गोपाल सिंह विशारद:- राम के लिए संपूर्ण जीवन न्योछावर करने वाले एक योद्धा
मनीष पांडेय
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राम जन्मभूमि का पहला मुकदमा गोपाल सिंह विशारद पुत्र श्री गिरधारी सिंहo.o.s. (other original suit)no 1,1jan.1950 गोपाल सिंह विशारद बना जहूर अहमद तथा अन्य गोपाल सिंह विशारद 1949 में अखिल भारत हिंदू महासभा फैजाबाद यूनिट के जनरल सेक्रेटरी हुआ करते थे उनके द्वारा ही फैजाबाद की सिविल कोर्ट में माननीय भीम सिंह के न्यायालय में एक पिटीशन यह कहते हुए दायर की गई थी मेरे परिवार के लोग पिछले कई वर्षों से भगवान राम लला के दर्शन और पूजा अर्चना करते चले आ रहे हैं मैं भी जन्म स्थान पर लगाता जाकर पूजा-अर्चना करता हूं परंतु अब मुझे रोका जा रहा है इस जन्म स्थान की पूजा करना मेरा मौलिक अधिकार है इसलिए मुझे पूजा करने से ना रोका जाए ना ही मेरे मार्ग में कोई बाधा खड़ी की जाए इसके साथ ही साथ भगवान राम लला की सुरक्षा भी की जाए जिससे वहां कोई उनको हटाना सके तब जिला अदालत ने गोपाल सिंह विशारद जी के पक्ष में अंतरिम आदेश दे दिया मुसलमानों ने इसका विरोध किया उन्होंने हाईकोर्ट में जाकर फिर से इसके विरुद्ध याचिका लगाई हाई कोर्ट ने भी अप्रैल 1955 में सिविल जज फैजाबाद के आदेश को ही पुष्ट रखा इस तरह विवादित गुंबद के अंदर पूजा-अर्चना का प्रारंभ हो गया श्री गोपाल सिंह विशारद का जन्म 1903 को जालौन बुंदेलखंड में हुआ था 1941 में अयोध्या आकर स्वर्गद्वार के एक मंदिर में रहने लगे बाद में एक किराए का घर श्रंगार हॉट अयोध्या में लेकर लेकर रहने लगे यहीं पर उन्होंने अपने पुत्र तथा पत्नी को जालौन से लेकर आकर रहने लगे गोपाल सिंह जी द्वारा अपने नाम के आगे विशारद शब्द लगाने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है वास्तव में उन्होंने विशारद किया था जोगी अंग्रेजी डिग्री ग्रेजुएशन के समकक्ष होती है अपने नाम के आगे उन्होंने विशारद लगाने का उद्देश्य मात्र इतना था कि वे दूसरों के सामने अपने आप को एजुकेटेड दिखाने की प्रबल लालसा के चलते शायद उन्होंने ऐसा किया था 1950 में फैजाबाद के सिविल जज द्वारा अधिवक्ता शिव शंकर लाल को विवादित परिसर में जाकर निरीक्षण करके उसका मान चित्र बनाने का आदेश दिया था अधिवक्ता शिव शंकर लाल बतौर कमिश्नर द्वारा विवादित स्थल का निरीक्षण करने के उपरांत मई 1950 में दो मानचित्र न्यायालय में प्रस्तुत किए दोनों माने चित्रों को गोपाल सिंह विशारद द्वारा प्रस्तुत मानचित्र में संलग्न कर दिया गया था कालांतर में जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ द्वारा 30 सितंबर 2010 को माननीय जजों द्वारा अपना निर्णय दिया गया तो गोपाल सिंह के उक्त मान चित्र को उसमें शामिल करते हुए अपने निर्णय का आधार बनाया था माननीय न्यायाधीश एस यू खान महोदय द्वारा इसी मानचित्र के आधार पर उत्तर दक्षिण दिशा की लंबाई 140 सीट और उत्तर पश्चिम की दिशा की चौड़ाई 97 फीट लिखी गई थी तथा क्षेत्रफल अनुमानता:1500वर्ग गज अर्थात 135000 वर्ग फीट लिखा गया था 30 सितंबर 2010 को जो बंटवारा हुआ वह कुल जमीन अर्थात 67 .703 (अधिग्रहण पश्चात) जिसमें से 2 . 7 7 एकड़ भूमि का बंटवारा तीन भागों में किया गया था, कहने का तात्पर्य यह है कि गोपाल सिंह विशारद जी द्वारा जो मानचित्र प्रस्तुत किया गया उसी मानचित्र को न्यायालय द्वारा भी मान्य किया गया 1950 में जब अधिवक्ता शिव शंकर लाल को विवादित परिसर भेजा गया और उन्होंने जो मानचित्र बनाएं वह गोपाल सिंह विशारद जी द्वारा बनाए गए मानचित्र जैसे ही थे, जिसके आधार पर निर्णय किया गया यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि राम जन्मभूमि के उद्धार हेतु हिंदुओं द्वारा कुल 77 लड़ाइयां लड़ने का उल्लेख इतिहास में अंकित है 1955 में यहां दंगे हुए उससे पहले 1923 में वहां दंगे हुए 1934 में भी यहां दंगे हुए, 1934 में जब यहां दंगे हुए तो ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा हिंदुओं के पूजा-अर्चना करने पर रोक लगा दी गई तथा वहां से मूर्तियों को भी हटा दिया गया था 1950 में जब गोपाल सिंह विशारद जनरल सेक्रेट्री हिंदू महासभा फैजाबाद के समक्ष रामलला का प्रकाट्य हुआ ,जिसके बाद राम जन्मभूमि पर एक बार फिर से रामलला की पूजा-अर्चना प्रारंभ हो गई तब एक बार फिर से मुसलमानों द्वारा इसका विरोध किया गया था तब गोपाल सिंह विशारद जी द्वारा उक्त सिविल सूट दायर कर न्यायालय से इंजंक्शन और डिक्लेरेशन मांगा था, यहां पर एक बात और ध्यान देने योग्य है वह यह कि तब तक उक्त बाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड नहीं था, सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में मालिकाना अधिकार प्राप्त करने के लिए मुकदमा दायर किया किंतु इससे पहले 1946 में फैजाबाद की सिविल न्यायालय द्वारा सुन्नी वक्फ बोर्ड का मुकदमा खारिज किया जा चुका था, श्री गोपाल सिंह विशारद हिंदू महासभा से काफी वर्षों से जुड़े हुए थे उनके कार्यक्रम में आते जाते रहते थे तथा कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया करते थे किंतु पूरी तरह से अयोध्या में आकर 1942 में उन्होंने हिंदू महासभा की विधिवत सदस्यता ली थी महंत दिग्विजय नाथ, केकेके नायर, गोपाल सिंह विशारद, और ठाकुर गुरुदत्त सिंह, जब भी ये चारों मिलते थे चाय की चुस्कियो के बीच, गंभीर विषय पर चर्चाऐं तो होती ही थी किंतु राम जन्मभूमि का उद्धार कैसे हो, रामलला की पूजा-अर्चना कैसे प्रारंभ की जाए, और सबसे बड़ी बात जो इन चारो मित्रों की आंखों में बराबर खटकती था वह था बाबरी नाम का वह ढांचा जो हिंदू समाज के माथे पर एक बड़े कलंक के रूप में सामने खड़ा हुआ था,इस कलंक का विध्वंस कैसे सम्भव हो , दिन रात यही रणनीतियां बनाई जाती थी, ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु श्री राम ने भी अंततः अपने भक्तों की पुकार सुन ही ली 22 दिसंबर की रात मे आखिरकार रघुकुलभूषण अपने जन्म स्थान पर एक बार पुन: पधारे, प्रातः अर्थात 30 दिसंबर 1949 को रामलला का प्रकाट्य हुआ है यह समाचार जंगल में आग की तरह चारों ओर फैल गया, जिसने भी सुना वह जन्म स्थान की ओर भागा पूरी अयोध्या सड़कों पर उतर आई,और यह तुलसीदास कृत भजन "भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी" गाते हुए जन्म स्थान की ओर चल पड़े, मुसलमानों द्वारा यहां भी विरोध करते हुए रामलला के प्रकार पर सवालिया निशान खड़े किए गए और प्रशासन द्वारा इस की मिलीभगत के आरोप लगाए गए तब फैजाबाद के डेप्युटी कमिश्नर और जिलाधिकारी K K K Nair ने कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता आप सभी न्यायालय में जाएं, मैं पुन: एक बार गोपाल सिंह विशारद जी के द्वारा दायर किए गए मुकदमे की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं दरअसल जब राम लला का एक आलौकिक घटना के तहत प्रकाट्य हो गया तब16 जनवरी 1950 गोपाल सिंह विशारद जी द्वारा फैजाबाद की सिविल न्यायालय में यह कहते हुए मुकदमा दायर किया गया कि भगवान राम व अन्य मूर्तियों को मुकदमे के अंतिम फैसले तक न हटाया जाए, मंदिर का प्रवेश द्वार बंद ना कराया जाए तथा हिंदू होने के नाते हमें पूजा का अधिकार प्राप्त गोपाल सिंह विशारद जी ने प्रतिवादी के तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार डिप्टी कलेक्टर सिटी मजिस्ट्रेट व पांच अन्य मुसलमानों को बनाया था 16 January 1950 कोही फैजाबाद के सिविल न्यायालय के न्यायाधीश माननीय भीम सिंह द्वारा गोपाल सिंह विशारद के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा गया कि अस्थाई निषेधाज्ञा द्वारा सर्व पक्षों को विवादित स्थान ऐसी मूर्तियां हटाने तथा पूजा आदि में व्यवधान डालने से रोका जाता है यह जब तक लागू माना जाए जब तक कि इस मुकदमे का अंतिम निर्णय ना हो जाए न्यायालय के द्वारा हिंदू के पक्ष में पुनः एक बार निर्णय दिया गया जिसका विरोध मुसलमानों ने फिर किया मुसलमानों द्वारा इसकी अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी की गई वहां भी हिंदुओं के पक्ष में निर्णय आया माननीय न्यायधीश अकबर दयाल की बेंच ने फर्स्ट अपील फ्रॉम ऑर्डर को सुनाते हुए हिंदुओं के पक्ष में ही निर्णय प्रदान किया, बाद में कुछ मुसलमान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास पहुंचे उन्होंने रामलला प्रकाश पर उंगली उठाते हुए के के के नायर को घेरने की कोशिश की उन्होंने जवाहरलाल नेहरू पर दबाव बनाना शुरू किया जिसके तहत नेहरू ने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से मूर्तियां हटाने के लिए कहा गोविंद बल्लभ पंत ने केकेके नायर को मूर्ति हटाने का आदेश दिया किंतु केके के नायर ने यह कहते हुए मूर्ति हटाने से मना कर दिया कि इससे दंगे वह हिंदू भावनाएं भड़केगी मुसलमान एक बार फिर से नेहरू के पास पहुंचे और उन्होंने इसकी शिकायत एक बार फिर उनसे की नेहरू ने मूर्ति हटाने के लिए एक बार तब जिलाधिकारी नायर ने कहा कि मूर्तियां हटाने से पहले आपको मुझे हटाना होगा सरकार यह समझ नहीं पा रही थी आखिर करना क्या है तब उसने इस मुद्दे पर चुप रहना ही बेहतर समझा इस तरह तत्कालीन नेहरू सरकार करुणा राम भक्तों की भावनाओं के आगे नतमस्तक हो गई, के के के नायर और गोपाल सिंह विशारद आपस में पारिवारिक मित्र थे, K K K Nair फैजाबाद जनपद के डेप्युटी कमिश्नर /जिलाधिकारी 1 जून 1949 को फैजाबाद का आपने कार्यभार संभाला था, गुरुदत्त सिंह फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट थे, चौथे मित्र के रूप में गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ जी महाराज जो 1939 में की हिंदू महासभा के सदस्य बने थे, जब यह चारों मित्र मिले, तो एक ऐसा इतिहास रच डाला जिसे आने वाली कई सदियां भुलाए से भी नहीं भूलेंगी , मित्रों यह वह दौर था जब वास्तव में हिंदू महासभा एक विशेष रणनीति के तहत बाबरी विध्वंस की एक कुशल रणनीति पर कार्य कर रही थी उस समय अपने अभीष्ट लक्ष्य को पाने के लिए सभी का कार्य बांट दिया गया था जहां महंत दिग्विजय नाथ जी महाराज राजनीतिक स्तर से, तो कि के के के नायर और गुरुदत्त सिंह प्रशासनिक स्तर से, वही गोपाल सिंह विशारद कानूनी स्तर से, तो बाबा अभिराम दास (हिंदू महासभा के एक प्रमुख सक्रिय सदस्य )और महंत परमहंस रामचंद्र जी महाराज (महान्त दिगंबर अखाड़ा और जिला अध्यक्ष हिंदू महासभा अयोध्या यूनिट )दिन-रात लोगों से संपर्क करने में जुटे हुए थे और इन्हीं के साथ हिंदू महासभा के अन्य प्रांतों से आए हुए बीजी देशपांडे विश्वनाथ अग्रवाल विशन चंद्र सेठ जो बाद में हिंदू महासभा से सांसद भी हुए NB Khare अक्षय ब्रह्मचारी (जो थे तो जन्मजात कांग्रेसी कांग्रेसी किंतु हिंदू महासभा क्योंकि साथ इनकी बहुत जल्दी थी और उनके सारे कार्यक्रमों और लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु दिन-रात जुटे रहते थे) रामगोपाल पांडे शरद सदस्य हिंदू महासभा अयोध्या शकुंतला नायर जोकि केकेके नायर की धर्मपत्नी थी और बाद में गोंडा जनपद से हिंदू महासभा की सांसद भी हुई तेज नारायण (जोकि दिग्विजय नाथ के दाहिने हाथ समझे जाते थे और उत्तर प्रदेश वर्किंग कमेटी हिंदू महासभा यूनिट के सदस्य भी थे) गोपाल सिंह विशारद जी की मृत्यु 1985 में हो गई तब उनके पुत्र राजिन्दर सिंह जी, द्वारा पुत्र धर्म का पूरी तरह से पालन करते हुए एक अनथक योद्धा की तरह राम जन्म भूमि के मुकदमे को बराबर लड़ते जा रहा है, मित्रों मैं समझ रहा हूं कि आर्टिकल निरंतर बड़ा होता जा रहा है इसे संक्षेप में करते हुए बस इतना कहना चाहता हूं कि बेशक 1992 में बाबरी विध्वंस में विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना तथा उनके अनुषांगिक संगठन को विश्व ने देखा अगर पर्दे पर विश्व हिंदू परिषद और उसके अनुषंगिक संगठन तथा शिवसेना थी तो पर्दे के पीछे के निर्माता और निर्देशक बेशक हिंदू महासभा ही थी, दुर्भाग्य रहा कि बाबरी विध्वंस की कुशल रणनीति तथा राम जन्मभूमि पर पूजा अर्चना पुनः प्रारंभ कराने वाली और राम लल्ला प्रकाट्य में प्रमुख भूमिका निभाने वाली हिंदू महासभा को नेपथ्य में ढकेल दिया गया, ऐसा क्यों हुआ इसका क्या कारण थे आदि आदि इस विषय पर मैं अपनी लेखनी फिलहाल नहीं चलाना चाहता हूं ,अंत में बस इतना ही कि भूल ही बात बिसार दे आगे की सुध लेई, हम सबका चाहे वह विश्व हिंदू परिषद हो चाहे वह शिवसेना हो या फिर हिंदू महासभा या फिर किसी भी अन्य हिंदू संगठनों से जुड़ा हो सभी का अभीष्ट लक्ष्य संपूर्ण अधिगृहित क्षेत्र पर रामलला के भव्य मंदिर का निर्माण हो इसी कामना के साथ राम काज की बिना मोहि कहां विश्राम की भावना से ओतप्रोत होते हुए एक ही नारा जय श्री राम का उद्घोष और एक ही लक्ष्य भव्य राम मंदिर का निर्माण हो प्रभु श्रीराम से हम सबकी बस यही कामना जय श्री राम वंदे मातरम हर-हर महादेव
आपका ही
मनीष पांडेय अधिवक्ता
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
विशेष:- विनम्र विनती के साथ कट और पेस्ट कृपया ना करें संभव हो तो शेयर और उसका दें
राष्ट्रहित के लिए आवश्यकःसमान नागरिक संहिता लेखक - मनीष कुमार पाण्डेय अधिवक्ता पत्रकार एम0काॅम0. , एल0एल0बी0, एम0बी0ए0 (एच0आर0) प्रदेश प्रवक्ता अखिल भारत हिन्दू महासभा उ0प्र0. ऽ शरीयत अदालतो मुस्लिम पसर्नलाॅ बोर्ड जैसी संस्थाओं पर लगे बैन कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक समारोह में कहा था है कि वे चाहते है कि देश में ऐसे कानूनोे को वे समाप्त करना चाहते है जिनकी प्रासंगिकता वर्तमान समय में लगभग समाप्त हो चुकी है उन्होने यह भी कहा कि ऐसे कानूनो को एक दिन में एक कानून समाप्त करने की उनकी मंशा है अर्थात वे चाहते है कि एक दिन में एक कानून की समाप्ति की जाऐ प्रधान मंत्री जी की सोच बिल्कुल सही है हम भारतवासी सैकड़ो वर्षो से ऐसे कानूनो को क्यों ढोऐ जो घिस पिट चुके है जो सभ्य समाज के लिए नासूर बन चुके है ऐसे कानून जो हमें राष्ट्रीयता नही बल्कि गुलामी,राष्ट्रद्रोह की ओर ढकेलती हो निश्चित रूप से ऐसी व्यवास्थाओं कानूनो को समाप्त कर उसकी जगह नये कानूनोे का सृजन करना ही राष्ट्रहित के लिए आवश्यक होगा परन्तु तब बड़ा आश्चर्य होता है जब राष्ट्र के ...
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