जब गैलीलियो गैलिली बना चर्च का कोप भाजन भाग 6

 जब गैलीलियो गैलीली बना चर्च के कोप भाजन का शिकार भाग 6
रोमन कैथोलिक चर्च और बहुराष्ट्रीय कंपनी का असली मकसद संपूर्ण विश्व का ईसाईकरणकरण करना
मनीष पाण्डेय
सेंट सैंट वेलेंटाइन फीस्ट जिसे पॉप गैलेक्सी एस प्रथम द्वारा 496 ईसवी में एक छोटे से कार्यक्रम के रूप में प्रारंभ किया गया था जो कि वैलेंटाइन को सम्मान देने हेतु किया गया था किंतु बाद में इसे व्यापक रूप से बनाने मनाने के लिए इसमें झूठ का सहारा लिया गया और इसे प्रेम से जोड़ दिया गया और रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा पश्चात बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा विश्व भर में से प्रचारित और प्रसारित किया गया जहां रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा इसे अपने इसाईकरण के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इसे अपने व्यक्तिगत व फायदे के लिए
31 मई 1983 को इंडिया टुडे के अंक में मदर टेरेसा से एक जब यह पूछा गया कि उनके समक्ष गैलीलियो गैली अथवा चर्च को चुनने की बात अगर सामने आएगी तो वे किसे चुनेगी? तब मदर टेरेसा ने चर्च को चुनने की बात कही थी, गैलीलियो कौन था ?उसने ऐसा क्या किया था? जिसकी वजह से वह ना सिर्फ चर्च की चर्चा का विषय बना, बल्कि चर्च के विभाजन का शिकार भी हुआ, वास्तव में गैलीलियो गैलीलि एक महान वैज्ञानिक जिसने अपने तर्कों के माध्यम से चर्चे द्वारा प्रतिपादित उन नियमों की धज्जियां उड़ाई जिसे कैथोलिक चर्च जबरदस्ती आम जनमानस पर थोप रहा था, चर्च ने पाया कि गैलीलियो गैलीली द्वारा जो सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं उससे ईश्वरीय मान्यता नष्ट होती है, गैलीलियो खुद धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, किंतु अपने तर्कों प्रयोगों के आधार पर वे उन मान्यताओं का सिर्फ खंडन किया करते थे जिन्हें चर्च द्वारा प्रतिपादित किया गया था, गैलीलियो को 16 सालों में हालैंड में बनी एक दूरबीन का पता चला था जो खगोलीय पिंडों को देख सकने की क्षमता रखती थी बल्कि उस दूरबीन की सहायता से खगोलीय पिंडों की गति का अध्ययन भी किया जा सकता था गैलीलियो ने यह ठान लिया कि मुझे उस दूरबीन से भी शक्तिशाली दूरबीन बनाने है और अंत का जब गैलीलियो ने उस शक्तिशाली दूरबीन का निर्माण किया तो पूर्व में व्याप्त मान्यताओं के विपरीत ब्रह्मांड में स्थित पृथ्वी समेत सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं यह सिद्ध किया उस समय यह सभी यह मानते थे कि ब्रह्मांड में केंद्र में पृथ्वी स्थित है तथा सूर्य और चंद्रमा सहित सभी आकाशीय पिंड पृथ्वी का निरंतर चक्कर लगाते हैं उस समय चर्च भी यही मानता था तब गैलीलियो ने उसे सिद्धांत के विरुद्ध खड़े होने का निर्णय लिया,जब गैलीलियो ने यह सिद्वांत सार्वजनिक किया तो चर्च ने इसे अपनी अवज्ञा माना और इस अवज्ञा के लिये गैलीलियो को चर्च की ओर से कारावास की सजा सुनायी गयी। गैलीलियो के द्वारा दिये गये विचार ने तद्समय मनुष्य के चिंतन की दिशा केा नये रूप में स्वीकारने को विवश कर दिया। सामाजिक और धार्मिक प्रताडना के चलते पूर्व से व्याप्त मान्यताओं और विश्वासों के विपरीत प्रतिपादित सिंद्वांतो के साथ वे अधिक दिन तक खडे नहीं रह सके। वर्ष 1633 में 69 वर्षीय वृद्व गैलीलियो को चर्च की ओर से यह आदेश दिया गया कि वे सार्वजनिक तौर पर माफी मांगते हुये यह कहें कि धार्मिक मान्यताओं के विरूद्व दिये गये उनके सिद्वांत उनके जीवन की सबसे बडी भूल थी जिसके लिये वे शर्मिंदा हैं। उन्होने ऐसा ही किया परन्तु इसके बाद भी उन्हें कारावास में7 डाल दिया गया। उनका स्वास्थ्य लगातार बिगडता रहा और इसी के चलते कारावास की सजा गृह-कैद अर्थात अपने ही घर में कैद में रहने की सजा में बदल दिया गया। अपने जीवन का आखिरी दिन भी उन्होंने इसी कैद में ही बिताया।महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हिंदू शब्द के जन्मदाता और हिंदू राष्ट्र के प्रणेता वीर विनायक दामोदर सावरकर ने हिंदुओं के निरंतर धर्म परिवर्तन के बारे में भारी चिंता व्यक्त की उनका कहना था कि इस्लाम के लिए राजनीतिक विजयगढ़ होती है जबकि धर्म की विजय मुख्य होती है भारत में भी मुस्लिम आक्रमणकारियों का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक विजय प्राप्त कर हिंदू राष्ट्र से उसे मुस्लिम राष्ट्र बनाना था तथा राज्य प्रतीक मुस्लिम शासक ने भारत को दारु हरब से दारुल इस्लाम बनाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके से हिंदुओं को बलात मुसलमान बनाया, सावरकर ने असम मणिपुर त्रिपुरा नागालैंड मेघालय मिजोरम आदमी ईसाई मिशनरियों द्वारा हिंदुओं को बलात ईसाई बनाए जाने पर भी गहरी चिंता व्यक्त की उनका मत था कि हिंदुस्तान के लिए अंग्रेजों का राजनैतिक आधिपत्य इतना हानिकारक नहीं था ,जितना कि ईसाई मिशनरियों द्वारा हिंदुओं का धर्म परिवर्तन सावरकर का उद्घोष था, धर्मांतरण या राष्ट्रान्तरण तरण अर्थात हिंदू का धर्म परिवर्तन होने से उसकी हिंदुस्तान के प्रति आस्थायें भी बदल जाती है, रोम का वेटिकन सिटी और कैथोलिक चर्च किस तरह पूरे विश्व का धर्मांतरण करने के लिए निरंतर सक्रिय हैं यह इस बात से ही पता चलता है कि जब 23 जनवरी 1915 को पोप फ्रांसिस ने ट्वीट करते हुए कहा था कि"practing charity is the way to evangelize" अर्थात सेवा इवेंजलाइजेशन( ईसाई बनाने) का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है ,इसी प्रकार 7 नवंबर 1999 को ईसाइयों के सबसे बड़े धर्म गुरु पोप जॉन पौल का आगमन जब भारत में हुआ तो उन्होंने दिल्ली में कहा था कि इसाईयत की पहली सहस्त्राताब्दी में हमने यूरोप को इसाई बनाया दूसरी सहस्राब्दी में हमने अमेरिका ऑस्ट्रेलिया अफ्रीका आदि महाद्वीपों में ईसाइयत का झंडा फहराया, और इस सहस्राब्दी में हमें पूरे एशिया को इस इसाईयत के झंडे तले लाना है ,पोप जॉन पाॅल ने यह भी कहा कि अगली सहस्राब्दी में उनके धर्मांतरण के लिए कॉल पर दृष्टि नहीं खोनी है अर्थात"BUT NOT TO LOSE SIGHT OF THEIR "CALL TO CONVERSION "IN THE NEXT MILLENNIUM "
शेष अगले अंतिम भाग में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
MCOM,LLB,MBA(HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा

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