श्री काशी विश्वनाथ मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 14
काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 14
तारीख पर तारीख बौखलाया और डरा मुस्लिम पक्ष?
मनीष पाण्डेय
राम जन्मभूमि के ऐतिहासिक निर्णय के तुरंत बाद वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा स्थित श्री कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति हेतु प्रयास तेजी से प्रारंभ कर दिए गए,
15 अक्तूबर, 1991 को इस अध्यादेश के विरुद्ध श्री काशी वि·श्वे·श्वर मुक्ति संघर्ष समिति, ज्ञानवापी वाराणसी तथा प्राचीन मंदिर के पुजारी पं. सोमनाथ भट्ट ने स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में न्यायालय सिविल जज, वाराणसी में वाद संख्या 610/91 दायर की। अन्जुमन इन्तजामिया मस्जिद इसमें प्रतिवादी बना। वाद की प्रक्रिया के बीच में उ.प्र. सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ ने पक्षकार बनने हेतु प्रार्थना पत्र दिया, जिसको बहस के बाद न्यायालय प्रथम अतिरिक्त सिविल जज, वाराणसी ने पक्षकार मान लिया। सन् 1991 से सन् 1998 के बीच इस वाद में विभिन्न मुद्दों पर दोनों पक्षों ने प्रमाण प्रस्तुत किए। हिन्दू पक्ष ने न्यायालय के समक्ष मंदिर का ऐतिहासिक तथा पौराणिक साक्ष्य रखते हुए जानकारी दी कि सन् 1669 में औरंगजेब के कुछ सैनिकों द्वारा मंदिर को आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। परंतु विवादित स्थल पर आज भी शिवलिंग विराजमान है एवं तहखाने तथा उसके आसपास के भाग पर मंदिर प्रशासन का कब्जा है। दर्शनार्थी भक्तगण इस मंदिर की परिक्रमा करते हैं। मंदिर के ध्वंसावशेष (मलबे) से परिसर के एक भाग में निर्मित मस्जिद में अब प्रशासन के हस्तक्षेप से मुसलमान नमाज पढ़ते हैं। मस्जिद जैसा आकार इस तथाकथित मस्जिद का नहीं है, वरन् वह मंदिर का टूटा भाग है। हिन्दू उस मंदिर में स्थित शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ा पाते, इसका कारण प्रशासनिक कठिनाइयां हैं, लेकिन वे मंदिर की परिक्रमा करते हैं। हिन्दुओं के लिए यह धार्मिक महत्व का स्थान है। विवादित परिसर के एक अंश में नमाज पढ़ने से इसका धार्मिक स्वरूप नहीं बदल गया है।
वादीगण ने न्यायालय से निर्देश मांगा कि वर्णित स्थान भगवान स्वयंभू वि·श्वे·श्वर नाथ का मंदिर है और हिन्दुओं को इसमें पूजा-अर्चना का अधिकार है। मुसलमानों को इसमें अवरोध खड़ा करने का अधिकार नहीं है। अत: निषेधाज्ञा द्वारा मुसलमानों को वर्जित किया जाए कि वे मंदिर में हिन्दुओं द्वारा पूजा-पाठ करने, इसकी मरम्मत करने व निर्माण आदि में हस्तक्षेप न करें। जिस स्थान पर तथाकथित मस्जिद बना ली गयी है, उस पर भी आधिपत्य दिलाया जाए। प्रतिवादी मुस्लिम पक्ष के अनुसार विवादित स्थल कभी मंदिर था ही नहीं, यहां हिन्दुओं का कभी आधिपत्य नहीं रहा, हिन्दुओं का इससे कोई मतलब नहीं है, मुसलमानों की मजहबी भावनाएं इससे जुड़ी हैं और वे यहां बराबर नमाज पढ़ते चले आ रहे हैं। उपासना स्थल विशेष उपबन्ध अधिनियम 1991 की धारा 4 के अन्र्तगत यह वाद बाधित है और आधिपत्य का निर्णय समयावधि से बाधित है। ऊ परी न्यायालय की कार्यवाही से क्षुब्ध होकर मुकदमे के बीच दोनों पक्षों ने ही पुनर्विचार याचिका दाखिल की।
पुनर्विचार याचिका की सुनवाई को निर्णीत करते हुए माननीय प्रथम अपर जिला जज, वाराणसी ने मत व्यक्त किया- यह विवाद एक सम्पत्ति का विवाद नहीं है, बल्कि इस देश के दो मुख्य सम्प्रदायों के बीच राष्ट्रीय विवाद है एवं करोड़ों लोगों की भावना से जुड़ा है। धारा 4 उपासना स्थल (विशेष उपबन्ध) अधिनियम 1991 को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि 15 अगस्त, 1947 को किसी उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप जैसा था, वैसा ही बनाए रखने के लिए प्रावधान है। यहां यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि 15 अगस्त, 1947 को धार्मिक स्थल का स्वरूप क्या था? यदि यह तथ्य विवादित है तो यह प्रश्न विधिक नहीं, विधि और तथ्य का मिश्रित प्रश्न है।
अयोध्या विवाद से सम्बंधित निर्णय का संदर्भ देते हुए न्यायालय ने कहा कि देश की जनता की धार्मिक भावना से जुड़े मामलों का राष्ट्रीय महत्व होता है। इसलिए ऐसे मामलों का निस्तारण गुण-दोष के आधार पर यथाशीघ्र होना चाहिए। अन्तरिम आदेशों से न्यायिक प्रक्रिया लम्बी खिंच जाती है।
न्यायालय ने कहा- चूंकि वादीगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप प्रारंभ से आज तक मंदिर का है। मंदिर के रूप में हिन्दू उसकी परिक्रमा-पूजा करते हैं, उसके तहखानों पर हिन्दुओं का कब्जा है एवं शेष स्थलों पर भी हिन्दुओं के विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां विराजमान हैं, एवं मंदिर का भग्नावशेष भी अपने स्थान पर विराजमान है। उक्त स्थल पर एक भाग में नमाज पढ़ने से उसकी धार्मिक स्थिति में परिवर्तन नहीं हो सकता एवं 15 अगस्त, 1947 को उक्त धार्मिक स्थल का धार्मिक स्वरूप मंदिर था। इस सम्बंध में भी उनके द्वारा 34 छायाचित्र प्रस्तुत किए गए हैं। विवादित स्थल पर आज भी स्वयंभू भगवान वि·श्वे·श्वर का लिंग विराजमान है, जिसे पृथ्वी से अलग नहीं किया जा सकता। उक्त सभी तथ्य ऐसे हैं जिनके विस्तृत प्रमाणों की आवश्यकता है। बिना साक्ष्यों/प्रमाणों के ये तथ्य सिद्ध नहीं हो सकते। जबकि प्रतिपक्षी का कहना है कि वहां शुरू से ही मस्जिद है, मंदिर वहां कभी था ही नहीं। इस प्रकार बिना साक्ष्य के वाद में किसी अंश या पूरे वाद को धार्मिक उपासना स्थल (विशेष उपबन्ध) अधिनियम 1991 के आधार पर निरस्त कर देना उचित नहीं है। इस मामले में केवल एक भवन नहीं बल्कि पूरे परिसर का धार्मिक स्वरूप तय होना है। धार्मिक स्वरूप एक ऐसा शब्द है जो कि धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है। इसलिए धार्मिक स्वरूप निर्धारित करते समय परिसर की केवल इमारतों का स्वरूप ही नहीं देखा जाएगा। 23 सितम्बर, 1998 को प्रथम अपर जिला न्यायाधीश, वाराणसी माननीय रवीन्द्र नाथ मिश्र ने उक्त मत व्यक्त करते हुए परीक्षण न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि परीक्षण न्यायालय अन्य सभी वादों पर बिन्दुवार साक्ष्य लेकर उसे एक साथ निर्णीत करे। उपरोक्त आदेश के विरुद्ध अन्जुमन इन्तजामिया मस्जिद ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी है। जिला न्यायालय ने सम्पूर्ण परिसर को एक मानते हुए सभी साक्ष्य एक साथ लेकर शीघ्र निर्णय हो, यह आदेश देकर हिन्दू पक्ष के औचित्य को वैध स्वीकार किया है। वर्ष 1991 में जो प्रतिनिधि वाद प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विशेश्वर व अन्य बनाम अंजुमन एंटी जामिया मस्जिद व अन्य वाद संख्या 610 दाखिल किया गया था जिसे हिंदू पक्ष की ओर से पंडित सोमनाथ व्यास डॉ राम रंग शर्मा तथा हरिहर पांडे के अलावा चौथे वादी स्वयं स्वयंभू भगवान विशेश्वर थे कालांतर में पंडित सोमनाथ व्यास था रामानंद शर्मा की मृत्यु हो जाने के उपरांत न्यायालय द्वारा अधिवक्ता विजय शंकर स्त्री के बाद मित्र के रूप में इस में सम्मिलित किया गया था प्लेसमेंट ऑफ वरशिप एक्ट 1991 के आने के बाद जहां एक और राम जन्मभूमि वाद न्यायालय में चलता रहा वहीं अन्य मंदिरों जिसमें काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर मथुरा का कृष्ण जन्म भूमि इस कानून की जद में आ गए, जिसका तात्कालिक फायदा मुस्लिम पक्ष को मिला हिंदू संगठन द्वारा समय-समय पर इस एक्ट में संशोधन तथा इसे समाप्त करने की मांग की जाती रही फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है जिस पर अभी फैसला आना बाकी है वर्ष 1991 में जो वाद पंडित सोमनाथ व्यास द्वारा दाखिल किया गया था उसमें उन्होंने कहा था कि ज्ञानवापी मस्जिद ज्योतिर्लिंग विशेश्वर मंदिर का ही एक अंश है वहां हिंदू आस्था मानो को पूजा-पाठ राग भोग तथा दर्शन आदि के साथ निर्माण मरम्मत और पुनरुद्धार का अधिकार प्राप्त है राम जन्मभूमि के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत काशी और मथुरा के शिव भक्तों व कृष्ण भक्तों की भावनाएं हिलोरे मारने लगी उत्साह एक बार फिर से वापस लौट आया जिस पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की मांग बार-बार हिंदू संगठन हुआ हिंदू पक्ष कार्य कर रहे थे उसका विधिवत श्री गणेश 11 दिसंबर 2019 को प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विशेश्वर नाथ की ओर से सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रेक कोर्ट न्यायधीश सुधा यादव की न्यायालय में प्रार्थना पत्र देकर की गई माननीय न्यायाधीश महोदय ने विपक्षियों से आपत्ति तलब करने के बाद साथ ही साथ अगली सुनवाई हेतु 9 जनवरी तिथि निर्धारित कर दी गई वाह मित्र अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने कहा कि कथित विवादित ज्ञानवापी परिषद में स्वयंभू विशेश्वर नाथ का शिवलिंग आज भी स्थापित है मंदिर के हिस्सों पर मुसलमानों ने अधिपत्य करके मस्जिद बना दिया है उन्होंने आगे कहा कि 15 अगस्त 1947 को भी विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप मंदिर ही था इस मामले में विपक्षी गढ़ अर्थात मुस्लिम पक्ष ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को इसका शुरू मस्जिद था, इस संबंध में अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने कहा कि एक भवन ही नहीं बल्कि बड़ा परिसर विवादित है लंबे इतिहास के दौरान पूरे परिसर में समय-समय पर हुए परिवर्तन के साक्ष्य एकत्रित करने और धार्मिक स्वरूप तय करने के लिए भारतीय भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग एएसआई इस सर्वेक्षण कराया जाना आवश्यक है अधिवक्ता रस्तोगी ने यह भी कहा कि भवन की बाहरी और अंदरूनी दीवारें गुंबद और खानु तैयारी के संबंध में एएसआई की निरीक्षण रिपोर्ट मंगाने हेतु अपील की है
शेष अगले भाग में
आपका ही मनीष पांडेय
MCOM,LLB,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिन्दू महासभा महासभा
तारीख पर तारीख बौखलाया और डरा मुस्लिम पक्ष?
मनीष पाण्डेय
राम जन्मभूमि के ऐतिहासिक निर्णय के तुरंत बाद वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा स्थित श्री कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति हेतु प्रयास तेजी से प्रारंभ कर दिए गए,
15 अक्तूबर, 1991 को इस अध्यादेश के विरुद्ध श्री काशी वि·श्वे·श्वर मुक्ति संघर्ष समिति, ज्ञानवापी वाराणसी तथा प्राचीन मंदिर के पुजारी पं. सोमनाथ भट्ट ने स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में न्यायालय सिविल जज, वाराणसी में वाद संख्या 610/91 दायर की। अन्जुमन इन्तजामिया मस्जिद इसमें प्रतिवादी बना। वाद की प्रक्रिया के बीच में उ.प्र. सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ ने पक्षकार बनने हेतु प्रार्थना पत्र दिया, जिसको बहस के बाद न्यायालय प्रथम अतिरिक्त सिविल जज, वाराणसी ने पक्षकार मान लिया। सन् 1991 से सन् 1998 के बीच इस वाद में विभिन्न मुद्दों पर दोनों पक्षों ने प्रमाण प्रस्तुत किए। हिन्दू पक्ष ने न्यायालय के समक्ष मंदिर का ऐतिहासिक तथा पौराणिक साक्ष्य रखते हुए जानकारी दी कि सन् 1669 में औरंगजेब के कुछ सैनिकों द्वारा मंदिर को आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। परंतु विवादित स्थल पर आज भी शिवलिंग विराजमान है एवं तहखाने तथा उसके आसपास के भाग पर मंदिर प्रशासन का कब्जा है। दर्शनार्थी भक्तगण इस मंदिर की परिक्रमा करते हैं। मंदिर के ध्वंसावशेष (मलबे) से परिसर के एक भाग में निर्मित मस्जिद में अब प्रशासन के हस्तक्षेप से मुसलमान नमाज पढ़ते हैं। मस्जिद जैसा आकार इस तथाकथित मस्जिद का नहीं है, वरन् वह मंदिर का टूटा भाग है। हिन्दू उस मंदिर में स्थित शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ा पाते, इसका कारण प्रशासनिक कठिनाइयां हैं, लेकिन वे मंदिर की परिक्रमा करते हैं। हिन्दुओं के लिए यह धार्मिक महत्व का स्थान है। विवादित परिसर के एक अंश में नमाज पढ़ने से इसका धार्मिक स्वरूप नहीं बदल गया है।
वादीगण ने न्यायालय से निर्देश मांगा कि वर्णित स्थान भगवान स्वयंभू वि·श्वे·श्वर नाथ का मंदिर है और हिन्दुओं को इसमें पूजा-अर्चना का अधिकार है। मुसलमानों को इसमें अवरोध खड़ा करने का अधिकार नहीं है। अत: निषेधाज्ञा द्वारा मुसलमानों को वर्जित किया जाए कि वे मंदिर में हिन्दुओं द्वारा पूजा-पाठ करने, इसकी मरम्मत करने व निर्माण आदि में हस्तक्षेप न करें। जिस स्थान पर तथाकथित मस्जिद बना ली गयी है, उस पर भी आधिपत्य दिलाया जाए। प्रतिवादी मुस्लिम पक्ष के अनुसार विवादित स्थल कभी मंदिर था ही नहीं, यहां हिन्दुओं का कभी आधिपत्य नहीं रहा, हिन्दुओं का इससे कोई मतलब नहीं है, मुसलमानों की मजहबी भावनाएं इससे जुड़ी हैं और वे यहां बराबर नमाज पढ़ते चले आ रहे हैं। उपासना स्थल विशेष उपबन्ध अधिनियम 1991 की धारा 4 के अन्र्तगत यह वाद बाधित है और आधिपत्य का निर्णय समयावधि से बाधित है। ऊ परी न्यायालय की कार्यवाही से क्षुब्ध होकर मुकदमे के बीच दोनों पक्षों ने ही पुनर्विचार याचिका दाखिल की।
पुनर्विचार याचिका की सुनवाई को निर्णीत करते हुए माननीय प्रथम अपर जिला जज, वाराणसी ने मत व्यक्त किया- यह विवाद एक सम्पत्ति का विवाद नहीं है, बल्कि इस देश के दो मुख्य सम्प्रदायों के बीच राष्ट्रीय विवाद है एवं करोड़ों लोगों की भावना से जुड़ा है। धारा 4 उपासना स्थल (विशेष उपबन्ध) अधिनियम 1991 को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि 15 अगस्त, 1947 को किसी उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप जैसा था, वैसा ही बनाए रखने के लिए प्रावधान है। यहां यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि 15 अगस्त, 1947 को धार्मिक स्थल का स्वरूप क्या था? यदि यह तथ्य विवादित है तो यह प्रश्न विधिक नहीं, विधि और तथ्य का मिश्रित प्रश्न है।
अयोध्या विवाद से सम्बंधित निर्णय का संदर्भ देते हुए न्यायालय ने कहा कि देश की जनता की धार्मिक भावना से जुड़े मामलों का राष्ट्रीय महत्व होता है। इसलिए ऐसे मामलों का निस्तारण गुण-दोष के आधार पर यथाशीघ्र होना चाहिए। अन्तरिम आदेशों से न्यायिक प्रक्रिया लम्बी खिंच जाती है।
न्यायालय ने कहा- चूंकि वादीगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप प्रारंभ से आज तक मंदिर का है। मंदिर के रूप में हिन्दू उसकी परिक्रमा-पूजा करते हैं, उसके तहखानों पर हिन्दुओं का कब्जा है एवं शेष स्थलों पर भी हिन्दुओं के विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां विराजमान हैं, एवं मंदिर का भग्नावशेष भी अपने स्थान पर विराजमान है। उक्त स्थल पर एक भाग में नमाज पढ़ने से उसकी धार्मिक स्थिति में परिवर्तन नहीं हो सकता एवं 15 अगस्त, 1947 को उक्त धार्मिक स्थल का धार्मिक स्वरूप मंदिर था। इस सम्बंध में भी उनके द्वारा 34 छायाचित्र प्रस्तुत किए गए हैं। विवादित स्थल पर आज भी स्वयंभू भगवान वि·श्वे·श्वर का लिंग विराजमान है, जिसे पृथ्वी से अलग नहीं किया जा सकता। उक्त सभी तथ्य ऐसे हैं जिनके विस्तृत प्रमाणों की आवश्यकता है। बिना साक्ष्यों/प्रमाणों के ये तथ्य सिद्ध नहीं हो सकते। जबकि प्रतिपक्षी का कहना है कि वहां शुरू से ही मस्जिद है, मंदिर वहां कभी था ही नहीं। इस प्रकार बिना साक्ष्य के वाद में किसी अंश या पूरे वाद को धार्मिक उपासना स्थल (विशेष उपबन्ध) अधिनियम 1991 के आधार पर निरस्त कर देना उचित नहीं है। इस मामले में केवल एक भवन नहीं बल्कि पूरे परिसर का धार्मिक स्वरूप तय होना है। धार्मिक स्वरूप एक ऐसा शब्द है जो कि धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है। इसलिए धार्मिक स्वरूप निर्धारित करते समय परिसर की केवल इमारतों का स्वरूप ही नहीं देखा जाएगा। 23 सितम्बर, 1998 को प्रथम अपर जिला न्यायाधीश, वाराणसी माननीय रवीन्द्र नाथ मिश्र ने उक्त मत व्यक्त करते हुए परीक्षण न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि परीक्षण न्यायालय अन्य सभी वादों पर बिन्दुवार साक्ष्य लेकर उसे एक साथ निर्णीत करे। उपरोक्त आदेश के विरुद्ध अन्जुमन इन्तजामिया मस्जिद ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी है। जिला न्यायालय ने सम्पूर्ण परिसर को एक मानते हुए सभी साक्ष्य एक साथ लेकर शीघ्र निर्णय हो, यह आदेश देकर हिन्दू पक्ष के औचित्य को वैध स्वीकार किया है। वर्ष 1991 में जो प्रतिनिधि वाद प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विशेश्वर व अन्य बनाम अंजुमन एंटी जामिया मस्जिद व अन्य वाद संख्या 610 दाखिल किया गया था जिसे हिंदू पक्ष की ओर से पंडित सोमनाथ व्यास डॉ राम रंग शर्मा तथा हरिहर पांडे के अलावा चौथे वादी स्वयं स्वयंभू भगवान विशेश्वर थे कालांतर में पंडित सोमनाथ व्यास था रामानंद शर्मा की मृत्यु हो जाने के उपरांत न्यायालय द्वारा अधिवक्ता विजय शंकर स्त्री के बाद मित्र के रूप में इस में सम्मिलित किया गया था प्लेसमेंट ऑफ वरशिप एक्ट 1991 के आने के बाद जहां एक और राम जन्मभूमि वाद न्यायालय में चलता रहा वहीं अन्य मंदिरों जिसमें काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर मथुरा का कृष्ण जन्म भूमि इस कानून की जद में आ गए, जिसका तात्कालिक फायदा मुस्लिम पक्ष को मिला हिंदू संगठन द्वारा समय-समय पर इस एक्ट में संशोधन तथा इसे समाप्त करने की मांग की जाती रही फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है जिस पर अभी फैसला आना बाकी है वर्ष 1991 में जो वाद पंडित सोमनाथ व्यास द्वारा दाखिल किया गया था उसमें उन्होंने कहा था कि ज्ञानवापी मस्जिद ज्योतिर्लिंग विशेश्वर मंदिर का ही एक अंश है वहां हिंदू आस्था मानो को पूजा-पाठ राग भोग तथा दर्शन आदि के साथ निर्माण मरम्मत और पुनरुद्धार का अधिकार प्राप्त है राम जन्मभूमि के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत काशी और मथुरा के शिव भक्तों व कृष्ण भक्तों की भावनाएं हिलोरे मारने लगी उत्साह एक बार फिर से वापस लौट आया जिस पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की मांग बार-बार हिंदू संगठन हुआ हिंदू पक्ष कार्य कर रहे थे उसका विधिवत श्री गणेश 11 दिसंबर 2019 को प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विशेश्वर नाथ की ओर से सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रेक कोर्ट न्यायधीश सुधा यादव की न्यायालय में प्रार्थना पत्र देकर की गई माननीय न्यायाधीश महोदय ने विपक्षियों से आपत्ति तलब करने के बाद साथ ही साथ अगली सुनवाई हेतु 9 जनवरी तिथि निर्धारित कर दी गई वाह मित्र अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने कहा कि कथित विवादित ज्ञानवापी परिषद में स्वयंभू विशेश्वर नाथ का शिवलिंग आज भी स्थापित है मंदिर के हिस्सों पर मुसलमानों ने अधिपत्य करके मस्जिद बना दिया है उन्होंने आगे कहा कि 15 अगस्त 1947 को भी विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप मंदिर ही था इस मामले में विपक्षी गढ़ अर्थात मुस्लिम पक्ष ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को इसका शुरू मस्जिद था, इस संबंध में अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने कहा कि एक भवन ही नहीं बल्कि बड़ा परिसर विवादित है लंबे इतिहास के दौरान पूरे परिसर में समय-समय पर हुए परिवर्तन के साक्ष्य एकत्रित करने और धार्मिक स्वरूप तय करने के लिए भारतीय भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग एएसआई इस सर्वेक्षण कराया जाना आवश्यक है अधिवक्ता रस्तोगी ने यह भी कहा कि भवन की बाहरी और अंदरूनी दीवारें गुंबद और खानु तैयारी के संबंध में एएसआई की निरीक्षण रिपोर्ट मंगाने हेतु अपील की है
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