बिहार में का बा••••••••?
बिहार में का बा••••• जंगलराज, बाहुबल, राजनीति का अपराधीकरण यही है बिहार की असली त्रासदी?
मनीष पाण्डेय
आखिरकार बिहार विधानसभा चुनाव वर्ष 2020 संपन्न हो ही गए, एग्जिट पोलो के अनुसार जहां कमल जहां मुरझाने की तैयारी कर रहा था, वही सुशासन बाबू के सुशासन का सूर्य अस्त होने की कगार पर था, अप्रत्याशित रूप से लालटेन की तेजी राजनीतिक धुरंधरों को भी हैरान कर रही थी, राजनैतिक विश्लेषकों और पंडितों के अनुमान धरे के धरे रह गए, बिहार के पूरे चुनाव परिदृश्य में अगर कुछ अप्रत्याशित हुआ तो वह लालटेन अर्थात आरजेडी का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना, चिराग तले अंधेरा हो जाना, और अपने बड़े-बड़े वादों और ईमानदार छवि की बदौलत पहली बार इस महासमर में उतरी द प्लूरल्स पार्टी, की करारी हार ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया, निश्चित रूप से पल्सर पार्टी की सर्वेसर्वा पुष्पम प्रिया चौधरी जो खुद दो स्थानों पर खड़ी हुई थी, दोनों जगहों पर करारी हार मिली बिहार की राजनीति में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आरजेडी का आना बिहार के उस चेहरे को दिखाने के लिए काफी था जिसकी पहचान ना कभी मिटी है और ना ही शायद ही कभी मिटेगी राजनीति का अपराधीकरण के पर पार्टी पर चलती हुई बिहार की राजनीति, कायम जंगलराज, बाहुबलियों का बोलबाला, यही बिहार की राजनीति की असली पहचान थी, है, और शायद आगे भी रहेगी? निश्चित रूप से पुष्पम प्रिया चौधरी ने जिस तरह का राजनीतिक एजेंडा बिहार की जनता के सामने रखा, अगर वह साअक्षर ईमानदारी से लागू हो गया होता, तो ना सिर्फ बिहार की राजनीति बल्कि पूरे बिहार का इतिहास और भूगोल भी बदल जाता, सुशासन बाबू अर्थात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जंगल राज के ऊपर बड़े बड़े लंबे चौड़े भाषण दिए हैं राजनीति के अपराधीकरण को उन्होंने अपने चुनावी भाषण में बहुत जोर शोर से उछाला था दुर्भाग्यवश उन्हीं बाहुबलियों को उन्होंने बड़ी संख्या में टिकट दिया सवाल ये उठता है कि क्या बिहार की जनता इन बाहुबलियों से मुक्त होना नहीं चाहती जो जंगलराज बिहार में कायम है उस से मुक्त होना नहीं चाहती क्या बिहार की जनता को राजनीति का अपराधीकरण बार-बार हर बार लुभाता है ललचाता है और गौरवान्वित महसूस करता है सवाल यह है कि क्या बिहार की जनता इस दुष्चक्र से बाहर निकलना नहीं चाहती पैसा, शराब, मुर्गा, मछली, और अय्याशी, बाहुबल के आगे जनता अपना घुटना टेक चुकी है आंकड़े देखने पर तो यह बात पूरी तरह से स्पष्ट दिखाई देती है
पहले चरण के 1066 कैंडिडेट में 319 का क्रिमिनल रिकॉर्ड है. इसमें लालटेन अर्थात आरजेडी सबसे आगे है अपराधियों और बाहुबलियों को टिकट बांटने में आरजेडी का स्थान सर्वोपरि है और यही कारण है कि आज बिहार के संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में आरजेडी इन्हीं बाहुबलियों के बल पर सबसे ज्यादा सीट पाने में कामयाब रही है, आरजेडी ने किस तरह चुनचुन का टिकट बांटे इसका सबसे बड़ा उदाहरण एकमा सीट है जहां पर श्रीकांत यादव आरजेडी के टिकट पर जीते हैं श्रीकांत यादव के बारे में कहा जाता है 150 हाईवा अर्थात बड़े 150 ट्रकों के मालिक हैं विश्वस्त सूत्रों की माने तो उनके द्वारा एक एक करोड़ रूपया तेजस्वी और तेजप्रताप को दिया गया था साथ ही साथ एक, एक फॉर्च्यूनर गाड़ी ढाई करोड़ के क्षेत्र में दारु मुर्गा अय्याशी नगद आदि आदि में बटवा दिया गया था जो प्रत्याशी स्काई लैब के रूप में गिरा था वह आरजेडी का आज विधायक बन बैठा है उसी क्षेत्र से एक रंजीत सिंह नाम की प्रत्याशी भी है जो वर्षों से उस क्षेत्र में विकास की गंगा बहाएंगे हैं वह भी अपने निजी खर्चे से समाज सेवा का कोई ऐसा कार्य पुणे से नहीं छूटा जो उन्होंने ना किया हो सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों लड़कियों की शादियां अपने पैसे से करवाना गांवों में बिजली के ट्रांसफार्मर लगवाना और भी न जाने क्या-क्या आरजेडी से टिकट मांगा था किंतु आरजेडी ने उन्हें टिकट ना देकर श्रीकांत यादव को टिकट थमा दिया अपने बल पर सनातन फ्रंट समर्थित रंजीत कुमार ने निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए 11,000 से अधिक वोट प्राप्त किए पिछले चुनाव में यह संख्या 28000 से ऊपर थी, वही निर्दलीय राणा प्रताप सिंह मांजी विधानसभा 33,000 से अधिक वोटों की प्राप्ति हुई है किन्तु वाह रे बिहार की जनता रंजीत सिंह और राणा प्रताप सिंह जैसे प्रत्याशी की करारी हार ने ही यह स्पष्ट कर दिया कि बिहार की जनता अंधेरे में रहने को क्यों मजबूर है? महिपालपुर प्रिया पुष्पम चौधरी के उन प्रत्याशियों की ओर आता है जो बिहार के उस तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उच्च शिक्षित हैं ना अपराधी है ना बाहुबली और ना ही धनबली, जो अपनी ईमानदारी और कर्मठता के बल पर बिहार की उस जंगलराज से जनता को मुक्ति दिलाने का कृत संकल्पित थी, किंतु हाय रे प्लूरल्स पार्टी•••••"
और अंत में, लोक गायक का नेहा सिंह राठौर का बिहार में का बा••••••• ने आज के उस बिहार का चरित्र चित्रण का डाला है जो निरंतर गर्त में और अंधेरे में जा रहा है बिहार की वह धरती जो कभी नालंदा विक्रमशिला उदंतपुरी जैसे गौरवशाली अध्ययनों का केंद्र कही जाती थी वह भी हार जो एक राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था वह भी आज गौतम बुद्ध की नगरी है वह बिहार जो कि महावीर स्वामी की नगरी है,और सबसे बड़ी चीज मां जानकी का जन्म स्थान के रूप में भी बिहार पूजी जाती है
परंतु आज वाह बिहारी संस्कृति समाप्ति की ओर है बिहारी जनता उस पर गर्व नहीं बल्कि शायद शर्म महसूस करती है, क्योंकि अगर गर्व महसूस होता तो बिहार की तकदीर बदलते देर नहीं लगती,अब कुछ बातें अपने संगठन की अर्थात हिंदू महासभा, राष्ट्र सेवा दल, तथा जनसंघ के गठबंधन से सनातन फ्रंट द्वारा बिहार में लड़ी गई सीटों का हाल अन्य दलों की भांति कुछ वादे सनातन फ्रंट द्वारा भी किए गए थे, जिसमें प्रमुख रुप से व्यासपीठ को सरकार प्रायोजित योजना के रूप में स्थापित करना स्मार्ट गांव की स्थापना प्रति परिवार में एक व्यक्ति को नौकरी सभी क्षेत्रों में महिलाओं को 33% आरक्षण नालंदा और पाटलिपुत्र की गौरव गाथा को पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित करना मंदिर के पुजारियों को ₹10000 का मासिक वेतन सरकारी खर्चे से सभी मंदिरों का जीवन और नवीनीकरण जैसी घोषणाओं के साथ सनातन फ्रंट ने भी बिहार के चुनाव में अपना दम ठोका था परंतु होना ही था जिसकी आशंका पहले से ही थी बिहार की जनता जिससे राजनीति का अपराधीकरण, बाहुबली जंगलराज और धनबल ही प्यारा है जोइंस के आगे अपने घुटने टेक चुकी हो जो सिर्फ अपने स्वार्थ में बुरी तरह डूबी हुई हो, जो बिहारी संस्कृति को भूल चुकी हो उसे निरंतर नष्ट कर रही हो उसने भी सनातन फ्रंट के प्रत्याशी की जमानत ने बुरी तरह जप्त करवा दी चचा गालिब ने ठीक ही कहा था••••"निकलना खुंद से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,बहोत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले" फिलहाल यह संघर्ष जारी रहेगा जब तक कि बिहार की उस पुराने गौरवशाली इतिहास को पुनःप्रतिष्ठित नहीं कर दिया जाता
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
MCOM,LLB,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
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