कृष्ण जन्मभूमि का रक्तरंजित इतिहास भाग 7
कृष्ण कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास भाग 7
न्यायालय के निर्णय ईदगाह वाला हिस्सा ही कृष्ण जन्म भूमि
मनीष पाण्डेय
जिस प्रकार राम मंदिर को न्यायालय में जानबूझकर मुस्लिम पक्ष द्वारा उलझाया गया था, ठीक वैसे ही कृष्ण जन्म भूमि के साथ भी हुआ था जहां राम जन्मभूमि का वादन न्यायालयों में 125 वर्षों तक हो जा रहा वहीं कृष्ण जन्म भूमि का वाद भी लगभग 143 वर्ष तक न्यायालय में उलझा रहा जब तक 1968 मैं गैर कानूनी ढंग से समझौता नहीं हो गया मराठा शासन के पतन के बाद ब्रज क्षेत्र की कमान पूरी तरह से अंग्रेजों के हाथ में आ गई थी 1815 में कटरा केशव देव अर्थात कृष्ण जन्म भूमि को 13•37 एकड़ भूमि को जब नीलाम किया गया तो वाराणसी के बैंकर राय पत्नीमल द्वारा इसे खरीद लिया गया राय पत्नीमल उस भूमि पर खुद कृष्ण मंदिर का निर्माण करना चाहते थे किंतु मुसलमानों द्वारा यह कहकर विरोध किया गया की नीलामी में खरीदी गई भूमि में ईदगाह की भूमि सम्मिलित नहीं है
न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय
1832 में पहला मुकदमा:- मुस्लिम अत्ताउल्लाह खान द्वारा 15 मार्च 1932 को कलेक्टर के यहां प्रार्थना पत्र देकर कहा गया कि 1815 की हुई नीलामी को निरस्त किया जाए और ईदगाह की मरम्मत की अनुमति प्रदान की जाए मुसलमानों की ओर से मुसलमानों की ओर से यह दावा किया गया कि कटरा केशव देव ईदगाह की संपत्ति है और ईदगाह का निर्माण औरंगजेब ने करवाया था इसीलिए इस पर मुसलमानों का अधिकार है उस समय के मथुरा के तत्कालीन कलेक्टर डब्ल्यू एस टेलर द्वारा 29 अक्टूबर 1932 को मुसलमानों से इस संबंध में प्रमाण मांगे तो ना तो मुसलमानों ने ही और ना ही वहां के प्रशासन द्वारा प्रमाण भी जा सके तब मिस्टर टेलर ने अपने निर्णय में लिखा कि यह क्षेत्र मराठों के समय से स्वतंत्र है जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी स्वीकार किया है 1815 में राजा पत्नीमल ने इसे नीलामी में खरीदा है और पटनी मल्ही कटरा केशव देव ईदगाह और आसपास के अन्य निर्माणों के मालिक हैं तथा स्वामित्व राजा पटरी बल व उनके परिवार का है
दूसरा मुकदमा अहमद शाह बनाम गोपी आईपीसी की धारा 447 352 के तहत दर्ज कराया गया अहमद शाह ने आरोप लगाया कि ईदगाह का चौकीदार गोपी कटरा केशव देव के पश्चिमी हिस्से में एक सड़क का निर्माण कर रहा है जबकि ऐसा ईदगाह की संपत्ति है अहमद शाह ने चौकीदार गोपी को सड़क निर्माण करने से रोक दिया इस मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए विद्वान न्यायाधीश एंथोनी ने कहा कि सड़क एवं विवादित जमीन राजा पटनीमल की संपत्ति है तथा अहमद शाह द्वारा लगाए गए आरोप झूठे हैं तीसरा मुकदमा 1920 सिविल सूट नंबर 76 आगरा जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया गया अपील संख्या 236 1921 तथा अपील संख्या 276 1920 इस मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए न्यायाधीश हूपर ने कहा कि विवादित जमीन ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजा पटनी मन को भेजी गई थी जिसका भुगतान नहीं वह ₹1140 के रूप में कर चुके हैं इसलिए विवादित जमीन पर ईदगाह का कोई भी अधिकार नहीं है क्योंकि ईदगाह खुद राजा पटरी मल की संपत्ति है 1920 की प्रथम अपील संख्या 236 जो कि मुसलमानों द्वारा दायर की गई थी को 16:03 1923 को खारिज कर दिया गया
चौथा मुकदमा 1928 सिविल सूट नंबर 517
मुसलमानों द्वारा ईदगाह की मरम्मत करने का प्रयास किया गया हिंदू पक्ष द्वारा मुकदमा दायर किया जाता है विद्वान न्यायाधीश विशन नारायण तनखा निर्णय देते हुए लिखते हैं कि कटरा केशव देव राजा पटेल मल के उत्तराधिकारी ओं की संपत्ति है मुसलमानों का इस पर कोई अधिकार नहीं है इसलिए ईदगाह की मरम्मत को रोका जाता है इसकी द्वितीय अपील 1932 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में की गई अपील संख्या 691 जिसका निर्णय 1935 में हिंदू पक्ष में आया
पांचवा मुकद्दमा वर्ष 1946 सिविल सूट नंबर 4 न्यायालय ने राजा पत्नीमल के वंशज राय आनंद दास तथा राय किशन दास के पक्ष में दिया मंदिर की संपत्ति को जन्म भूमि ट्रस्ट की संपत्ति बताया क्योंकि इसे राजा पत्नीमल के वंशजों ने कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को बेच दिया था
वर्ष 1959 में कुछ मुसलमानों ने कथित ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह द्वारा उनके पक्ष में निष्पादित बिक्री विलेख के आधार पर श्री कृष्ण जानम भूमि ट्रेस्ट के खिलाफ सिविल वाद संख्या 361 दायर किया था, जिसे खारिज कर दिया गया था को यह कहते हुए बर्खास्त कर दिया गया था कि बिक्री का काम बिना किसी अधिकार के निष्पादित किया गया था और वही अवैध था
मुकदमा वर्ष 1960 न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि मथुरा नगर पालिका के बहीखाता तथा दूसरे सबूतों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि कटरा केशव देव जन्मभूमि संस्था द्वारा संचालित होता है इससे यह साबित होता है कि विवादित जमीन पर केवल इसी ट्रस्ट का अधिकार है इतिहास हमें यह बताता है कि कटरा केशव देव स्थित भव्य कृष्ण जन्मभूमि पर कभी चार दरवाजे हुआ करते थे वर्तमान में इसके तीन दरवाजों पर हिंदू पक्ष का कब्जा है तथा एक दरवाजा जिस और ईदगाह है वहां पर मुस्लिम पक्ष का कब्जा है कटरा केशव पुर ही भव्य कृष्ण जन्म भूमि है इस बात का सबसे बड़ा साक्षर सबूत वहां पर लगा हुआ भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड आज भी लगा हुआ है 21 फरवरी 1951 को जुगल किशोर बिरला जी द्वारा कृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट की स्थापना की गई वह उसी समय इस पर भव्य कृष्ण जन्म मंदिर का निर्माण करवाना चाहते थे किंतु 1945 में मुसलमानों द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका के चलते मंदिर निर्माण का विचार उन्होंने त्याग दिया था किंतु जब 7 जनवरी 1953 को मुसलमानों की याचिका खारिज हो गई तब बिरला जी द्वारा पुणे मंदिर का निर्माण प्रारंभ किया गया आषाढ़ शुक्ल द्वितीय संवत 2014 दिनांक 29 जून 1957 को मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ इसका उद्घाटन भाद्र पक्ष कृष्ण 8 संवत 2015 दिनांक 6 सितंबर सन 1958 को कल्याण गीता प्रेस के यशस्वी संपादक संत प्रवर श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ यहां यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि कृष्ण जन्मभूमि में जितने भी साक्ष्य सबूत चाहे वह खसरा खतौनी या नगरपालिका अथवा राजस्व के अभिलेखों सभी में ईदगाह ईदगाह वाले स्थान को ही कृष्ण जन्मभूमि दर्शाया गया है न्यायालय के निर्णय यह बताते हैं कि ईदगाह वाला हिस्सा कृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट की संपत्ति है और वही असली कृष्ण जन्म स्थान है इसके बावजूद मुसलमानों द्वारा वहां जबरदस्ती कब्जा ठीक वैसे ही किया गया है जैसे राम जन्मभूमि के ऊपर किया गया था अथवा काशी विश्वनाथ में किया गया है कृष्ण जन्म भूमि के निकट ही एक तालाब स्थित है जिसे पोतरा कुंड कहा जाता है बताते हैं कि इसी पोतरा कुंड में भगवान श्री कृष्ण के कपड़े धोए जाते थे जब उनकी मां देवकी तथा पिता वासुदेव को कंस के कारागार में बंदी बनाया गया था इसी पोतरा कुंड के रास्ते जिसे बाद में बंद कर दिया गया था वह कारागार तक जाता था स्पष्ट है पोतरा कुंड कारागार का ही एक भाग है अर्थात कृष्ण का जन्म स्थान वही है जहां आज मस्जिद अर्थात ईदगाह का निर्माण हुआ है
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
MCOM LLB MBA( HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
न्यायालय के निर्णय ईदगाह वाला हिस्सा ही कृष्ण जन्म भूमि
मनीष पाण्डेय
जिस प्रकार राम मंदिर को न्यायालय में जानबूझकर मुस्लिम पक्ष द्वारा उलझाया गया था, ठीक वैसे ही कृष्ण जन्म भूमि के साथ भी हुआ था जहां राम जन्मभूमि का वादन न्यायालयों में 125 वर्षों तक हो जा रहा वहीं कृष्ण जन्म भूमि का वाद भी लगभग 143 वर्ष तक न्यायालय में उलझा रहा जब तक 1968 मैं गैर कानूनी ढंग से समझौता नहीं हो गया मराठा शासन के पतन के बाद ब्रज क्षेत्र की कमान पूरी तरह से अंग्रेजों के हाथ में आ गई थी 1815 में कटरा केशव देव अर्थात कृष्ण जन्म भूमि को 13•37 एकड़ भूमि को जब नीलाम किया गया तो वाराणसी के बैंकर राय पत्नीमल द्वारा इसे खरीद लिया गया राय पत्नीमल उस भूमि पर खुद कृष्ण मंदिर का निर्माण करना चाहते थे किंतु मुसलमानों द्वारा यह कहकर विरोध किया गया की नीलामी में खरीदी गई भूमि में ईदगाह की भूमि सम्मिलित नहीं है
न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय
1832 में पहला मुकदमा:- मुस्लिम अत्ताउल्लाह खान द्वारा 15 मार्च 1932 को कलेक्टर के यहां प्रार्थना पत्र देकर कहा गया कि 1815 की हुई नीलामी को निरस्त किया जाए और ईदगाह की मरम्मत की अनुमति प्रदान की जाए मुसलमानों की ओर से मुसलमानों की ओर से यह दावा किया गया कि कटरा केशव देव ईदगाह की संपत्ति है और ईदगाह का निर्माण औरंगजेब ने करवाया था इसीलिए इस पर मुसलमानों का अधिकार है उस समय के मथुरा के तत्कालीन कलेक्टर डब्ल्यू एस टेलर द्वारा 29 अक्टूबर 1932 को मुसलमानों से इस संबंध में प्रमाण मांगे तो ना तो मुसलमानों ने ही और ना ही वहां के प्रशासन द्वारा प्रमाण भी जा सके तब मिस्टर टेलर ने अपने निर्णय में लिखा कि यह क्षेत्र मराठों के समय से स्वतंत्र है जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी स्वीकार किया है 1815 में राजा पत्नीमल ने इसे नीलामी में खरीदा है और पटनी मल्ही कटरा केशव देव ईदगाह और आसपास के अन्य निर्माणों के मालिक हैं तथा स्वामित्व राजा पटरी बल व उनके परिवार का है
दूसरा मुकदमा अहमद शाह बनाम गोपी आईपीसी की धारा 447 352 के तहत दर्ज कराया गया अहमद शाह ने आरोप लगाया कि ईदगाह का चौकीदार गोपी कटरा केशव देव के पश्चिमी हिस्से में एक सड़क का निर्माण कर रहा है जबकि ऐसा ईदगाह की संपत्ति है अहमद शाह ने चौकीदार गोपी को सड़क निर्माण करने से रोक दिया इस मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए विद्वान न्यायाधीश एंथोनी ने कहा कि सड़क एवं विवादित जमीन राजा पटनीमल की संपत्ति है तथा अहमद शाह द्वारा लगाए गए आरोप झूठे हैं तीसरा मुकदमा 1920 सिविल सूट नंबर 76 आगरा जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया गया अपील संख्या 236 1921 तथा अपील संख्या 276 1920 इस मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए न्यायाधीश हूपर ने कहा कि विवादित जमीन ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजा पटनी मन को भेजी गई थी जिसका भुगतान नहीं वह ₹1140 के रूप में कर चुके हैं इसलिए विवादित जमीन पर ईदगाह का कोई भी अधिकार नहीं है क्योंकि ईदगाह खुद राजा पटरी मल की संपत्ति है 1920 की प्रथम अपील संख्या 236 जो कि मुसलमानों द्वारा दायर की गई थी को 16:03 1923 को खारिज कर दिया गया
चौथा मुकदमा 1928 सिविल सूट नंबर 517
मुसलमानों द्वारा ईदगाह की मरम्मत करने का प्रयास किया गया हिंदू पक्ष द्वारा मुकदमा दायर किया जाता है विद्वान न्यायाधीश विशन नारायण तनखा निर्णय देते हुए लिखते हैं कि कटरा केशव देव राजा पटेल मल के उत्तराधिकारी ओं की संपत्ति है मुसलमानों का इस पर कोई अधिकार नहीं है इसलिए ईदगाह की मरम्मत को रोका जाता है इसकी द्वितीय अपील 1932 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में की गई अपील संख्या 691 जिसका निर्णय 1935 में हिंदू पक्ष में आया
पांचवा मुकद्दमा वर्ष 1946 सिविल सूट नंबर 4 न्यायालय ने राजा पत्नीमल के वंशज राय आनंद दास तथा राय किशन दास के पक्ष में दिया मंदिर की संपत्ति को जन्म भूमि ट्रस्ट की संपत्ति बताया क्योंकि इसे राजा पत्नीमल के वंशजों ने कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को बेच दिया था
वर्ष 1959 में कुछ मुसलमानों ने कथित ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह द्वारा उनके पक्ष में निष्पादित बिक्री विलेख के आधार पर श्री कृष्ण जानम भूमि ट्रेस्ट के खिलाफ सिविल वाद संख्या 361 दायर किया था, जिसे खारिज कर दिया गया था को यह कहते हुए बर्खास्त कर दिया गया था कि बिक्री का काम बिना किसी अधिकार के निष्पादित किया गया था और वही अवैध था
मुकदमा वर्ष 1960 न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि मथुरा नगर पालिका के बहीखाता तथा दूसरे सबूतों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि कटरा केशव देव जन्मभूमि संस्था द्वारा संचालित होता है इससे यह साबित होता है कि विवादित जमीन पर केवल इसी ट्रस्ट का अधिकार है इतिहास हमें यह बताता है कि कटरा केशव देव स्थित भव्य कृष्ण जन्मभूमि पर कभी चार दरवाजे हुआ करते थे वर्तमान में इसके तीन दरवाजों पर हिंदू पक्ष का कब्जा है तथा एक दरवाजा जिस और ईदगाह है वहां पर मुस्लिम पक्ष का कब्जा है कटरा केशव पुर ही भव्य कृष्ण जन्म भूमि है इस बात का सबसे बड़ा साक्षर सबूत वहां पर लगा हुआ भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड आज भी लगा हुआ है 21 फरवरी 1951 को जुगल किशोर बिरला जी द्वारा कृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट की स्थापना की गई वह उसी समय इस पर भव्य कृष्ण जन्म मंदिर का निर्माण करवाना चाहते थे किंतु 1945 में मुसलमानों द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका के चलते मंदिर निर्माण का विचार उन्होंने त्याग दिया था किंतु जब 7 जनवरी 1953 को मुसलमानों की याचिका खारिज हो गई तब बिरला जी द्वारा पुणे मंदिर का निर्माण प्रारंभ किया गया आषाढ़ शुक्ल द्वितीय संवत 2014 दिनांक 29 जून 1957 को मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ इसका उद्घाटन भाद्र पक्ष कृष्ण 8 संवत 2015 दिनांक 6 सितंबर सन 1958 को कल्याण गीता प्रेस के यशस्वी संपादक संत प्रवर श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ यहां यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि कृष्ण जन्मभूमि में जितने भी साक्ष्य सबूत चाहे वह खसरा खतौनी या नगरपालिका अथवा राजस्व के अभिलेखों सभी में ईदगाह ईदगाह वाले स्थान को ही कृष्ण जन्मभूमि दर्शाया गया है न्यायालय के निर्णय यह बताते हैं कि ईदगाह वाला हिस्सा कृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट की संपत्ति है और वही असली कृष्ण जन्म स्थान है इसके बावजूद मुसलमानों द्वारा वहां जबरदस्ती कब्जा ठीक वैसे ही किया गया है जैसे राम जन्मभूमि के ऊपर किया गया था अथवा काशी विश्वनाथ में किया गया है कृष्ण जन्म भूमि के निकट ही एक तालाब स्थित है जिसे पोतरा कुंड कहा जाता है बताते हैं कि इसी पोतरा कुंड में भगवान श्री कृष्ण के कपड़े धोए जाते थे जब उनकी मां देवकी तथा पिता वासुदेव को कंस के कारागार में बंदी बनाया गया था इसी पोतरा कुंड के रास्ते जिसे बाद में बंद कर दिया गया था वह कारागार तक जाता था स्पष्ट है पोतरा कुंड कारागार का ही एक भाग है अर्थात कृष्ण का जन्म स्थान वही है जहां आज मस्जिद अर्थात ईदगाह का निर्माण हुआ है
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
MCOM LLB MBA( HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
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