वैलेंटाइन की आड़ में भारतीय संस्कृति पर आघात करता ईसाई पंथ,
भाग 1
हिंदू सनातन संस्कृति पर आघात करता वैलेंटाइन, डे, वीक, एंटी वीक और ईसाई पंथ
मनीष पाण्डेय
रोमन साम्राज्य (27 ईसा पूर्व 476(प•)1453 पूर्व)एक ऐसी विकसित सभ्यता जिसका धीरे-धीरे अपने विलासी, बर्बर, सत्ता लोलुप, और अनियंत्रित आकांक्षाओं, वाले शासकों की वजह से अंत हो गया रोमन साम्राज्य में एक से एक प्रतापी राजा जूलियस सीजर, क्लेडोलिअस, नीरो, वही नीरो जिस जो एक उदाहरण का रूप ले चुका है वह उदाहरण है कि जब "रोम जल रहा था तो नीरो पहाड़ी पर बैठा हुआ वायलिन बजा रहा था हालांकि यह पूरी तरह से गलत है सच यह है कि उस समय नीरो ने तुरंत कार्यवाही के आदेश दिए थे, जिन्हें आज पूरा विश्व जानता पहचानता हूं समझता है, किंतु दुर्भाग्य है कि एक अच्छे प्रशासक, और ऊंची सोच रखने वाले ज्यादातर रोमन राजाओं की हत्या सत्ता के लालच में उन्हीं के करीबी लोगों द्वारा कर दी गई, ऐसा नहीं था कि जो रोमन शासक मारे गए वह पूरी तरह दूध के धुले हुए थे, उन्होंने भी किसी ना किसी राजा की हत्या इसी तरह से करके रोमन साम्राज्य के शासक बने थे, और उनकी आने वाली पीढ़ियों ने उनकी हत्या करके सत्ता की प्राप्ति की थी ,रोमन साम्राज्य के टूटने, बिखरने ,और अस्तित्व समाप्त होने का एक एक बड़ा कारण था, वैसे तो रोम साम्राज्य के पतन होने के अनेक कारण थे किंतु एक और महत्वपूर्ण कारण यह भी था कि धीरे-धीरे रोम साम्राज्य का धर्म रोमन धर्म, को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए ईसाई पंथ धीरे-धीरे मजबूत हो रहा था, रोमन शासक इस बात को अच्छी तरह से समझ चुके थे कि ईसाई धीरे-धीरे रोमन धर्म को समाप्त करने का बीड़ा उठा चुके हैं, इसीलिए ज्यादातर रोमन शासकों ने ईसाइयों पर अनेक प्रकार के अत्याचार किए, और उन्हें बार-बार पनपने से रोका, रोमन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसका संबंध भारतीय सभ्यता से भी था इतिहास गवाह है कि भारतीय सभ्यता एक पूर्ण विकसित सभ्यता थी ,जिसकी बहुत सी बातों को विश्व के अन्य सभ्यताओं ने अपनाया रोमन सभ्यता भी ऐसी ही थी कह सकते हैं कि रोमन साम्राज्य का मूल धर्म भारतीय सभ्यता और धर्म से पूरी तरह से प्रभावित था, किंतु ईसाइयों को यह बात पसंद नहीं थी और वे अक्सर ऐसे कृत्य किया करते थे जिससे रोमन धर्म पूरी तरह नष्ट होकर वहां ईसाई पंथ मजबूत हो जाए, ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह का जन्म भी रोमन साम्राज्य में ही हुआ था, एक समय ऐसा भी आया जब प्राचीन रोमन साम्राज्य का धीरे-धीरे अंत होने लगा और ईसाई बाहुबली होने लगे प्राचीन रोमन धर्म का अंत हुआ और ईसाई पंथ का उदय ईसाई पंथ को सन 130 में वहां का राजधर्म घोषित कर दिया गया, ऐसे में जब यह आलेख में लिख रहा हूं तो वैलेंटाइन डे को बीते हुए 24 घंटे से अधिक का समय हो चुका है मुझे कोई आवश्यकता नहीं थी कि वैलेंटाइन अथवा उनके नाम पर हो रहे नंगे नाच के विरुद्ध कुछ लिखूं, किंतु परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि इस विषय पर अपनी लेखनी उठानी ही पड़ी ऐसे कई प्रश्न मेरे सामने अचानक उठ खड़े हुए, जिनका उत्तर तलाशना अत्यंत ही आवश्यक था, कुछ अपने लिए और कुछ अपने आगे आने वाली पीढ़ी के साथ साथ उन तथाकथित व्यापारी बुद्धिजीवियों के लिए भी जिन्होंने समय-समय पर वैलेंटाइन को आगे कर हम भारतीयों विशेषकर हिंदू सनातन धर्मावलंबियों को वैलेंटाइन की एक गलत चित्र दिखाकर ना सिर्फ समय-समय पर हमें दिग्भ्रमित किया बल्कि भारत में तेजी से बढ़ते हुए ईसाईकरण को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी अदा की, समय-समय पर रोम स्थित वेटिकन सिटी का रोमन कैथोलिक चर्च विश्व भर में विशेषकर भारत में अपने धर्म गुरुओं को ईसाई मिशनरीओ को प्रेम दया करूणा, सेवा भाव, जैसे माननीय तत्वों की आड़ में भारतीयों का ईसाईकरण करने के लिए भेजा जाता रहा है मदर टेरेसा जो उसी क्षेत्र की है, को भी भारत में ईसाई करण करने के उद्देश्य से इसी कैथोलिक चर्च द्वारा भेजा गया था वैलेंटाइन जिसे लोग संत ऋषि अथवा ना जाने क्या-क्या कह कर उसकी महिमा का गुणगान करते हुए नतमस्तक होते हैं कोभी और रोम इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भेजा गया था, आंकड़े उठाकर देख लीजिए कि आजादी के बाद भारत की गली गली मोहल्ले मोहल्ले में किस तरह तेजी से हिंदुओं का ईसाई करण हुआ है, इसी ईसाईकरण के चलते प्राचीन और रोम साम्राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया, और वह ईसाई पंथ को राजधर्म की मान्यता प्राप्त हो गई, अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि जो चित्र हमारे सामने अक्सर प्रस्तुत किया जाता है क्या वही सत्य है अथवा हम उसे ही सत्य समझ बैठे हैं, या फिर पर्दे के पीछे की कुछ और ही सच्चाई है जिस को तलाशा जाना बेहद अनिवार्य है हिंदू संस्कृति को अक्षुण्ण और उसे बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि उस सच्चाई को तलाशा जाए,
शेष अगले अंक में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
M•COM,LLB,MBA( HR )
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिन्दू महासभा
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