आरक्षण की यह आग कब बुझेगी
मनीष पाण्डेय
अधिवक्ता/पत्रकार
प्रदेश प्रवक्ता अखिल भारत हिन्दू महासभा उ0प्र0
मनीष पाण्डेय
अधिवक्ता/पत्रकार
प्रदेश प्रवक्ता अखिल भारत हिन्दू महासभा उ0प्र0
आरक्षण की आग में जलते हुऐ गुजरात को टी0बी0 चैनलो के माध्यम से जब जलते हुए देखा तो दुख भी हुआ और क्रोध भी आया हार्दिक पटेल पर नहीं बल्कि देश के उन नीति निर्धारकों, तथा कथित समाजसेवी राजनेताओं पर जिन्होनें आरक्षण का राजनीतिकरण करते हुए अपने अपने हितो को स्वार्थपूर्ण ढंग से साधते हुए अपनी अपनी राजनैतिक रोटियां सेकी, अपने स्वार्थ के आगे उन्होने न जाने कितने परिवारों को आरक्षण की बलि दे दी पर चढ़ाकर और उनकी लाशो के उपर चढ़कर न सिर्फ सत्ता सुन्दरी का वरण किया बल्कि अपना और अपने वाली पीढि़यों को भी एश्वर्य पूर्ण जिन्दगी जीने का रास्ता खोल दिया आरक्षण की आग लगाकर सेकुलरवाद का नारा बुलन्द करने वाली कांग्रेस रही हो, फिर चाहे समाजवाद का खोखला नारा देने वाली समाजवादी पार्टी या फिर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का दिखावा करने वाली बसपा रही हो या फिर राष्ट्र वादी व हिन्दुत्व का ढपोरशंखी राग अलापने वाली भाजपा सभी ने न सिर्फ इस आरक्षण रूपी सुन्दरी को भरपूर रूप से चाहा बल्कि बल्कि उसे तोड़ा मरोड़ा और भुनाने का कार्य किया। आज निश्चित रूप से बहस इस बात की होनी चाहिए थी कि जिस आरक्षण को 1949 में यह सोचकर बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने संविधान में जगह दी थी कि इससे गरीब दबी कुचली निरीह जनता का उद्धार व विकास होगा। समाज के अन्य वर्गो के साथ खड़े होकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करेगें। परन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत जिस आरक्षण को बाबा साहेब ने खुद 10 वर्षो की अवधि के लिए बनाकर ही कहा कि यह व्यवस्था मात्र 10 वर्ष के लिए ही है अर्थात 1960-61 के बाद इस व्यवस्था केा जारी रखना हितकर नही होगा परन्तु हुआ क्या 10 वर्ष की अवधि के लिए बना यह आरक्षण आज आग बनकर पूरे समाज को झुलसा/जला रहा है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और शर्मनाक स्थिति हमारे लिए भला क्या हो सकती है। सच तो यह है कि जिस आरक्षण को हमारे पुरोधाओं ने समाज को बदलने वाला एक बडे परिवर्तन के तौर पर देखा था। उसी आरक्षण ने समाज में विधटन पैदा कर दिया बाबा साहेब के आर्दशो, सोंच, कार्य, उददेश्य, भावनाओं, और विचारों को हमारे स्वार्थी राजनेताओ ने आरक्षण का उपयोग समाजकल्याण के लिए नहीं बल्कि अपने खुद के कल्याण और समाज में विघटन पैदा करने के लिए किया। विचारणीय प्रश्न यह भी है कि क्या आरक्षण को बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर द्वारा महज इसलिए संविधान में शामिल किया था कि इससे समाज में टूटन बढे समाज के लोग आपस में ही एक दूसरे के खूल के प्यास बन जाये। मण्डल कमीशन की आग को भला कौन भूल सकता है कितने लोग मरे कितनको खून बहा कितने महिलाओं की मांग का सिन्दूर उजड़ा कितनी महिलाएं विधवा हुयी पर स्वार्थी सत्तालोलूप हमारे राजनेताओं को भला इससे क्या मतलब आखिरकार हमारे उपर सैकडो वर्षो से राज करने वाले अंगे्रजो से इन राजनेताओं ने कुछ सीखा हो या ना सीखा हो पर फूट डालो शासन करो की नीति उन्होने जरूर सीखी और दुर्भाग्य से इस नीति का उपयोग आज हमारे उपर ही किया जा रहा है। इस बदलती व विपरीत परिस्थिति में हमें क्या करना होगा। यह सोचना हमारे अत्यन्त आवश्यक है। सर्व प्रथम अगर हम सच्चे मन से चाहते हो तो इस आरक्षण की व्यवस्था को खत्म किया जाना अति आवश्यक है। वर्तमान परिस्थिति में आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी भी गौर करने वाली है। न्यायालय ने कहा था कि जाति को पिछडेपन का आधार मानना गलत है। पिछडेपन की पहचान समाजिक आर्थिक और शैक्षणिक आधार पर हो सकती है। प्रश्न यह भी उठता है कि जिसका हल तलाशा जाना अत्यन्त आवश्यक है। कि क्या दबे कुचले और निरीह जनता क्या सिर्फ एस टी एस सी वर्ग में ही पायी जाती है। बाकी जातियों में नही है क्या। ़ आज आरक्षण के उपर हमारे पास मात्र तीन विकल्प ही मौजूद है। सर्व प्रथम आरक्षण को खत्म कर दिया जाये। दूसरा अगर आरक्षण को जारी रखना है। तो वह जाति के आधार पर नही बल्कि आर्थिक आधार पर हो और तीसरा सभी जातियो के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू हो। अब इन्ही तीन विकल्पो की समीक्षा करने का वक्त आ चुका है।
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