न्यायमूर्ति के•एम•पांडेय:- राम जन्मभूमि का ताला खुलवाकर जिन्होंने दिया था, स्वतंत्र भारत का अद्भुत अकल्पनीय व अविश्वसनीय निर्णय

न्यायमूर्ति के•एम•पांडेय:- राम जन्मभूमि का ताला खुलवाकर जिन्होंने दिया था, स्वतंत्र भारत का अद्भुत अकल्पनीय व अविश्वसनीय निर्णय मनीष पांडेय क्या आपने अपने जीवन में किसी ऐसी घटना देखा या सुना है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के किसी न्यायालय द्वारा एक ही दिन में किसी अधिवक्ता द्वारा प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया हो और उसी दिन उसकी सुनवाई होकर शाम तक निर्णय देते हुए यह कहा गया हो कि इस निर्णय का कार्यान्वयन 1 घंटे से कम समय में हो जाना चाहिए ऐसा चमत्कार हुआ जनपद फैजाबाद मैं जो अब अयोध्या के नाम से जाना जाता है , 25 जनवरी 1986 को अधिवक्ता उमेश चंद्र पांडे ने फैजाबाद के मुंसिफ सदर हरिशंकर द्विवेदी के न्यायालय में ताला खुलवाने हेतु प्रार्थना पत्र दिया था प्रार्थना पत्र में अधिवक्ता उमेश चंद्र पांडेय ने लिखा कि उनके व अन्य हिंदू समुदाय द्वारा जन्म स्थान पर पूजा और अर्चना की जाती है अतः जन्मभूमि की पूजा पर प्रतिबंध ना लगाया जाए तथा वहां लगे तालों को खोल दिया जाए, माननीय मुंसिफ सदर हरिशंकर द्विवेदी ने 28 जनवरी 1986 को यह कहते हुए प्रार्थना पत्र को निस्तारित करने में असमर्थता जताई कि चूंकि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है और चल रही कार्रवाई के तहत ही आदेश जारी किए जा सकते हैं उस समय न्यायालय में नियमित रूप से चल रहे मुकदमे में गोपाल सिंह ही विशारद सूट नंबर 2 1950 सुन्नी वक्फ बोर्ड रामचंद्र परमहंस की अपील है सूट नंबर 12, 1961 सूट नंबर 25, 1950 सूट नंबर 36, 1954 के मामले में ही उमेश चंद्र पांडे का प्रार्थना पत्र शामिल कर दिया तब 31 जनवरी 1986 को अधिवक्ता उमेश चंद्र पांडेय, ने मुंसिफ सदर के इस निर्णय के विरुद्ध जिला एवं सत्र न्यायालय में जिला जज कृष्ण मोहन पांडे(K M Pandey) के न्यायालय में अपील दायर की, जिला जज कृष्ण मोहन पांडे द्वारा इसे स्वीकार कर लिया गया अगला दिन अर्थात 1 फरवरी 1986 का ऐतिहासिक दिन जिस दिन जिला जज महोदय ने पूरे दिन सुनवाई के बाद निर्णय भी उसी दिन देने का फैसला किया 4:40 पर ताला खोलने का आदेश दे दिया गया यह कहते हुए की जितनी देर न्यायालय से राम जन्मभूमि पहुंचने के लिए लगता है उतने समय में प्रशासन वहां जाकर ताला खोल दे यह समय 5:20 का था अर्थात 1 घंटे से भी कम का समय स्वतंत्र भारत का ऐसा पहला मुकदमा जिसकी सुनवाई एक ही दिन में हुई , निर्णय भी 1 दिन में हुआ हुआ, और निर्णय पर क्रियान्वयन में भी एक ही दिन में हुआ हो,जी हाँ वह,यही मुकदमा था ,इससे पहले की मैं इस मुकदमे के अहम पड़ाव आपके सम्मुख प्रस्तुत करूं, हम सबको यह जान लेना आवश्यक है कि जिला जज कृष्ण मोहन पांडे को आखिर का ताला खुलवाने की प्रेरणा कहां से मिली, जब जिला जज कृष्ण मोहन पांडे अपने पद से रिटायर हुए तो उन्होंने अपनी आत्मकथा के रूप में "वॉइस ऑफ कांशस" नामक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने उन कारणों पर प्रमुख रूप से प्रकाश डाला जिसके अंतर्गत उन्हें यह ताला खुलवाने की प्रेरणा मिली जिला जज के एम पांडेय लिखते हैं कि 1 फरवरी 1986 अर्थात जिस दिन सुनवाई का दिन था वह सुबह सुबह अयोध्या हनुमानगढ़ी पर पूजा पाठ करने के उद्देश्य से गए हुए थे वहीं पर एक साधु उन्हें मिले, जज के एम पांडेय ने उनसे राम जन्म भूमि के ताले लगे होने के विषय में पूछा तो साधु महाराज कुपित होकर इसका दोष राजनेताओं और प्रशासन पर लगाने लगे,जज केएम पांडे ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो वह उल्टे जिला जज पर ही बिगड़ गये, और चैलेंज देने वाले स्वर में उनसे कहा कि अगर आपके अंदर हिम्मत हो तो आप ताला खुलवा का दिखाएं उस साधु के साथ मंदिर परिसर से वे बाहर निकल ही रहे थे तभी उनकी दृष्टि मंदिर के पास ही एक लंगूर पर पड़ी जिसे लोग कुछ खाने पीने के लिए दे रहे थे किंतु वह उदास सा कुछ खा पी नहीं रहा था उन्होंने साधु से पूछा की ऐसा क्यों है तो साधु ने हंसकर कहा जिसके आराध्य ही ताले में बंद हो, कोई भला कैसे खा पी सकता है जिला जज सोच में पड़ गए और वही सोचते-सोचते वह वापस न्यायालय चले आए, यह देवी चमत्कार ही था या फिर कुछ और जब जिला जज महोदय न्यायालय परिसर में पहुंचे तो उसी लंगूर को ऊपर झंडा थामे हुए बैठे देखा लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वो झंडा थामे वहीं बैठा रह गया, जिला जज केएम पांडे अपनी कक्ष में चले गए, कक्षा में पहुंचने के बाद जिला जज के एम पांडेय बड़े ही चिंतामग्न थे, फिर जैसे कुछ सोचा तथा कक्ष के बाहर खड़े हुए जिलाधिकारी इंदु कुमार पांडेय तथा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कर्मवीर सिंह को अपने कक्ष में बुला लिया तथा कक्ष में ही दोनों अधिकारियों से कानून व्यवस्था पर चर्चा करने लगे, दोनों ही अधिकारियों ने उनसे कहा कि कानून व्यवस्था में कोई भी गड़बड़ नहीं आने दी जाएगी तब जिला जज महोदय ने कहा कि ठीक है आप इसे लिखित में दीजिए दोनों अधिकारियों ने बातें लिखित में दे दी, तब उन्होंने सभाजीत शुक्ला जो कि उस समय सिटी मजिस्ट्रेट हुआ करते थे उनको बुला कर रिकॉर्ड का अध्ययन करने को कहा City magistrate सभाजीत शुक्ला रिकॉर्ड का अध्ययन पहले ही कर चुके थे उन्होंने न्यायालय को बताया कि ताला लगाने का आदेश कभी दिया ही नहीं गया था, बस जिला जज के पांडे की कान जैसे यही सुनने के लिए तरस रहे थे उन्होंने अपने निर्णय में लिखा कि "जन्म स्थान में रखी रामलला की मूर्तियों की पूजा करने व देखने का अधिकार हिंदू श्रद्धालुओं को है इससे मुसलमानों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचने चाहिए और ना ही इसे कोई आसमान टूट पड़ेगा " न्यायालय द्वारा ही प्रशासन द्वारा,निर्णय वाले दिन सीजेएम सीडी राय जिला जज के एम पांडेय के साथ पूरे थे, ने बाद में बताया था कि 1985 86 में हिंदू महासभा सहित अन्य हिंदूवादी संगठन ने घोषणा कर दी थी कि वे राम जन्मभूमि का ताला खोलकर रहेंगे इसलिए जबरदस्त प्रशासनिक मुस्तैदी वहां कायम थी किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि ताला खुल पाएगा कि नहीं किंतु कहते हैं ना कि चमत्कार को भी नमस्कार ऐसा प्रतीत हुआ जैसे भगवान राम खुद चाहते हैं कि उनके मंदिर का ताला आम भक्तजनों के लिए खोला जाए और शायद यही सोचकर उन्होंने अपने परम प्रिय भक्त हनुमान जी को लिए इसके लिए नियुक्त किया अपनी पुस्तक voice of conscious मे वे लिखते हैं कि यह सब कुछ प्रभु श्री राम की प्रेरणा से ही संभव हो सका और इसीलिए उन्होंने राम भक्त हनुमान को मेरी सुरक्षा में भी लगाया था निर्णय लिखने के पश्चात जब जज कि हम पांडे अपने घर की ओर निकले तो वह लंगूर बंदर भी उनके पीछे-पीछे घर तक पहुंच गया कुछ देर हुआ लंगूर वहां रहा उसके बाद गायब हो गया उसके बाद वह लंगूर उन्हें कभी नहीं दिखाई दिया, केंद्र में कांग्रेस राजीव गांधी की सरकार थी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह हुआ करते थे जो लोग यह कहते हैं कि ताला खुलवाने में राजीव गांधी या कांग्रेस का हाथ था वे लोग एक बड़े भ्रम के शिकार हैं अथवा होने इतिहास का ज्ञान नहीं है, सच तो यह है कि राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने वाले जिला अध्यक्ष के.एम. पांडेय के साथ न सिर्फ कांग्रेसमें बल्कि समाजवादी पार्टी ने भी बेहद बुरा बर्ताव किया कांग्रेश के एम पांडे की इस कृत्य पर इतनी बुरी तरह नाराज हुई थी कि जब 1987 में कई जजों के साथ उनका नाम भी हाई कोर्ट के जज बनाने हेतु इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा प्रस्तावित किया गया था तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा उनके नाम पर विचार तक नहीं किया गया तथा अन्य लोगों की सिफारिशों को आगे भेज दिया गया voice of conscious मेकरम पांडे महोदय लिखते हैं कि उन्हें State transport appeal Pradhikaran का चेयरमैन बनाया गया था जो ज्यादा महत्त्व का पता नहीं होता है, 5 दिसंबर 1989 को नारायण दत्त तिवारी जब तक मुख्यमंत्री बनी रहे तब तक भी केएम पांडे की हवाई को उन्होंने दबाकर रखा और आगे नहीं भेजा 5 दिसंबर 1989 जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव ने शपथ ली तो पीएम पांडे महोदय की फाइल उनके सामने भी पहुंची मुलायम सिंह यादव ने केम पांडे की फाइल को यह कहते हुए वापस कर दी के श्री पांडे एक सुलझे हुए कर्मठ योग्य और ईमानदार लेडीस है किन-किन 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर लो ने एक सांप्रदायिक तनाव पैदा किया इसलिए मैं नहीं चाहता हूं कि इन्हें हाई कोर्ट का जज बनाया जाए फाइल वापस हो गई और इसी के साथ के एम पांडे का हाई कोर्ट बनने का स्वप्न भी धूल घोषित हो गया और वे जिला जज के पद से रिटायर हो गए लेकिन कहते हैं ना ऊपरवाले के यहां देर है किंतु अंधेर नहीं रिटायर हो चुके जज के पांडे के जीवन में चमत्कार होना भी बाकी था जिस पिक्चर को लोगों ने समाप्त मालिया था वह पिक्चर अभी बाकी थी रिटायर हो चुके जिला जज के पांडे के ऊपर प्रभु श्री राम की कृपा और हनुमान जी का वात्सल्य बरसने को बेचैन था चमत्कारी था इस चमत्कार का वर्णन कीजिए सी डी राय के शब्दों में,वे बताते हैं कि रिटायरमेंट के बाद इलाहाबाद में उनसे मुलाकात हुई थी, साथियों द्वारा उनसे कहा गया वे दिल्ली जाकर कानून मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी से मुलाकात कर ले साथियों ओर सीडी राय की बात मानकर के एम पांडे महोदय कानून मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी से मिले सीडी राय बताते हैं कि जैसे ही पीएम पांडे ने सुब्रमण्यम स्वामी के कक्ष में प्रवेश किया वैसे ही मानो एक चमत्कार उनकी प्रतीक्षा कर रहा था, सुब्रमण्यम स्वामी ने उन्हें देखते ही कहा कि आपकी फाइल प्रमोशन हेतु आगे भेजी जा चुकी है आप आराम से बैठ कर चाय पी सकते हैं, किसी इंसान के जीवन में इससे बड़ा चमत्कार क्या हो सकता है रिटायरमेंट के 6 माह बाद उसे फिर से दोबारा प्रमोशन देकर उसे मनचाहा पद दिया जाए जिसकी उम्मीद वे लगभग खो चुका थे, के एम पांडेय महोदय द्वारा अपनी आत्मकथा हुआ voice of conscious जो कि उन्होंने 1991 में लिखी थी, इसे प्रभु श्री राम और हनुमान महाराज की कृपा बताते हुए किसी दैवीय चमत्कार की कृपा बताया, 28 मार्च 1932 को जन्मे कृष्ण मोहन पांडे के पांडे जी ने 24 मार्च 1960 को सरकारी सेवा में प्रवेश लिया 9 अगस्त 1960 से लेकर 26 फरवरी 1977 तक जिला और सत्र न्यायाधीश रहे 26 फरवरी 1977 से लेकर 13 अगस्त 1985 तक संयुक्त सचिव व अनार उत्तर प्रदेश के रूप में कार्य किया तत्पश्चात 17 अगस्त 1985 को फैजाबाद न्यायालय में जिला जज के रूप में नियुक्त किए गए 30 नवंबर 1987 को अध्यक्ष राज्य परिवहन अपीलीय न्यायाधिकरण के रूप में नियुक्त किए गए 31 मार्च 1990 को सेवानिवृत्त हुए सेवानिवृत्ति के पश्चात 24 जनवरी 1991 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थाई अधिक न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए गए 22 फरवरी 1991 को मध्य प्रदेश जबलपुर उच्च न्यायालय में स्थानांतरित हुए पश्चात 28 मार्च 1994 को सेवानिवृत्त हो गऐ justice K M Pandey की विरासत को संभाल रहे उनके पुत्र अधिवक्ता राकेश पांडे द्वारा अनिल निर्वाणी अखाड़ा के महंत श्री जो कि राम जन्मभूमि में हिंदू पक्ष कार है की ओर से अपना अधिवक्ता बनाया गया था लखनऊ जब लखनऊ हार्ड हाईकोर्ट में राम जन्मभूमि की सुनवाई अधिवक्ता राकेश पांडे यह कहते हैं जिस तरह के साक्ष्य और सबूत एसआईटी द्वारा सौंपे गए हैं वह साफ-साफ सर करते हैं कि वह हम राम मंदिर था और इस राष्ट्री की करोड़ों जन्म भावनाएं भी वहां राम मंदिर ही बनना देखना चाहती है ऐसे व्यवहार ऐसे भी वहां राम मंदिर बनना ही चाहिए जय श्री राम वंदे मातरम हर-हर महादेव आपका ही मनीष पांडेय अधिवक्ता राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा विनम्र निवेदन के साथ एक बार फिर कट और पेस्ट ना मार कर शेयर कर दे aap sabhi ka dhanyvad

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