जब जब होई धरम कै हानि
जब जब होई धरम कै हानि, बारहि असुर अधम अभिमानी
अयोध्या में यह अधर्म और अन्याय भला क्यों?
मनीष पाण्डेय
राम राम जन्मभूमि परिसर में ऐसे अनेक मंदिर विद्यमान हैं जिनका अपना पौराणिक महत्व है एक उसी में एक कंदर्पकूप भी है साक्षी गोपाल का मंदिर भी है और मानस भवन भी है और वह ऐतिहासिक राम चबूतरा भी है जिसके इर्द-गिर्द पूरी राम जन्मभूमि का आंदोलन टिका हुआ था, यह वही राम चबूतरा था जिस पर वर्षों तक निर्मोही अखाड़े का कब्जा था और उसके द्वारा प्रभु राम की मूर्ति स्थापित कर पूजा अर्चना की गई थी, राम चबूतरे का अपना पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राम जन्मभूमि आंदोलन का मुख्य केंद्र बिंदु ही राम चबूतरा रहा है अब ऐसे में एक विध्वंस कारी निर्णय लेते हुए जिस तरह इन स्थानों को तोड़ने का निर्णय लिया गया है वह अनर्थ और अधर्म नहीं तो और क्या है? ऐसे में जब अयोध्या की पवित्र पावन भूमि पर राम मंदिर का निर्माण होने जा रहा है तो यह आवश्यक था कि इन ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों की सुरक्षा की जाती है उनका जीवन उद्धार किया जाता जिससे कि आने वाली पीढ़ियां उन स्थानों को देखकर भाव विभोर होती, किन्तु अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए जिस तरह कुछ कॉलनेमियों द्वारा इन स्थानों को नष्ट किया जा रहा है वह अपने आप में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक भी है,
500 वर्षों के कालखंड में राम जन्म भूमि को विधर्मी और विधर्मियों मुक्त कराने के लिए ना जाने कितने संघर्षो की गवाह यह अयोध्या की पवित्र पावन भूमि रही है, 1527-1528 से आरंभ हुआ यह युद्ध, यह संघर्ष, न सिर्फ इस्लामिक आततायियों, जिहादियों आतंकियों के विरुद्ध था बल्कि यह युद्ध यह संघर्ष उन कालनेमियो के विरुद्ध भी था, जिन्होंने कदम कदम पर मुगल आक्रांता से गठजोड़ करके श्री राम जन्मभूमि आंदोलन में निरंतर बाधा डाल रहे थे 1527- 28 से प्रारंभ हुआ उसे संघर्ष का पटाक्षेप तब हो गया जब 1992 में वीर हिंदुओं ने अपनी गौरवशाली परंपरा का निर्वहन करते हुए उस कलंक को ध्वस्त किया जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाता था, सवाल यह उठता है कि क्या 1992 के उपरांत इस लड़ाई अथवा संघर्ष का अंत हो गया? अथवा यह संघर्ष यह लड़ाई एक अपने नए रूप में एक नए कलेवर में हिंदू समाज के सम्मुख आ खड़ी हुई, दुर्भाग्यवश से इसकी अनदेखी हिंदू समाज लगातार करता हुआ आ रहा है ,जब हम राम जन्म भूमि की रक्षार्थ की बातें करते हैं, तो सिर्फ राम मंदिर की ही रक्षार्थ की बातें नहीं करते हैं, बल्कि प्रभु राम से जुड़ी हुई उस संस्कृति उस सभ्यता उन चिन्हों, के संजोने उन्हें सवारने की भी बातें करते हैं , जिन्हें स्वयं प्रभु श्री राम ने अपने दिशा निर्देशन में बनवाया था, दुर्भाग्यवश आज इन चीजों को नष्ट करने का कार्य मुगल आक्रांताओं द्वारा नहीं बल्कि अपने ही बीच के कालनेमिओं द्वारा किया जा रहा है रुद्रयामल और स्कंद पुराण में यह वर्णित है कि जब प्रभु श्री राम ने अयोध्या का राजकाज संभाला तब उनका राज्याभिषेक बड़ी धूमधाम के साथ मनाया गया था उस राज्याभिषेक में, उनके साथ आए हुए विभिन्न साधु संतों, महात्माओं राजा रानियों, पुत्रों, राजा दशरथ, उनकी रानियों ,इत्यादि इत्यादि के नाम से अयोध्या की पवित्र पावन भूमि पर विभिन्न सरोवर, कुंड, और तालाबों, का निर्माण करवाया गया था कालांतर में 1902 में तत्कालीन आईसीएसआर सी. होवर्ड द्वारा एक समिति का गठन किया गया जिसका नाम था एडवर्ड अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा, उस समय इंग्लैंड में एडवर्ड सप्तम का राज्यारोहण हुआ था उसी उपलक्ष में एक उत्सव यह भी मनाया गया उत्सव म्हारो को संपादित करने हेतु एक कमेटी का गठन हुआ समारोह के उपरांत सभी प्रकार के हुए व्यय के पश्चात अकाउंट मैं ₹1000 बच गए थे उन्हें ₹1000 से अयोध्या के उन तीर्थ क्षेत्रों में इतिहास पुराणों से प्रमाणित शिलालेख लगवाए गए इन शिलालेखों की कुल संख्या 148 थी दुर्भाग्यपूर्ण तुमसे कालांतर में इन्हीं कुडों और सरोवर पर भू माफियाओं और उनके वरदहस्त नेताओं तथा प्रशासनिक अमले की कुदृष्टि गड़ गई, और अपने स्वार्थ के लिए इस स्थानों की प्लॉटिंग करा कर धीरे-धीरे उनका अस्तित्व समाप्त कर दिया गया, दुर्भाग्य से आज गिनती के सरोवर और कुंडों का अस्तित्व बचा हुआ है, बाकी अधिकांश पर या तो इन भू माफियाओं का कब्जा है अथवा इनके द्वारा निरंतर बेचा जा रहा है जरा सोचिए जब राम मंदिर का निर्माण संपन्न होगा तब बाहर के आए हुए राम भक्तों श्रद्धालुओं को यहां पर देखने के लिए क्या-क्या मिलेगा राम के समय के बने हुए कुंड और सरोवर का अस्तित्व समाप्त ही हो चुका होगा? मंदिर परिसर में मौजूद कंदर्पकूप का अस्तित्व समाप्त हो चुका है अब राम चबूतरा साक्षी गोपाल मंदिर मानस भवन का कुछ हिस्सा भी समाप्ति की ओर है आपकी जानकारी हेतु मैं यह बता दूं कि मंदिर परिसर में मौजूद शेषावतार, साक्षी गोपाल, सीता रसोई, श्रीराम जन्मस्थान, आनंद भवन, राम खजाना, बहराइच मंदिर, सुमित्रा भवन,कैकईभवन ,विश्वामित्र आश्रम, मानस भवन सहित अन्य कई मंदिरों को अधिग्रहण के समय शामिल किया गया था,और निश्चित रूप से आगे भी ऐसे ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों को समाप्त किया जाएगा 500 वर्षों के कालखंड में हमने प्रभु राम से जुड़ी हुई चीजों को बचाने में लगा दिया और अब अपने ही स्वार्थ में डूब कर अपने ही हाथों में हम उन वस्तुओं उन्हें चिन्हों को नष्ट करने में लगे हुए हैं यह अन्याय और अधर्म नहीं तो और फिर क्या है,? हम राम भक्त इसके लिए सिर्फ यही कह सकते हैं कि
"जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेही|" हे प्रभु श्री राम इन कालनेमियों को सद्बुद्धि प्रदान करो क्योंकि इन पर कलयुग का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है
"धर्मो जितो ह्यधर्मेण जितः सत्योऽनृतेन च ।जिता भृत्यैस्तु राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः ॥
जय श्री राम वंदे मातरम हर हर महादेव
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
M•COM•LLB•MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता में हिंदू महासभा
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