अरे सुनो कालनेमियो राम का नाम बदनाम ना करो
धरोहर, सभ्यता,संस्कृति,और इतिहास है, हमारी पहचान इसकी उपेक्षा पड़ेगी बेहद भारी?
मनीष पाण्डेय
पिछले कई वर्षों से मेरे द्वारा राम जन्मभूमि के मुद्दे पर मुखर होकर ना सिर्फ आंदोलन किया गया बल्कि कई स्तरों पर भव्य राम मंदिर निर्माण हेतु, एक ओर तो अधर्मी और विधर्मियों से, तो दूसरी ओर कुछ कालनेमियों से भी अनेक अवसरों पर विवाद में उलझना पड़ा, पिछले 30 वर्षों से हिंदू हितों के संघर्ष सहित हिंदू अस्मिता से जुड़े अनेक विषयों, मुद्दो पर न सिर्फ मैंने आवाज उठाई, बल्कि एक लंबा संघर्ष भी किया, राम जन्म भूमि के लिए यह संघर्ष दशकों से चल रहा है, और जब तक इस पृथ्वी पर हूं यह संघर्ष अनवरत प्रारंभ रहेगा चाहे हार मिले अथवा जीत, खैर अब आता हूं मूल मुद्दे पर, माननीय सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद भव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो चुका है,तो ऐसे में राम जन्मभूमि से जुड़े हुई सभी अनावश्यक विषयों पर विराम लग जाना चाहिए था, परन्तु ऐसा हो नहीं सका, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत कुछ अनुत्तरित प्रश्न ऐसे भी रह गए, जिनका हल तलाशा जाना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, उम्मीद तो यह थी कि राम मंदिर के निर्माण की घोषणा के साथ ही उन सभी प्रश्नों का हल भी निकल आएगा, जिसके लिए संघर्ष किया जा रहा था, किंतु दुर्भाग्यवश यह देखने में आया कि कुछ स्वार्थी और कालनेमि तत्व इन विषयों को बहुत हल्के में ले रहे थे, और उस विषय पर गंभीर नहीं है, तब एक नया आंदोलन का प्रारंभ किया गया यह था, प्रभु राम के नवनिर्मित होने वाला मंदिर विश्व का सबसे ऊंचा विशाल भव्यतम और गगनचुंबी मंदिर बने, साथी ही साथ नौ अन्य मांगों पर भी आंदोलन प्रारंभ किया गया, जिसमें प्रभु राम के समय के बने हुए सरोवर व कुंड को चिन्हित कर उनका निर्माण ,भू माफियाओं द्वारा उन पर कब्जा हटाना, और उनका जीर्णोद्धार कर उन्हें पुराने स्वरूप में लाना भी शामिल था, वीर बलिदानी कारसेवकों की आर्थिक स्थिति को सुधारना, और उन्हें बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना, इत्यादि मांगे संघर्ष में शामिल थी, इसी प्रकार जब यह समाचार प्राप्त हुआ कि राम जन्मभूमि परिसर के अंदर और बाहर उन मंदिरों को तोड़ा जाना है,जो कभी ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व के स्थल हुआ करते थे, जैसे राम चबूतरा जिसके इर्द-गिर्द पूरा राम जन्मभूमि का आंदोलन घूमता रहा पूरे आंदोलन का केंद्र बिंदु यही राम चबूतरा था, 17 × 21 फुट राम चबूतरा जिसे जन्म स्थान माना गया था, और 29 जनवरी 1885 को निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवर दास जी द्वारा आजादी से पहले मुकदमा न्यायालय में प्रस्तुत किया गया तब न्यायालय ने भी उसे जन्मस्थान ही माना था, 9 नवंबर 1989 को विश्व हिंदू परिषद द्वारा इसी चबूतरे के बराबर शिलान्यास भी किया गया था इसी प्रकार साक्षी गोपाल का मंदिर, मानस भवन, शेषा अवतार मंदिर, आदि अन्य मंदिरों को भी तोड़ने की प्रक्रिया चल रही है ,ऐतिहासिक कंदर्पकूप को तो लगभग विलीन हो गया है, परंतु जो मंदिर बचे हैं, उन्हें बचाया जाना चाहिए ऐसा मेरा विचार है हम नया सृजन तो करें किंतु पुरातन को भी सहेज कर रखें यही हमारी पहचान होनी चाहिए, फिलहाल इस मुद्दे पर एक नया संघर्ष प्रारंभ करने जा रहा हूं ,कामयाबी कहां तक मिलेगी, यह तो पता नहीं किंतु संघर्ष अवश्य होगा आवाज अवश्य उठेगी, हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है आज इस लेख के माध्यम से आप सभी राम भक्तों के समक्ष मैं उन स्थानों का महत्व, बताने जा रहा हूं जिन स्थानों को ध्वस्त कर इतिहास के पन्नों में समेट देने का कुचक्र रचा जा रहा है
कंदर्पकूप का इतिहास
श्री राम जन्म भूमि के द्वार पर कंदर्प उपनाम का एक पास आरंभ निर्मित नव कोण का एक कूप था इसी कूप में स्नान करने से वृद्ध मनुष्य में भी कंदर्प अर्थात कामदेव के समान सुंदर हो जाया करते थे राजा ययाति जो अपने पुत्र पूरू से योवनत्व को प्राप्ति करने के पश्चात इसी कूप में स्नान कर कंदर्प के समान स्वरूप प्राप्त कर रति कन्या काम पुत्री से विवाह कर अक्षय यौवन का सुख लूटा था, सन 1966 में औरंगजेब ने श्री राम जन्म भूमि पर जब आपका मन किया तो आक्रमण दौरान मारे गए हिंदुओं के शवों को इसी कूप में भरवा कर बंद करवा दिया था, और इसके किनारे किनारे एक हाथ ऊंची पक्की दीवार उठा कर इसका नाम गज शहीदा रख दिया था, ब्रह्म पुराण के अनुसार
यत्रतु निर्मल:कूपों नाम्ना कन्दर्प कूपक:
यत्रसमात्वा ययतिस्तु यौवनं प्राप्त पुरा
यश्य च स्पर्श मात्र सुन्दत्व कृतामपाम्
प्राप्नुयात दानवों रूपों कोटि काम
विमोहकम्
नवीकोण युतो रियो सुधा स्यादु जलाशयः
यःपिवेत् सततं वारिस शान्ति मधिगच्छति
अर्थात वहीं पर कंदर्प खूब नाम का एक निर्मल खूब है जिसमें महाराजा ययाति ने पूर्व काल में स्नान कर यौवन प्राप्त किया था जिसमें सौंदर्य वर्धक जल के स्पर्श मात्र से मनुष्य करोड़ों कामदेव को लज्जित करने वाला रूप प्राप्त करता है यह जिला से अत्यंत सुंदर नव कुंड का अमृत के समान मीठे जल से भरा हुआ है और जो इसका जलपान करता है वह महान शांति का अधिकारी बनता है
भगवान भगवान साक्षी गोपाल की कहानी
तेलग देश में गोदावरी नदी के तट पर "विघानगर" नाम की कोट देखि की प्राचीन राजधानी थी वहाँ एक वृद्ध ब्राह्मण रहते थे बड़े ही कुलीन भगवत भक्त थे घर में लड़के बहू पत्नी और एक अविवाहित बेटी थी उनकी इच्छा तीर्थयात्रा करने की थी गाँव के ही एक अनाथ लड़के को साथ लेकर जो की भगवान का भक्त था , तीर्थ यात्रा को जाने लगे. उस समय यात्रा पैदल होती थी।
यात्रा में युवक ने उस वृद्ध की खूब सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न वृद्ध ने वृन्दावन पहुंचने पर गोपालजी के मंदिर में कहा – बेटा ! तूने मेरी बहुत सेवा की है. मै जब वापस जाऊँगा तो यात्रा खत्म होते ही अपनी कन्या का विवाह युवक से कर दूँगा.
दोनों यात्रा करके वापस लौटे। पर चूंकि युवक गरीब था इसलिए लड़की के भाईयों ने अपनी बहन की शादी युवक से करना मना कर दिया। और उसे भागा दिया.
युवक ने इसे अपना अपमान माना और पंचायत बुलाई। पंचों ने ब्राह्मण से पूछा – पर चुकि उसके लडकों ने उसे पहले ही धमाका दिया था कि वाह कुछ भी न बोले तो जब पंचो ने पूछा - किसी कि साक्षी दे सकते हो ?
ब्राह्मण ने कहा – मुझे ठीक से याद नहीं है.अब पंचो ने युवक से कहा – जब ये ब्राह्मण तुम्हे पुत्री देने का वचन दे रहा था उस समय वहाँ कोई और भी था तुम किसी कि साक्षी दे सकते हो ?
युवक ने कहा- गोपाल जी के ही सामने इन्होने कहा था गोपाल जी को छोडकर और कोई मेरा साक्षी नहीं है .
एक वृद्ध पंच ने कहा - तो क्या तुम गोपाल जी को ला सकते हो गवाही के लिए ?
युवक ने कहा – हाँ ला सकता हूँ ?पर लाने के बाद इन ब्राह्मण को अपनी बेटी के साथ मेरा विवाह करना पड़ेगा .
सबने सहमति दे दी कि कभी मूर्ति भी गवाही देने आती है क्या .
युवक भगवतभक्त था इसलिए वह वापस वृन्दावन गया और गोपालजी के सामने रोने लगा।
गोपालजी ने प्रकट होकर कहा - कि वे उसकी गवाही देने साथ चलेंगें पर अगर रास्ते में उसने पलटकर देखा तो वे वहीं स्थिर हो जाएंगें।
युवक ने कहा – पर मुझे कैसे पता चलगा कि आप मेरे पीछे–पीछे आ रहे हो ?
भगवान ने कहा – मेरे पैरों में पायल कि आवाज आती रहेगी .
नगर के समीप पहुँचकर उसने सोचा कि एक बार देख तो लूँ भगवान मेरे पीछे आ रहे है या नहीं यह सोचकर युवक ने पीछे पलटकर देखा।गोपालजी वहीं स्थिर हो गए और बोले अब यही रहूँगा यही से साक्षी दूँगा तुम सबको यही बुला लाओ पर युवक का काम हो चुका था। गोपालजी का श्रीविग्रह जिसके लिए पैरों चलकर इतनी दूर आया उसे कन्या देना किसी के लिए भी परम सौभाग्य की बात थी। उससे गवाही अब कौन मांगता?
उस समय उडीसा के राजा पुरुषोत्तम देव थे. वे विघानगर के राजा की राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे पर उन्होंने मना कर दिया इस पर उडीसा के राजा ने विघानगर पर चढाई कर दी और साक्षी गोपाल जी से पुरी पधारने की प्रार्थना की भगवान प्रसन्न होकर पुरी पधारे और वहां श्रीजगन्नाथजी के मंदिर में स्थापित कर दिया पर जगन्नाथजी को जाने वाला सब भोग गोपालजी पहले ही लगा लेते थे।
इससे श्रीजगन्नाथजी ने स्वप्र दिया जिससे गोपालजी की जगह तो सत्यनारायण भगवान की मूर्ति स्थपित हुई और श्रीगोपालजी पुरी से 15 किलोमीटर दूर सत्यवादी ग्राम में पधराये गए।तब से वही विराजमान है.
यहां मंदिर के पास ही चंदन तालाब है जिसमें स्नान करने के बाद ही श्रीगोपालजी के दर्शन किए जाते हैं। पुरीधाम की यात्रा का साक्षी यहां गोपालजी को माना जाता है इसलिए यात्री पुरी की यात्रा करके यहां जरूर आते हैं।
इनकी महिमा बड़ी अपार है एक बार उडीसा देश की महारानी इनके दर्शन के लिए पधारी इनकी मनमोहनी बांकी -झाँकी देखकर मुग्ध हो गई. उनकी इच्छा हुई कि यदि भगवान कि नाक छिदी होती तो मै अपने नाक का बहुमूल्य मोती भगवान को पहनती.
भगवान ने स्वप्न में कहा - कि तुम्हारी मनोकामना पुरी होगी पुजारियों को पता ही नहीं है कि मेरी नाक में छेद है अगले दिन महारानी ने पुजारी से कहा जब पुजारी ने देखा तो सचमुच भगवान कि नाक में छेद था महारानी ने बड़े प्रेम से वाह बहुमूल्य मोती भगवान कि नाक में पहना दिया.
सवाल यह है कि अयोध्या से भगवान साक्षी गोपाल का क्या संबंध है कहा जाता है कि राम के अवतार के बाद उनके दर्शन करने के उद्देश्य से अनेक अवतारी भगवान जिसमें, वामन भगवान परशुराम भगवान जोकि जमदग्नि ऋषि से के साथ आए हुए थे ब्रह्मा जी भगवान नरसिंह भगवान वराह भगवान इंद्र भगवान वरुण इसी तरह अन्य भगवान भी श्री अयोध्या धाम पधारे थे उन्हीं में साक्षी गोपाल भगवान भी अयोध्या पधारे थे कहा यह भी जाता है कि जितने भगवान यहां अयोध्या में आऐ, और यहां ठहरे उन्हीं के नाम से उन स्थानों का नामकरण भी किया गया था जैसे ब्रह्मा जी जहां पर ठहरे थे उसे ब्रह्म कुंड भगवान नरसिंह क्योंकि प्रहलाद की सहायता इसलिए प्रह्लाद घाट परशुराम चुकी जमदग्नि के साथ आए थे इसलिए जमाना
गांव, भगवान वराह पर्स का क्षेत्र तुलसीदास की जन्मस्थली जिसे बड़ा क्षेत्र भी कहा जाता है कच्छप भगवान जोकि किछौछा में आई हुई थी आज जहां किछौछा मस्जिद है वही कच्छप भगवान का स्थान भी है, कालांतर में अधर्मी और विधर्मियों द्वारा कच्छप भगवान के स्थान को नष्ट कर उस पर मस्जिद का निर्माण कर दिया गया था जो कालांतर में किछौछा दरगाह के नाम से प्रसिद्ध हो गई भगवान इंद्र शक्कर और सचिव के साथ आए हुए थे और उन्हीं के नाम से यहां पर कुंड का भी निर्माण हुआ चौसठ योगिनी अभी यहां पर आई थी जिनके नाम से योगिनी कुंड का निर्माण हुआ भगवान वरुण यहां आए उनके नाम से बारुन बाजार का नाम रखा गया कहते हैं कृष्ण भगवान भी द्वापर में यहां आए हुए थे सप्त सागर के पास रमणीक स्थान देखकर वहीं पर ठहर गए और वहीं पर कालांतर में रुक्मणी कुंड का निर्माण किया गया, उस स्थान का एक नाम वेणु तीर्थ भी था, आज भी वहां रुक्मणी कुंड का पत्थर लगा हुआ है यह स्थान मुगल आक्रांता द्वारा कालांतर में बिजली बाबा की मजार बना दी गई, साक्षी गोपाल भगवान भी इसी तरह अयोध्या आए हुए थे और उन्हीं के नाम पर राम जन्मभूमि परिसर में ही साक्षी गोपाल मंदिर की स्थापना की गई थी,
सीता रसोई का इतिहास
कहते हैं कि प्रयागराज के संत देव मुरारी दास महाराज के शिष्य बाबा राम दास जिन्हें उर्फ गूदड बाबा बाबा के नाम से भी जाना जाता था 1730 ईसवी के आसपास बनवाया था पी• कार्नेगी ब्रिटिश काल में सेटेलमेंट कमिश्नर ने अपनी पुस्तक हिस्टोरिकल स्केच ऑफ तहसील फैजाबाद में लिखा है कि एक मुस्लिम मीर मासूम अली ने राम जन्मभूमि विवाद को सुलझाने के उद्देश्य से 1730 के आसपास अपनी एक बिस्वा जमीन दान में दी थी अमीर मासूम अली मौजा पुत्र राम चंद्र के तत्कालीन जमींदार थे यह बात अलग है कि इस प्रस्ताव को ना तो संत समाज नहीं माना था और ना ही श्रद्धालुओं द्वारा यह प्रस्ताव माना गया था, फिलहाल राम जन्मभूमि परिसर में कुल तेरह मंदिर ऐसे हैं, जो अपनी पौराणिकता और ऐतिहासिकता के लिए जाने जाते हैं जिन्हें आज जीवणोद्धार की आवश्यकता है, अगर हमने आज हमने अपनी इन धरोहरों, सहेजा नहीं , अक्षुण्ण नहीं रखा तू इतना निश्चित रूप से जान ले कि हमें भी इतिहास बनते देर नहीं लगेगी, इतिहास में हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में नहीं बल्कि काले अक्षरों में अंकित किया जाएगा याद रखना कालनेमियो•••••••••••••••
वतन की फिक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है, तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं, आसमानों में, न समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तान(के कालनेमियो) वालो, तुम्हारी दास्तां तक भी ना होगी दस्तानों में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
M•COM,L•L•B•,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिन्दू महासभा
प्लीज डू नॉट कट पेस्ट एंड कापी ओनली शेयर थैंक यू
मनीष पाण्डेय
पिछले कई वर्षों से मेरे द्वारा राम जन्मभूमि के मुद्दे पर मुखर होकर ना सिर्फ आंदोलन किया गया बल्कि कई स्तरों पर भव्य राम मंदिर निर्माण हेतु, एक ओर तो अधर्मी और विधर्मियों से, तो दूसरी ओर कुछ कालनेमियों से भी अनेक अवसरों पर विवाद में उलझना पड़ा, पिछले 30 वर्षों से हिंदू हितों के संघर्ष सहित हिंदू अस्मिता से जुड़े अनेक विषयों, मुद्दो पर न सिर्फ मैंने आवाज उठाई, बल्कि एक लंबा संघर्ष भी किया, राम जन्म भूमि के लिए यह संघर्ष दशकों से चल रहा है, और जब तक इस पृथ्वी पर हूं यह संघर्ष अनवरत प्रारंभ रहेगा चाहे हार मिले अथवा जीत, खैर अब आता हूं मूल मुद्दे पर, माननीय सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद भव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो चुका है,तो ऐसे में राम जन्मभूमि से जुड़े हुई सभी अनावश्यक विषयों पर विराम लग जाना चाहिए था, परन्तु ऐसा हो नहीं सका, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत कुछ अनुत्तरित प्रश्न ऐसे भी रह गए, जिनका हल तलाशा जाना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, उम्मीद तो यह थी कि राम मंदिर के निर्माण की घोषणा के साथ ही उन सभी प्रश्नों का हल भी निकल आएगा, जिसके लिए संघर्ष किया जा रहा था, किंतु दुर्भाग्यवश यह देखने में आया कि कुछ स्वार्थी और कालनेमि तत्व इन विषयों को बहुत हल्के में ले रहे थे, और उस विषय पर गंभीर नहीं है, तब एक नया आंदोलन का प्रारंभ किया गया यह था, प्रभु राम के नवनिर्मित होने वाला मंदिर विश्व का सबसे ऊंचा विशाल भव्यतम और गगनचुंबी मंदिर बने, साथी ही साथ नौ अन्य मांगों पर भी आंदोलन प्रारंभ किया गया, जिसमें प्रभु राम के समय के बने हुए सरोवर व कुंड को चिन्हित कर उनका निर्माण ,भू माफियाओं द्वारा उन पर कब्जा हटाना, और उनका जीर्णोद्धार कर उन्हें पुराने स्वरूप में लाना भी शामिल था, वीर बलिदानी कारसेवकों की आर्थिक स्थिति को सुधारना, और उन्हें बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना, इत्यादि मांगे संघर्ष में शामिल थी, इसी प्रकार जब यह समाचार प्राप्त हुआ कि राम जन्मभूमि परिसर के अंदर और बाहर उन मंदिरों को तोड़ा जाना है,जो कभी ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व के स्थल हुआ करते थे, जैसे राम चबूतरा जिसके इर्द-गिर्द पूरा राम जन्मभूमि का आंदोलन घूमता रहा पूरे आंदोलन का केंद्र बिंदु यही राम चबूतरा था, 17 × 21 फुट राम चबूतरा जिसे जन्म स्थान माना गया था, और 29 जनवरी 1885 को निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवर दास जी द्वारा आजादी से पहले मुकदमा न्यायालय में प्रस्तुत किया गया तब न्यायालय ने भी उसे जन्मस्थान ही माना था, 9 नवंबर 1989 को विश्व हिंदू परिषद द्वारा इसी चबूतरे के बराबर शिलान्यास भी किया गया था इसी प्रकार साक्षी गोपाल का मंदिर, मानस भवन, शेषा अवतार मंदिर, आदि अन्य मंदिरों को भी तोड़ने की प्रक्रिया चल रही है ,ऐतिहासिक कंदर्पकूप को तो लगभग विलीन हो गया है, परंतु जो मंदिर बचे हैं, उन्हें बचाया जाना चाहिए ऐसा मेरा विचार है हम नया सृजन तो करें किंतु पुरातन को भी सहेज कर रखें यही हमारी पहचान होनी चाहिए, फिलहाल इस मुद्दे पर एक नया संघर्ष प्रारंभ करने जा रहा हूं ,कामयाबी कहां तक मिलेगी, यह तो पता नहीं किंतु संघर्ष अवश्य होगा आवाज अवश्य उठेगी, हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है आज इस लेख के माध्यम से आप सभी राम भक्तों के समक्ष मैं उन स्थानों का महत्व, बताने जा रहा हूं जिन स्थानों को ध्वस्त कर इतिहास के पन्नों में समेट देने का कुचक्र रचा जा रहा है
कंदर्पकूप का इतिहास
श्री राम जन्म भूमि के द्वार पर कंदर्प उपनाम का एक पास आरंभ निर्मित नव कोण का एक कूप था इसी कूप में स्नान करने से वृद्ध मनुष्य में भी कंदर्प अर्थात कामदेव के समान सुंदर हो जाया करते थे राजा ययाति जो अपने पुत्र पूरू से योवनत्व को प्राप्ति करने के पश्चात इसी कूप में स्नान कर कंदर्प के समान स्वरूप प्राप्त कर रति कन्या काम पुत्री से विवाह कर अक्षय यौवन का सुख लूटा था, सन 1966 में औरंगजेब ने श्री राम जन्म भूमि पर जब आपका मन किया तो आक्रमण दौरान मारे गए हिंदुओं के शवों को इसी कूप में भरवा कर बंद करवा दिया था, और इसके किनारे किनारे एक हाथ ऊंची पक्की दीवार उठा कर इसका नाम गज शहीदा रख दिया था, ब्रह्म पुराण के अनुसार
यत्रतु निर्मल:कूपों नाम्ना कन्दर्प कूपक:
यत्रसमात्वा ययतिस्तु यौवनं प्राप्त पुरा
यश्य च स्पर्श मात्र सुन्दत्व कृतामपाम्
प्राप्नुयात दानवों रूपों कोटि काम
विमोहकम्
नवीकोण युतो रियो सुधा स्यादु जलाशयः
यःपिवेत् सततं वारिस शान्ति मधिगच्छति
अर्थात वहीं पर कंदर्प खूब नाम का एक निर्मल खूब है जिसमें महाराजा ययाति ने पूर्व काल में स्नान कर यौवन प्राप्त किया था जिसमें सौंदर्य वर्धक जल के स्पर्श मात्र से मनुष्य करोड़ों कामदेव को लज्जित करने वाला रूप प्राप्त करता है यह जिला से अत्यंत सुंदर नव कुंड का अमृत के समान मीठे जल से भरा हुआ है और जो इसका जलपान करता है वह महान शांति का अधिकारी बनता है
भगवान भगवान साक्षी गोपाल की कहानी
तेलग देश में गोदावरी नदी के तट पर "विघानगर" नाम की कोट देखि की प्राचीन राजधानी थी वहाँ एक वृद्ध ब्राह्मण रहते थे बड़े ही कुलीन भगवत भक्त थे घर में लड़के बहू पत्नी और एक अविवाहित बेटी थी उनकी इच्छा तीर्थयात्रा करने की थी गाँव के ही एक अनाथ लड़के को साथ लेकर जो की भगवान का भक्त था , तीर्थ यात्रा को जाने लगे. उस समय यात्रा पैदल होती थी।
यात्रा में युवक ने उस वृद्ध की खूब सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न वृद्ध ने वृन्दावन पहुंचने पर गोपालजी के मंदिर में कहा – बेटा ! तूने मेरी बहुत सेवा की है. मै जब वापस जाऊँगा तो यात्रा खत्म होते ही अपनी कन्या का विवाह युवक से कर दूँगा.
दोनों यात्रा करके वापस लौटे। पर चूंकि युवक गरीब था इसलिए लड़की के भाईयों ने अपनी बहन की शादी युवक से करना मना कर दिया। और उसे भागा दिया.
युवक ने इसे अपना अपमान माना और पंचायत बुलाई। पंचों ने ब्राह्मण से पूछा – पर चुकि उसके लडकों ने उसे पहले ही धमाका दिया था कि वाह कुछ भी न बोले तो जब पंचो ने पूछा - किसी कि साक्षी दे सकते हो ?
ब्राह्मण ने कहा – मुझे ठीक से याद नहीं है.अब पंचो ने युवक से कहा – जब ये ब्राह्मण तुम्हे पुत्री देने का वचन दे रहा था उस समय वहाँ कोई और भी था तुम किसी कि साक्षी दे सकते हो ?
युवक ने कहा- गोपाल जी के ही सामने इन्होने कहा था गोपाल जी को छोडकर और कोई मेरा साक्षी नहीं है .
एक वृद्ध पंच ने कहा - तो क्या तुम गोपाल जी को ला सकते हो गवाही के लिए ?
युवक ने कहा – हाँ ला सकता हूँ ?पर लाने के बाद इन ब्राह्मण को अपनी बेटी के साथ मेरा विवाह करना पड़ेगा .
सबने सहमति दे दी कि कभी मूर्ति भी गवाही देने आती है क्या .
युवक भगवतभक्त था इसलिए वह वापस वृन्दावन गया और गोपालजी के सामने रोने लगा।
गोपालजी ने प्रकट होकर कहा - कि वे उसकी गवाही देने साथ चलेंगें पर अगर रास्ते में उसने पलटकर देखा तो वे वहीं स्थिर हो जाएंगें।
युवक ने कहा – पर मुझे कैसे पता चलगा कि आप मेरे पीछे–पीछे आ रहे हो ?
भगवान ने कहा – मेरे पैरों में पायल कि आवाज आती रहेगी .
नगर के समीप पहुँचकर उसने सोचा कि एक बार देख तो लूँ भगवान मेरे पीछे आ रहे है या नहीं यह सोचकर युवक ने पीछे पलटकर देखा।गोपालजी वहीं स्थिर हो गए और बोले अब यही रहूँगा यही से साक्षी दूँगा तुम सबको यही बुला लाओ पर युवक का काम हो चुका था। गोपालजी का श्रीविग्रह जिसके लिए पैरों चलकर इतनी दूर आया उसे कन्या देना किसी के लिए भी परम सौभाग्य की बात थी। उससे गवाही अब कौन मांगता?
उस समय उडीसा के राजा पुरुषोत्तम देव थे. वे विघानगर के राजा की राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे पर उन्होंने मना कर दिया इस पर उडीसा के राजा ने विघानगर पर चढाई कर दी और साक्षी गोपाल जी से पुरी पधारने की प्रार्थना की भगवान प्रसन्न होकर पुरी पधारे और वहां श्रीजगन्नाथजी के मंदिर में स्थापित कर दिया पर जगन्नाथजी को जाने वाला सब भोग गोपालजी पहले ही लगा लेते थे।
इससे श्रीजगन्नाथजी ने स्वप्र दिया जिससे गोपालजी की जगह तो सत्यनारायण भगवान की मूर्ति स्थपित हुई और श्रीगोपालजी पुरी से 15 किलोमीटर दूर सत्यवादी ग्राम में पधराये गए।तब से वही विराजमान है.
यहां मंदिर के पास ही चंदन तालाब है जिसमें स्नान करने के बाद ही श्रीगोपालजी के दर्शन किए जाते हैं। पुरीधाम की यात्रा का साक्षी यहां गोपालजी को माना जाता है इसलिए यात्री पुरी की यात्रा करके यहां जरूर आते हैं।
इनकी महिमा बड़ी अपार है एक बार उडीसा देश की महारानी इनके दर्शन के लिए पधारी इनकी मनमोहनी बांकी -झाँकी देखकर मुग्ध हो गई. उनकी इच्छा हुई कि यदि भगवान कि नाक छिदी होती तो मै अपने नाक का बहुमूल्य मोती भगवान को पहनती.
भगवान ने स्वप्न में कहा - कि तुम्हारी मनोकामना पुरी होगी पुजारियों को पता ही नहीं है कि मेरी नाक में छेद है अगले दिन महारानी ने पुजारी से कहा जब पुजारी ने देखा तो सचमुच भगवान कि नाक में छेद था महारानी ने बड़े प्रेम से वाह बहुमूल्य मोती भगवान कि नाक में पहना दिया.
सवाल यह है कि अयोध्या से भगवान साक्षी गोपाल का क्या संबंध है कहा जाता है कि राम के अवतार के बाद उनके दर्शन करने के उद्देश्य से अनेक अवतारी भगवान जिसमें, वामन भगवान परशुराम भगवान जोकि जमदग्नि ऋषि से के साथ आए हुए थे ब्रह्मा जी भगवान नरसिंह भगवान वराह भगवान इंद्र भगवान वरुण इसी तरह अन्य भगवान भी श्री अयोध्या धाम पधारे थे उन्हीं में साक्षी गोपाल भगवान भी अयोध्या पधारे थे कहा यह भी जाता है कि जितने भगवान यहां अयोध्या में आऐ, और यहां ठहरे उन्हीं के नाम से उन स्थानों का नामकरण भी किया गया था जैसे ब्रह्मा जी जहां पर ठहरे थे उसे ब्रह्म कुंड भगवान नरसिंह क्योंकि प्रहलाद की सहायता इसलिए प्रह्लाद घाट परशुराम चुकी जमदग्नि के साथ आए थे इसलिए जमाना
गांव, भगवान वराह पर्स का क्षेत्र तुलसीदास की जन्मस्थली जिसे बड़ा क्षेत्र भी कहा जाता है कच्छप भगवान जोकि किछौछा में आई हुई थी आज जहां किछौछा मस्जिद है वही कच्छप भगवान का स्थान भी है, कालांतर में अधर्मी और विधर्मियों द्वारा कच्छप भगवान के स्थान को नष्ट कर उस पर मस्जिद का निर्माण कर दिया गया था जो कालांतर में किछौछा दरगाह के नाम से प्रसिद्ध हो गई भगवान इंद्र शक्कर और सचिव के साथ आए हुए थे और उन्हीं के नाम से यहां पर कुंड का भी निर्माण हुआ चौसठ योगिनी अभी यहां पर आई थी जिनके नाम से योगिनी कुंड का निर्माण हुआ भगवान वरुण यहां आए उनके नाम से बारुन बाजार का नाम रखा गया कहते हैं कृष्ण भगवान भी द्वापर में यहां आए हुए थे सप्त सागर के पास रमणीक स्थान देखकर वहीं पर ठहर गए और वहीं पर कालांतर में रुक्मणी कुंड का निर्माण किया गया, उस स्थान का एक नाम वेणु तीर्थ भी था, आज भी वहां रुक्मणी कुंड का पत्थर लगा हुआ है यह स्थान मुगल आक्रांता द्वारा कालांतर में बिजली बाबा की मजार बना दी गई, साक्षी गोपाल भगवान भी इसी तरह अयोध्या आए हुए थे और उन्हीं के नाम पर राम जन्मभूमि परिसर में ही साक्षी गोपाल मंदिर की स्थापना की गई थी,
सीता रसोई का इतिहास
कहते हैं कि प्रयागराज के संत देव मुरारी दास महाराज के शिष्य बाबा राम दास जिन्हें उर्फ गूदड बाबा बाबा के नाम से भी जाना जाता था 1730 ईसवी के आसपास बनवाया था पी• कार्नेगी ब्रिटिश काल में सेटेलमेंट कमिश्नर ने अपनी पुस्तक हिस्टोरिकल स्केच ऑफ तहसील फैजाबाद में लिखा है कि एक मुस्लिम मीर मासूम अली ने राम जन्मभूमि विवाद को सुलझाने के उद्देश्य से 1730 के आसपास अपनी एक बिस्वा जमीन दान में दी थी अमीर मासूम अली मौजा पुत्र राम चंद्र के तत्कालीन जमींदार थे यह बात अलग है कि इस प्रस्ताव को ना तो संत समाज नहीं माना था और ना ही श्रद्धालुओं द्वारा यह प्रस्ताव माना गया था, फिलहाल राम जन्मभूमि परिसर में कुल तेरह मंदिर ऐसे हैं, जो अपनी पौराणिकता और ऐतिहासिकता के लिए जाने जाते हैं जिन्हें आज जीवणोद्धार की आवश्यकता है, अगर हमने आज हमने अपनी इन धरोहरों, सहेजा नहीं , अक्षुण्ण नहीं रखा तू इतना निश्चित रूप से जान ले कि हमें भी इतिहास बनते देर नहीं लगेगी, इतिहास में हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में नहीं बल्कि काले अक्षरों में अंकित किया जाएगा याद रखना कालनेमियो•••••••••••••••
वतन की फिक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है, तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं, आसमानों में, न समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तान(के कालनेमियो) वालो, तुम्हारी दास्तां तक भी ना होगी दस्तानों में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
M•COM,L•L•B•,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिन्दू महासभा
प्लीज डू नॉट कट पेस्ट एंड कापी ओनली शेयर थैंक यू
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