एक बार मंदिर तो सर्वदा मंदिर

  एक बार मंदिर तो सदा सर्वदा मंदिर ,सुप्रीम कोर्ट जरा ध्यान दें
मनीष पांडेय
6 अगस्त सन 2019 यही वह दिन था जब सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्म भूमि के संबंध में लगातार सुनवाई करने का निर्णय लिया था , 6 अगस्त से लेकर 30 अगस्त 2019 तक सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्ष की ओर से प्रमुख रूप से रामलला विराजमान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के परासरण वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन, राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से पीएन मिश्र, गोपाल सिंह विशारद की ओर से अधिवक्ता रंजीत कुमार तथा हिंदू महासभा की ओर से हरिशंकर जैन और वरिंदर मिश्र अतुल घोष आदि ने बेहद तार्किक संतुलित और पूरे साक्ष्य और सबूतों के साथ अपना-अपना पक्ष रखा था, मात्र 45 मिनट का समय शिया वक्फ बोर्ड की अधिवक्ता ढींगरा को मिला था जिसमें उन्होंने सारी भूमि हिंदुओं को सौंपने की बात कही थी, (मेरा यह परम सौभाग्य है कि मैं इन अनमोल पलों का गवाह बन रहा हूं बतौर एक अधिवक्ता भी और हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर भी मैं इस सुनवाई से किसी ना किसी रूप से लगातार जुड़ा हूं और मेरा यह प्रयास रहेगा की संभावित 15 नवंबर की जो तिथि निर्धारित की गई है कि राम जन्म भूमि का निर्णय उस दिन आ जाएगा मैं 15 नवंबर तक लगातार सभी राम भक्तों को कोर्ट की हो रही कार्रवाई तथा उसमें आने वाले बारीक से बारीक विषयों को आर्टिकल के माध्यम से प्रस्तुत करता रहूंगा खैर विषयांतर ना होते हुए मैं अपनी बात आगे बढ़ा रहा हूं,) फिर उसके बाद 2 सितंबर 2019 को जब सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने अपना पक्ष रखना शुरू किया तो प्रारंभ में लगा था कि राजीव धवन अपनी बातों को बेहद तार्किक ढंग से मैं साक्षी सबूतों के साथ रखेंगे किंतु जैसे-जैसे धीरे-धीरे हुए आगे बढ़ते गए उनकी गाड़ी पटरी से उतरने लगी कोर्ट में तार्किक बहस कम चीखना चिल्लाना आरोप प्रत्यारोप लगाना ज्यादा दिखाई देने लगा, इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से माफी भी मांगी राजीव भवन को मैंने जितना भी सुना एक क्षण को यह नहीं लगा बहस को लेकर गंभीर दिखाई दे रहे हैं सिर्फ उटपटांग और घुमाने वाले तथ्यों को भी लगातार सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्तुत करते रहे बहस के दौरान उन्होंने बहुत सी ऐसी बातें कहीं जो तथ्यों से बेहद दूर था दूसरों को तथ्यों साक्ष्यों और सबूतों ना प्रस्तुत कर पाने का आरोप लगाने वाले राजीव धवन खुद अपनी ही बहस में पूरी तरह फंसते हुए दिखाई दिए बहस के 17वें दिन वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथ वेद और पुराण पर उंगली उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में कहा हम जो कानून का अनुसरण करते हैं वह वैदिक लाॅ नहीं है लीगल सिस्टम 1858 शुरू हुआ क्या कोर्ट में हम वेद और स्कंद पुराण के कानून लागू करेंगे वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन यह कहते हो समय शायद भूल गए थे कि वेद पुराण उपनिषद भारतीय संस्कृति भारतीय जीवन का एक प्रमुख आधार स्तंभ रहे हैं, भला भारतीय जनमानस या कहें कि हिंदू धर्म से कैसे अलग हो सकता है राम जन्म भूमि कहां है अगर इसे सिद्ध करना है तो हमें वेद पुराण उपनिषद का ही सहारा लेना पड़ेगा ना कि अंग्रेज द्वारा प्रदत्त भारतीय कानूनों का इतिहास गवाह रहा है कि भारतीय कानूनों ने भी समय-समय पर अपने निर्णयों में वेद पुराण और उपनिषद की व्याख्या ओं को शामिल किया है यह बात राजीव भवन के समझ में नहीं आई जिस लीगल सिस्टम की अट्ठारह सौ 58 की बात राजीव धवन करते हैं उसे प्रतिपादित किया था उस समय के वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग द्वारा ,यह वही लॉर्ड कैनिंग है जिन्होंने राम जन्मभूमि के केस में हिंदुओं का दमन करने हेतु एक बड़ा कुचक्र रचा था फिलहाल इसका वर्णन किसी अगले लेख में फिलहाल मैं उसी लीगल सिस्टम 1858 पर आता हूं जिसे अधिवक्ता राजीव धवन पूरी तरह से मानते हैं चलिए मैं भी एक बार को मान लेता हूं तो राजीव धवन को यह बात कौन समझाए कि अगर आप लीगल सिस्टम 1858 को मानते हैं तो फिर ब्रिटिश साम्राज्य प्रिवी कौंसिल द्वारा दिए गए अन्य निर्णय को भी आपको मानना होगा मैं वर्णन करना चाहूंगा 1882 के प्रसिद्ध नटराज मूर्ति केस का जिस पर लंदन हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया था, मामला यह था कि तमिलनाडु के तंजौर जिले के पथूर ग्राम विश्वनाथन स्वामी मंदिर से नटराज की 3 फुट ऊंची तथा 1000 वर्ष पुरानी मूर्ति को तस्करों के माध्यम से लंदन भेजा गया था वहां एक बंपर डेवलपमेंट कारपोरेशन जो की कनाडाई फॉर्म थी का अध्यक्ष Robert वार्डन ने ₹ 57.5 Lakh लाख में खरीद लिया था, जिसका बाजार मूल्य 2.3 करोड़ों रुपए था, बाद में स्कॉटलैंड यार्ड द्वारा उस मूर्ति को जो पकड़ा गया तब रॉबर्ट वार्डन मूर्ति को प्राप्त करने के उद्देश्य से कोर्ट में चला गया वहां उसने कहा की मूर्ति मैंने खरीदी है भारतीय अधिकारियों और रॉबर्ट वार्डन के मध्य 9 वर्षों तक यह कानूनी लड़ाई चली 12 फरवरी 1991 को लंदन की अपीलीय न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि शिव को तमिलनाडु वापस आना चाहिए अदालत ने कहा कि शिव का बेटे ने कानूनी अधिकार है जैसा कि वे भारत में रखते हैं वी मुकदमा भी दायर कर सकते हैं, लंदन हाईकोर्ट ने अपने 163 पेज के निर्णय में काफी कुछ लिखा है विस्तृत रूप से यहां दिया जाना संभव नहीं है संक्षेप रूप से यह की रॉबर्ट वार्डन ने न्यायालय में तर्क दिया कि देवता या मंदिर मुकदमा करने की अधिकारी नहीं है रानी ही सर्वोच्च शक्ति हैं लंदन हाईकोर्ट में जब रॉबर्ट वार्डन गया टुकुर टाटा सिग्न निर्णय देते हुए घोषित किया कि जहां तक संबंधित स्थल पर प्राचीन विनिष्ट हुए मंदिर से संबंधित एक अकेली शिला अर्थात स्लैब उपलब्ध होता है तब वहां कानून की नजर में मंदिर बना रहता है और उस पर उसे स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है अपीलीय अदालत तत्पश्चात लंदन हाईकोर्ट और उसके बाद प्रिवी कौंसिल के समक्ष यह मुकद्दमा प्रस्तुत हुआ प्रिवी कौंसिल ने वही निर्णय दिया जो नीचे के दोनों ने आए लोगों ने दिया था अर्थात दोनों न्यायालय के न्यायिक निर्णय को बहाल रखा गया प्रिवी कौंसिल ने आगे कहा कि एक देवता देवता ही है एक मूर्ति एक नए व्यक्ति बनी रहती है अगर मोटी को लंबे समय तक दबाया या क्षतिग्रस्त किया जाता है तब भी इसलिए न्याय की काई अपने सांसारिक रूप में कुल विनाश से बचे रहते हैं देवता जहां भी है एक देवता ही है और मूर्ति के अनादर और निर्यातक के तथ्य से मंदिर के अधिकार प्रभावित नहीं होते हैं न्यायालय ने आगे किया कहा कि A juristic entity which has a title to the natarja is superior तो that of the defendant •न्यायालय द्वारा दी गई समरी के अनुसार मैं एक बार फिर से वर्णन करता हूं वह यह कि यदि विवादित स्थल पर प्राचीन वनिष्ट मंदिर का एक शिला (स्लैब) तक प्राप्त होता है तो कानून की नजर में वहां पर मंदिर ही माना जाएगा भले ही वह मंदिर नष्ट हो चुका हो और वहां पूजा-अर्चना ना होती हो ध्यान देने योग्य बात यह है कि 1982 में राजीव गांधी की सरकार थी जिन्होंने लंदन उच्च न्यायालय में सरकार की ओर से जिस तर्क पर सबसे अधिक बल देकर किया कहा था कि वह यह कि एक बार मंदिर तो सदा सर्वदा के लिए मंदिर ही है
इसी प्रकार दूसरा मुकदमा मुल्लिक बनाम मुल्लिक 28 अप्रैल 1925 मुंबई हाई कोर्ट का है जो प्रथम नाथ मुल्लिक बनाम प्रघुम्न कुमार मल्लिक के मध्य था जिसमें एक हिंदू परिवार ठाकुर ठकुरानी (कृष्ण और राधा रानी) तथा भगवान शालिग्राम की मूर्ति के नियंत्रण और पूजा का संदर्भ है matilal Mallick की मृत्यु के बाद उसके दत्तक पुत्र जडूलाल मुल्लिक पर मूर्ति के रखरखाव नियंत्रण खर्चे अधिक भार आ गया जादू लाल की मृत्यु के बाद परिवार में जब परिवार में झगड़ा बढ़ा तो यह मामला मुंबई मुंबई मुंबई न्यायालय में शाॅ ब्लैंसवर्ग,जे एज,ए अली के समक्ष प्रस्तुत हुआ न्यायाधीशो ने मूर्ति को एक न्यायिक इकाई मानते हुए कहा कि मूर्ति को मुकदमा करने मुकदमा चलाने की शक्ति के साथ इसका एक न्यायिक दर्जा भी है देवता की स्थिति और उसके अधिकार के संरक्षण उसके रखरखाव सेवा आदि के संबंध में कार्य करने के लिए मनुष्य का भी होना चाहिए
इस मुकदमे की इन लाइनों को मैं अंग्रेजी में भी प्रस्तुत कर रहा हूं जिससे आप सब को समझने में ज्यादा आसानी होOne of the questions emerging at this point is as to the nature of such an idol, and the services due thereto. A Hindu idol is, according to long established authority, founded upon the religious customs of the Hindus, and the recognition thereof by Courts of law, a "juristic entity." It has a juridical status with the power of suing and being sued. Its interests are attended to by the person who has the deity in his charge and who is in law its manager with all the powers which would, in such circumstances, on analogy, be given to the manager of the estate of an infant heir, It is unnecessary to quote the authorities; for this doctrine, thus simply stated, is firmly established.
अब इन दोनों मुकदमों को सामने रखने के बाद मेरा आपसे मात्र इतना कहना है दोनों मुकदमों से जो बातें स्पष्ट हो रही हैं वह यह (1)कि न्यायालय के निर्णयों में मूर्ति को एक न्यायिक व्यक्ति माना गया है और वह मुकदमा करने का भी अधिकारी होता है (2) वह यह कि मूर्ति का एक टुकड़ा भी अगर जमीन के अंदर पाया जाता है तो वह पूरा क्षेत्र मंदिर ही माना जाएगा चाहे वहां पूजा होती हो अथवा नहीं राम जन्मभूमि के परिपेक्ष में यह देखना आवश्यक है कि हिंदू पक्ष द्वारा वहां लगातार पूजा का क्रम जारी रहा कभी वह निरंतरता टूटी नहीं दूसरा आर्कियोलॉजी आफ सर्वे की रिपोर्टओं से यह स्पष्ट है कि वहां ना सिर्फ एक मंदिर के अंश पाए गए हैं बल्कि वहां पर अनेक मूर्तियों के खंडित अंश भी पाए गए हैं जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन और जफरयाब जिलानी जो अपनी उलट बसिया बहस से ना सिर्फ न्यायालय को बल्कि इस देश के करोडो राम भक्तों को जो भरमाने का प्रयास लगातार कर रहे हैं उस पर सुप्रीम कोर्ट तत्काल संज्ञान लेते हुए निर्णय लेते हूऐ इस बहस को बंद कराएं और इन 2 मुकदमों के आधार पर जोकि वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन की ही कथानुसार लीगल सिस्टम 1858 के अनुसार ही अपना निर्णय हिंदू पक्ष में दे, अगला आर्टिकल गोपाल सिंह विशारद जी के ऊपर होगा जो सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्ष कार के रूप में हैं उसके बाद अगला आर्टिकल लॉर्ड कैनिंग के ऊपर होगा जिन्होंने राम जन्मभूमि पर एक बड़ा कुचक्र रचा था तब तक प्रतीक्षा करें जय श्री राम वंदे मातरम हर-हर महादेव
आपका ही मनीष पांडेय अधिवक्ता
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
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