म•रघुवर दास जिन्होंने दायर किया था,राम जन्मभूमि का प्रथम वाद
मनीष पांडेय
अपने जीवन में हम सभी ने रेल यात्राएं तो काफी की होंगी इन रेल यात्राओं के दौरान कुछ ऐसे अनुभव हमें प्राप्त होते हैं जो हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व को ना सिर्फ बदलते हैं बल्कि उन अनुभवों से फायदा उठाकर हम अपने आने वाले जीवन की कठिनाइयों का हल निकाले का एक बेहतरीन प्रयास भी करते हैं आपने ध्यान दिया होगा एक अत्यधिक भीड़भाड़ वाली रेल की बोगी में आप अपनी सीट पर किसी तरह बैठे हैं और ऐसे में कोई एक अन्य व्यक्ति जो खड़ा हुआ है उसे या तो आप सहृदयता पूर्वक अपनी ही सीट में से कुछ हिस्सा उसे बैठने के लिए प्रदान कर देते हैं कभी-कभी ऐसा भी होता है कि खड़ा हुआ व्यक्ति जबरदस्ती आपकी सीट पर अपना स्थान बनाने के लिए आतुर रहता है और इसके लिए वह आपसे लडता है झगडता है गाली गलौज करने पर भी उतर जाता है देखने सुनने में आया है इस सीट के लिए अक्सर मार पिटाई भी हो जाती है दोनों ही दशा में अगर व्यक्ति धूर्त और मक्कार है तो वह आपको धीरे-धीरे हटाता हुआ उस आपकी सीट पर लेटने का प्रयास करने लगता है आपकी सहनशीलता सहृदयता पूरी तरह से फायदा उठाता है अंत में होता वही है या तो आप उठकर उस सीट से चले जाते हैं अथवा दूसरी स्थिति में आप अपना अधिकार पाने के लिए उसे लड़ते हैं झगड़ते हैं अपशब्दों का प्रयोग करते हैं और अंत में मारपीट तक बात पहुंची जाती है और यह तब तक चलता रहता है जब तक दोनों में से किसी एक की मंजिल नहीं आ जाती है ,इसी से जुड़ा हुआ मैं दूसरा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूं जनपद फैजाबाद जो कि अब अयोध्या हो चुका है जुलाई 2012 मैं सहादतगंज के अंतर्गत आने वाला एक गांव मिर्जापुर गांव का उदाहरण देते हुए आगे बढ़ता हूं दशकों पहले मिर्जापुर गांव में ग्राम सभा की जमीन पर गांव वालों ने मिलकर एक शिव मंदिर का निर्माण किया था उस गांव में तब एक भी मुसलमान नहीं था फिर अचानक चार या पांच मुसलमान उस गांव के प्रधान से आकर मिले और उनसे मदद की मांग की और उन्हें रहने बसने का कोई ठौर ठिकाना प्रदान करने की प्रार्थना करने लगे प्रधान को और गांव वालों को उन पर दया आ गई और उन्होंने उसी ग्राम सभा की जमीन में उन पांच मुसलमानों को बसने की आज्ञा देगी जब इन मुसलमानों को ठौर ठिकाना मिल गया तो धीरे-धीरे यह फिर से एक बार गांव वालों के पास गए और उन्होंने कहा कि हमें अपनी इबादत के लिए एक जगह चाहिए जहां पर हम अल्लाह की की इबादत कर सकें गांव वाली सीधी सरल व्यक्तित्व के लोग थे छल प्रपंच धूर्तता तथा मक्कारी उनके अंदर नहीं आई हुई थी तब उन्होंने शिव मंदिर के पास पड़ी हुई एक जमीन के टुकड़े को उन्हें इबादत करने के लिए प्रदान कर दिया धीरे-धीरे वही होने लगा जो मैंने आप ऊपर ट्रेन की घटना आपसे वर्णन की है बैठते ही वे लोग लेटने की सोचने लगे उस खाली जमीन परवेज खाली बैठकर पूजा करते थे लेकिन धीरे-धीरे उस पर उन्होंने एक मस्जिद का निर्माण करना शुरू कर दिया मस्जिद का निर्माण तो किया ही उनकी कु दृष्टि उस मंदिर की जमीन पर भी पड़ गई और उसे भी हड़पने के लिए दिन-रात नए-नए षडयंत्र बुनने लगे लड़ाई झगड़ा मारपीट जितना छल प्रपंच हो सकता था उन्होंने शुरू किया कालांतर में यह लड़ाई बहुत ज्यादा बढ़ गई एक तरीके से कहें तो सांप्रदायिक दंगा होने की नौबत आ गई अंत में वही हुआ उधर से हजारों मुसलमान घर से हजारों हिंदू आपस में टकराए पत्थर भूमि सब चले किसी तरह पुलिस ने फोर्स ने मामले को शांत करवाया और अंत में समझौता करवाया हिंदू अपनी तरफ मुसलमान अपनी तरफ हिंदुओं के प्रतिरोध करने से एक फायदा यह हो गया कि जो अपना शिव मंदिर था वह बच गया किंतु हम अपने हिस्से को मुसलमानों को देकर बैरी बन गए यह मामला आज भी शांत नहीं है हमारे सामने काशी और मथुरा का ही उदाहरण मौजूद नहीं है बल्कि इस राष्ट्र में लाखों मंदिरों की स्थिति वही है जो आज राम जन्म भूमि की है या जो मैंने उदाहरण स्वरूप मिर्जापुर गांव की भी है हमारी गलती यही थी कि जो व्यक्ति बाहर से आया हुआ था और खड़े-खड़े जाना चाहता था हमने बस उसे बैठने की जगह दे दी आज से 125 साल पहले जब न्यायालय में निर्मोही अखाड़े के महान्त रघुवर दास जी महाराज द्वारा एक मुकदमा यह कहते हुए दायर किया गया चबूतरा चारों ओर से खुला हुआ है गर्मी सर्दी और बरसात के मौसम में पूजा करने में काफी कठिनाई होती है सरकार ने चुकी मंदिर बनाने से रोक दिया है अतः न्यायालय सरकार को यह आदेश दे कि वह मंदिर बनाने दे, अंग्रेजों के साथ मिलीभगत कर राम जन्मभूमि पर मुसलमानों द्वारा किस तरह कब्जा किया गया उसकी परतें एक के बाद एक खुलने लगी, 430 वर्ष पहले भी कमोवेश यही हुआ होगा, हिन्दूओ ने अपनी उसी सहृदयता सहजता और सरलता का बुरा परिणाम आज तक भुगतते चले आ रहे हैं 134 वर्ष पहले अर्थात 1885 में यह झगड़ा सुलगते सुलगते कोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया जो आज भी अनवरत रूप से जारी है महान्त रघुवर दास जी महाराज ने यह मुकदमा 24 जनवरी 1885 को फैजाबाद के सब जज पंडित हरि कृष्ण की अदालत में दायर की( मुकदमा संख्या 61 / 280) दिनांक 29.1.1885 को जज महोदय ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि मस्जिद के सामने मंदिर की इजाजत देने से हिंदू मुसलमानों के बीच झगड़े और खून खराबे की बुनियाद पड़ जाएगी फैसले में यह भी कहा गया कि मंदिर-मस्जिद के बीच एक दीवार है जो दोनों पूजा स्थलों को एक दूसरे से अलग करती है मंदिर और मस्जिद के पीछे दीवार 1857 से पहले बनाई गई थी मुकदमा खारिज होने के बाद में महान्त रघुवर दास जी महाराज ने इसके विरुद्ध civil अपील number 27 जिला जज एफ ई ए चैमियर के यहां दाखिल की थी जिला जज जेवियर द्वारा उस स्थान का निरीक्षण करने के उपरांत यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि मैंने पाया कि सम्राट बाबर द्वारा हिंदुओं के पवित्र समझे जाने वाले स्थान पर मस्जिद का निर्माण दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन इतिहास में हुई इस 356 वर्ष पहले की शिकायत के समाधान में अब बहुत देर हो चुकी है जो कुछ अब हो सकता है वह यह कि पार्टियों के मध्य यथास्थिति बनाए रखी जाए इसके बाद महान्त रघुवर दास जी ने second Civil Appeal number 122 जुडिशल कमिश्नर डब्ल्यू यंग जिनके पास हाईकोर्ट के समान पूरे अवध प्रांत के अधिकार थे, के यहां दायर की न्यायिक आयुक्त डब्ल्यू यंग ने यह कहते हुए अपील को खारिज कर दिया कि बात बस इतनी सी है कि हिंदू चाहते हैं कि एक नया मंदिर या संग मर मर बाल्टचीनो बनाने के लिए, अयोध्या में यह माना जाता है कि वह श्री रामचंद्र की जन्म स्थली व पवित्र स्थान है यह स्थान लगभग 350 साल पहले एक मस्जिद के आसपास के मैदान की भीतर स्थित है बादशाह और उसकी संतान ने अत्याचार करने के उद्देश्य से is स्थल को चुना लगता है कि मस्जिद से सटे कुछ स्थानों पर कुछ विशेष स्थानों तक उनके अधिकार सीमित है और भी कई वर्षों से उन अधिकारों को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं अर्थात सीता रसोई व रामचंद्र की जन्मभूमि तक
अब आते ही मित्रों मूल मुद्दे पर अट्ठारह सौ पचासी में महान्त रघुवर दास जी दायर की गई इन तीनों अपीलों में न्यायधीश महोदय ने कहीं ना कहीं अवश्य माना है कि वहां पर राम जन्मभूमि थी और वह रामचंद्र जी की जन्मस्थली थी क्योंकि विवाद जानबूझकर एक कूटनीतिक चाल चलते हुए उत्पन्न किया गया था इसीलिए तीनों जजों ने मामले पर कड़ा फैसला नहीं ले पाए इसी परिपेक्ष में 30 सितंबर 2010 का फैसला भी देखा जाना आवश्यक है तीनों जजों ने माना कि वहां पर राम जन्म स्थली है उसके बावजूद भी भूमि को तीन हिस्सों में बांट दिया गया तीसरे जज धर्मवीर शर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि मैंने 163 और सबूतों को देखने के बाद यह फैसला दिया था कि यह भूमि श्री राम की है और उसे तत्काल हिंदुओं को सौंप देना चाहिए कहने का अर्थ यह है कि राष्ट्रीय एकता दिखाने सेकुलरिज्म की दूषित मानसिकता के चक्कर में हिंदुओं को ही बलि का बकरा बनाया गया उनके अधिकारों को सीमित किया गया और उन्हें दबाया ही नहीं बल्कि बुरी तरह कुचला भी गया और अंत में उनके विपरीत ही फैसला दिया गया सब कुछ साक्ष्य और सबूत होने के बावजूद भी, तो फिर एक यक्ष प्रश्न यही बाकी रह जाता है कि क्या उसके लिए कहीं ना कहीं हिंदू भी जिम्मेदार है तो मैं कहूंगा हां इसके लिए हिंदू ही जिम्मेदार है अपनी सेकुलर वादी मानसिकता के चलते हिंदू ने हमेशा मुसलमानों से मात खाई है और अगर अभी नहीं समझा तो भविष्य में भी वह आतंकी जिहादी और विध्वंसक तत्व वाले ऐसे लोगों से मात्र ही पता रहेगा
मित्रों इस आर्टिकल का एक सेकंड पार्ट भी धीरे-धीरे तैयार हो गया है वैसे भी आर्टिकल काफी बड़ा हो चुका है इसलिए उसका अगला भाग और विस्तार के साथ में आगामी कार्यदिवसों में दूंगा महान्त रघुवर दास जी की फोटो ढूंढ का काफी प्रयास किया किंतु उपलब्ध नहीं हो पाई अतः निर्मोही अखाड़ा और उस समय 1949 में पूजा के फोटो मैं प्रस्तुत कर रहा हूं तब तक जय श्री राम वंदे मातरम हर हर महादेव
आपका ही
मनीष पांडेय अधिवक्ता
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
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राष्ट्रहित के लिए आवश्यकःसमान नागरिक संहिता लेखक - मनीष कुमार पाण्डेय अधिवक्ता पत्रकार एम0काॅम0. , एल0एल0बी0, एम0बी0ए0 (एच0आर0) प्रदेश प्रवक्ता अखिल भारत हिन्दू महासभा उ0प्र0. ऽ शरीयत अदालतो मुस्लिम पसर्नलाॅ बोर्ड जैसी संस्थाओं पर लगे बैन कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक समारोह में कहा था है कि वे चाहते है कि देश में ऐसे कानूनोे को वे समाप्त करना चाहते है जिनकी प्रासंगिकता वर्तमान समय में लगभग समाप्त हो चुकी है उन्होने यह भी कहा कि ऐसे कानूनो को एक दिन में एक कानून समाप्त करने की उनकी मंशा है अर्थात वे चाहते है कि एक दिन में एक कानून की समाप्ति की जाऐ प्रधान मंत्री जी की सोच बिल्कुल सही है हम भारतवासी सैकड़ो वर्षो से ऐसे कानूनो को क्यों ढोऐ जो घिस पिट चुके है जो सभ्य समाज के लिए नासूर बन चुके है ऐसे कानून जो हमें राष्ट्रीयता नही बल्कि गुलामी,राष्ट्रद्रोह की ओर ढकेलती हो निश्चित रूप से ऐसी व्यवास्थाओं कानूनो को समाप्त कर उसकी जगह नये कानूनोे का सृजन करना ही राष्ट्रहित के लिए आवश्यक होगा परन्तु तब बड़ा आश्चर्य होता है जब राष्ट्र के ...
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