भारतीय समाज मेे जब कभी स्त्री आधिकारो पर विचार विमर्श करने की बात आती है तो न जाने क्यो हमेशा से ही पुरूष मानसिकता अतयन्त छोटी,संकुचित दिखाई पडने लगती है। स्त्री को मात्र भोग्य, दासी समझने वाला स्वर्थी पुरूष स्त्री अधिकारों पर प्रायः मौन साध से लेता है ऐसा क्यों? क्या वह यह नहीं समझता कि परिवर्तन इस संसार का संाश्वत नियम है।पुराने कानूनों को उसकी अनुपयोगिता के आधार पर जब समाप्त किया जा सकता है तो तेरह अखाडों की जगह समय की माॅग के अनुसार चैदह अखाडे भला क्यों नही हो सकते है। स्त्री के संशक्तिकरण की बाते तो हम बहुत करते है किन्तु जब उस स्त्री को अधिकार देने की बात आती है तो नियम कानूनों,प्रथाओं, परम्पराओं का रोना रोकर हम अपनी संकुचित स्वार्थ भी मानसिकता का परिचय भला क्यो देते है आज यदि आदि शंकराचार्य होते तो बढ़ते हुए स्त्री प्रभाव उनके अधिकारों का ध्यान रख उन्हें सशक्तिकरण का अधिकार देकर निश्चित रूप से चैदहवे अखाड़े को स्त्री अखाड़े के रूप में मान्यता प्रदान कर उसका श्रजन कर देते आज होना यह चाहिए कि स्त्री को भोग्या या दासी मानकर अपनी सेवा कराने वाले पुरूष आगे आगर स्त्री अधिकारों के लिए लड़ाई लडे़ देश के सन्त महंतों से यह विनम्र अनुरोध है कि एक नये स्त्री अखाड़े को मान्यता देकर अपनी रूढि़वादी , संकुचित स्वार्थी व वर्चस्व स्थापित करने वाली अपनी सोच को तिलांजलि दे दे यही समय की माँग है हिन्दू महासभा सभी तेरह अखाड़ो के प्रमुखों सहित अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंतनरेन्द्र गिरि से यह विनम्र व सम्मानपूर्वक अनुरोध करती है कि चैदहवे अखाड़े के रूप में परी अखाड़े को मान्यता प्रदान कर एक नये इतिहास नई सोच नई परम्परा व नई पहल की शुरूआत कर विश्व के सामने भारत की छवि और सशक्त करने की राह खोलें ।

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