शायरी के पीछे एक जहरीली सोच नाम राहत इंदौरी
शायरी के पीछे जहरीली सोच, नाम••• राहत इंदौरी
मनीष पाण्डेय
कल एक ऐसे व्यक्ति की मौत हो गई, जो मेरी दृष्टि में ना सिर्फ देशद्रोही था बल्कि रामद्रोही भी, दुनिया को दिखाने के लिए तो वह व्यक्ति एक शायर था शायरी को ही हथियार बनाकर वह अक्सर अपनी जहरीली सोच को समाज के सामने उड़ेल देता था, और समाज की बेवकूफियां देखिए विशेषकर हिंदू समाज उसकी इसी जहरीली सोच पर वाह-वाह कर उठती थी, कल मैं सोशल मीडिया पर देख रहा था उसकी मौत पर न जाने कितने लोगों ने विधवा विलाप किया, ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उनका सगा वाला मर गया हो ,मेरी दृष्टि में राहत इंदौरी का क्या अस्तित्व क्या है उसके काले चेहरे के पीछे छिपी हुई कलुषित भावना पर आइये मैं चर्चा कर लेता हूं, 1992 में जब बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ तो राहत इंदौरी के लिए मानों हृदय पर व्रजपात हो गया था, कुछ कर तो सकते थे नहीं, किंतु अपनी शायरी को ही इन्होंने जहरीला हथियार बनाकर जनमानस के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था उनकी जहरीली शायरी थी" टूट रही है हर दिन मुझ में एक मस्जिद, इस बस्ती में रोज दिसंबर आता है, देश में जब सीएए तथा एनआरसी लागू किया गया तब इसका विरोध करते हुए राहत इंदौरी ने एक कवि सम्मेलन में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी को संविधान पढ़ने की बात तक कर डाली उन्होंने कहा अगर प्रधानमंत्री कम पढ़े लिखे हैं तो किसी पढ़े लिखे व्यक्ति से संविधान को पढ़वा ले, राहत इंदौरी यहीं नहीं रुके और उन्होंने फैज अहमद फैज की वह जहरीली रचना पढ़कर सीएए तथा एनआरसी का विरोध कर रहे मुसलमानों को भड़काने का कार्य किया था फैज अहमद फैज की वह जहरीली रचना मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं,
हम देखेंगेलाज़िम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि (क़यामत का) जिसका वादा हैजो लोह-ए-अज़ल (विधि के विधान) में लिखा हैजब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां (बड़े पहाड़) रुई की तरह उड़ जाएँगेहम महकूमों (शासितों) के पाँव तलेये धरती धड़-धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हकम (सत्ताधीश) के सर ऊपरजब बिजली कड़-कड़ कड़केगीजब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत (मूर्ति यहां सत्ता का प्रतीक) उठवाए जाएँगेहम अहल-ए-सफ़ा (साफ़-सुथरे लोग) मरदूद-ए-हरम (प्रवेश से वंचित लोग)मसनद पे बिठाए जाएँगे सब ताज उछाले जाएँगेसब तख़्त गिराए जाएँगेबस नाम रहेगा अल्लाह काजो ग़ायब भी है हाज़िर भीजो मंज़र (दृश्य) भी है नाज़िर (दर्शक) भी उट्ठेगा अन-अल-हक़ (मैं सत्य हूं) का नाराजो मैं भी हूँ और तुम भी होऔर राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा (आम जनता)जो मैं भी हूँ और तुम भी हो सीए और एनआरसी के विरोध में प्रदेश की संपूर्ण मुस्लिम समुदाय ने फैज अहमद फैज की संरचना को प्रमुख हथियार बनाकर पूरे देश में प्रदर्शन किए थे इस पर राहत इंदौरी ने कहा था कि जो इस रचना का विरोध कर रहे हैं उन्हें उर्दू का ज्ञान नहीं है मतलब यह कि सारे उर्दू का ज्ञान का ठेका राहत इंदौरी ने हीं ले रखा था, लाजिम है कि विरोध में वैसे तो हिंदू वीरो ने बहुत सी रचनाएं बना डाली और राहत इंदौरी और उन जैसे लोगों को मुंहतोड़ जवाब दिया उन्हीं में एक रचना मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ हम देखेंगे....
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो कृष्ण ने गीता में कहा है
जब अधर्मी बढ़ जायेंगे
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम सहिष्णुओं के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और आताताईयों के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब मर्यादा पुरुषोत्तम के अवध से
बाबरी गिराये जाएँगे
हम सनातन के उपासक , भक्ति से उपेक्षित
अवध को बुलाये जाएंगे
सब जख्म भरे जाएँगे
सब कलंक मिटाये जाएँगे
बस नाम रहेगा परमेश्वर का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उठेगा अह्म ब्रह्मास्मि का जयकारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी सनातनी धारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।।
सीएए और एनआरसी के विरोध में राहत इंदौरी ने जब सभी का खून शामिल है इस मिट्टी में क्या हिंदुस्तान किसी के बाप का है तो पूरे मुस्लिम समुदाय ने इसी रचना को पोस्टरों में छपवा कर दीवारों पर चिपका दिए थे तब राहत इंदौरी बड़े प्रसन्न हुए थे कि उनकी रचना संपूर्ण देश में आंदोलन के रूप में पढ़ी और दिखाई जा रही है, और तब भी हिंदू वीरों ने इसका मुंह तोड़ जवाब दिया था हिंदू वीरों का भरपूर जवाब भी सुन लीजिएखफा होते है हो जाने दो, घर के मेहमान थोड़ी है
जहाँ भर से लताड़े जा चुके है, इनका मान थोड़ी है
ये कृष्ण-राम की धरती, सजदा करना ही होगा
मेरा वतन ये मेरी माँ है, लूट का सामान थोड़ी है
मैं जानता हूँ, घर में बन चुके है सैकड़ों भेदी
जो सिक्कों में बिक जाए वो मेरा ईमान थोड़ी है
मेरे पुरखों ने सींचा है इसे लहू के कतरे कतरे से
बहुत बांटा मगर अब बस, खैरात थोड़ी है
जो रहजन थे उन्हें हाकिम बना कर उम्र भर पूजा
मगर अब हम भी सच्चाई से अनजान थोड़ी है ?
बहुत लूटा फिरंगी तो कभी बाबर के पूतों ने
ये मेरा घर है मेरी जाँ, मुफ्त की सराय थोड़ी है
एक और उर्दू के शायर है मुनव्वर राणा इनकी भी वही गहरी सोच है जो राहत इंदौरी की है सीए एनआरसी पर इन्होंने खूब बवाल काटा था आज भी काट रहे हैं बाबरी विध्वंस का दुख इन्हें भी है और राम मंदिर बनने का बेहद दुख भी है आज राहत इंदौरी के मरने से जो लोग छाती कूट कूट कर विधवा विलाप करने का नाटक कर रहे हैं उनकी कब्र पर जाकर फातिहा पढ़ने का प्लान बनाए हुए हैं जो दोगले हिंदू इनकी रचनाओं को सुनकर वाह-वाह कर उठते हैं, जो हिंदू सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़कर इसे विनम्र श्रद्धांजलि प्रदान कर रहे हैं उन्हें अपना डीएनए टेस्ट जरूर करा लेना चाहिए जय श्री राम वंदे मातरम हर हर महादेव
आपका ही
मनीष पांडेय
अधिवक्ता/पत्रकार
M•COM,LLB MBA(HR)
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