीय संस्कृति भारतीय परंपराओं भारतीय मूल्यों के विचारों को भूले हैं तब तक हमारे ऊपर संकट के बादल गहराऐ हैं, इस पाश्चात्य सभ्यता ने हमें भी बीमारी आ गई है जो आज हमारे लिए लाइलाज हो चुकी है बहुत कुछ नासमझी में हमने अपना बहुत कुछ नष्ट किया है इस पाश्चात्य सभ्यता की बुराइयों को अपनाकर अभी समय है अगर हम नहीं संभले तो "वतन अपनी संस्कृति की फिक्र कर नादां कि
मुसीबत आने वाली है तेरी बर्बादियों के चर्चे हैं आसमानों में न समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तान
वालों तुम्हारी दास्तां तक ना रहेगी दास्तानो में
आपका ही
मनीष पांडेय
अधिवक्ता
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
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