ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी कुनीति, उद्धार से वंचित हुई श्री राम जन्मभूमि
मनीष पांडेय
1857 में जब विद्रोह हुआ तो उस समय अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध ना सिर्फ हिंदुओं ने बल्कि मुसलमानों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था अंग्रेजों को भला यह कैसे सहन होता तब अंग्रेजों ने अपने विरुद्ध उठने वाली आवाज को दबाने के लिए अपनी प्रसिद्ध फूट डालो और शासन करो की नीति को लागू करते हुए हिंदू और मुसलमानों के बीच फूट डालने प्रारंभ कर दी राम जन्मभूमि का जो विवाद उस समय हल हो सकता था अंग्रेजों की कूटनीति चाल चलने के कारण संभव ना हो सका दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले अंग्रेजों द्वारा और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सेकुलर वादी शासन के द्वारा इस मुद्दे का समाधान करने के बजाय जानबूझकर ,मात्र अपनी राजनीति रोटियां सेकने के उद्देश्य से इस मुद्दे को निरंतर उलझाया जाता रहा स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की प्रसिद्ध फूट डालो और शासन करो की कुनीति को आगे बढ़ाते हुए लार्ड वाइसकाउन्ट कैनिंग के कृत्यों का वर्णन में करूं, इससे पहले मैं आपको राम जन्मभूमि प्रकरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी अवध के अंतिम नवाब वजीर वाजिद अली शाह और अयोध्या नरेश महाराजा मानसिंह का वर्णन कर देना आवश्यक समझता हूं 1853 में अवध के नवाब वजीर वाजिद अली शाह थे ,वर्ष 1855 में मुसलमानों द्वारा हनुमानगढ़ी पर कब्जा करने के उद्देश्य से आक्रमण किया गया था राम जन्मभूमि से करीब 100 मीटर की दूरी पर स्थित हनुमानगढ़ी पर कब्जा करने की कोशिश तो की गई किंतु मुसलमानों को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी मुसलमानों ने आक्रमण तो किया किंतु साधु संत बैरागीयों, जिन्हें चिमटाधारी संत भी कहा जाता था, ने भी पलटवार करते हुए तथाकथित बाबरी परिसर में स्थित सीता रसोई पर कब्जा करके वहां पूजा-पाठ और अर्चना प्रारंभ कर दी थी , अंग्रेज वाजिद अली शाह से हमेशा नाराज रहते थे क्योंकि अंग्रेज की फूट डालो और शासन करो की कुनीति मैं पलीता लगाने का कार्य हमेशा वाजिद अली शाह करते रहे थे, अंग्रेजी साम्राज्य हमेशा इसी अवसर की तलाश में रहता था कि वाजिद अली शाह कब गलती करें और कब उन्हें धर दबोचा जाए अंग्रेजों को यह मौका 1855 में आखिरकार मिल ही गया जब हनुमानगढ़ी पर जेहादी मुसलमानों ने धावा बोला तो उसका नेतृत्व मौलवी आमिर अली अमेठवी कर रहा था बैरागीओं द्वारा बुरी तरह मात खाने के बाद मुसलमान नवाब वजीर वाजिद अली शाह के दरबार में सुलह समझौते के लिए पहुंचे और सुलह समझौते और मध्यस्थता के लिए एक प्रलेख उन्हें प्रदान किया, वाजिद अली शाह ने उस अर्जी पर यह लिखते हुए कि "हम इश्क़ के बंदे हैं मजहब से नहीं वाकिफ, गर काबा हुआ तो क्या, बुत खाना हुआ तो क्या" यह कहते हुए उन्होंने प्रलेख को वापस कर दिया और हिंदुओं का साथ दिया, वाजिद अली शाह द्वारा हिंदुओं का साथ देने की इस घटना को सुन अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी 7 फरवरी 1856 को उनके पद से यह कहते हुए यह कि"The terms of the doctrine of lapse on the ground of alleged lnternal misrule. पदच्युत कर दिया, मैं यहां यह बताना आवश्यक समझता हूं कि 1855 में ही अयोध्या के महाराजा राजा मानसिंह जो की द्विजदेव के नाम से भी जाने जाते थे, एक अच्छे कवि भी थे, ने नवाब वाजिद अली शाह से कहा कि राम चबूतरे का निर्माण पुनः करवा दें वाजिद अली शाह ने राजा मानसिंह की बात को मानकर नासिक चबूतरे का निर्माण करवाया बल्कि उसको चारों ओर से 3 फीट ऊंची खास की टट्टीयो(पैनल) के द्वारा घिरवाकर एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया ,इस प्रकार वहां पर फिर से पूजा-अर्चना प्रारंभ हो गई, लॉर्ड डलहौजी 28 फरवरी 1856के पद मुक्त होने के बाद उनकी जगह 28 फरवरी 1856 को लार्ड वाइसकाउन्ट कैनिंग भारत का गवर्नर जनरल व प्रथम वायसराय बना ,1857 की क्रांति जब प्रारंभ हुई तो निर्मोही अखाड़े के संत बाबा राम चरण दास और मुस्लिम पक्ष से आमिर अली अमेठी के मध्य हुए समझौते मैं आमिर अली ने राम जन्मभूमि को हिंदुओं को सौंपने की बातें कहीं आमिर अली अमेठी ने कहा कि विरादाराने वतन बेगम ओं के जेवरात को बचाने में हमारे हिंदू भाइयों ने जिस अंग्रेजो के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई दिखाई है उसे हम भूल नहीं सकते हैं सम्राट बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह मानकर हमारे हिंदू भाई अपना खून बहा रहे हैं इसीलिए फर्ज इलाही हमें मजबूर करता है कि हिंदुओं के खुदा श्री रामचंद्र जी की पैदाइशी जगह पर जो बाबरी मस्जिद बनी है वह हम इन्हें व खुशी सुपुर्द कर दे क्योंकि हिंदू मुस्लिम नाइत्तफाकी की सबसे बड़ी जड़ यही है ऐसा करके हम इनके दिल पर फतेह पा जाएंगे, Lord Canning लार्ड डलहौजी की फूट डालो शासन करो की नीति को आगे बढ़ा रहा था उसे लगा कि मुसलमान भी हिंदुओं के साथ मिलकर राम जन्मभूमि की समस्या का समाधान कर चुके हैं तो उन्हें लगने लगा कि कहीं अंग्रेजी साम्राज्य हमारे हाथ से निकल ना जाए, तब उन्होंने आमिर अली अमेठी और बाबा राम चरण दास पर अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत करने का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया, और 18 मार्च1858 को अयोध्या स्थित कुबेर टीला पर स्थित एक इमली के पेड़ पर दोनों को फांसी पर लटका दिया बाद में इन क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि स्वरुप वहां के स्थाई निवासी इमली के पेड़ की पूजा करने लगे उस पर फूल माला अच्क्षत आदिचढ़ाने लगे यह सब देख अंग्रेजों ने उस पेड़ को इसलिए कटवा दिया कि कहीं आम नागरिकों के मन में भी धीरे-धीरे विद्रोह के स्वर ना फूटने लगे सुल्तानपुर गजेटियर पृष्ठ संख्या 36 पर कर्नल मार्टिन ने जो रिपोर्ट लिखी उसे अंग्रेजो की मानसिकता का पता चल जाता है, कर्नल मार्टिन ने लिखा है कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद को मुसलमानों के द्वारा हिंदुओं को दिलाने खबर सुनकर हम लोगों को घबराहट फैल गई है और यह विश्वास हो गया है कि हिंदुस्तान से अब हम रेशम खत्म हो जाएंगे लेकिन यह अच्छा हुआ कि गदर का पासा पलट गया और आमिर अली तथा बाबा राम चरण दास को फांसी पर लटका दिया गया इससे फैजाबाद क्रांतिकारियों की कमर टूट गई और तमाम फैजाबाद जिले पर हमारा रौब जम गया क्योंकि गोंडा के राजा देवी भगत सिंह पहले ही फरार हो चुके थे, आमिर अली और बाबा राम चरण दास को फांसी पर चढ़ाने के बाद नवाब वजीर वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लंदन भेज दिया, गवर्नर जनरल और अंतिम वायसराय वाइसकाउन्ट कैनिंग द्वारा विद्रोह को पूरी तरह कुचलते हुए अयोध्या के रेवेन्यू बन्दोबस्त का संक्षिप्त कार्य (समरी सेटेलमेंट ऑफ रेवेन्यु) प्रारम्भ किया गया जो 1857-1858 तक जारी रहा। यह सब पूर्ववर्ती नवाबी दौर के अभिलेखों के क्रम को आगे बढ़ाकर हुआ। सिर्फ राम जन्मस्थान की भूमि को बल्कि इससे संबंधित अन्य संपत्तियों को भी सरकारी संपत्ति घोषित करते हुए इसे सरकारी दस्तावेजों में लिपि बंद कर दिया, निर्मोही अखाड़ा कहता है कि राम जन्मभूमि से संबंधित हमारे कागजात डकैत उठा ले गए मुस्लिम पक्ष राम जन्म स्थान की भूमि को अपने मालिकाना हक का दावा करता है मैं समझता हूं ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट 1528 के पहले के नजूल रिकार्डों की जांच करा ले यह भूमि किसके नाम पर है फिर भी मैं इतना कहूंगा की 1528 से पहले अगर यह भूमि सरकारी संपत्ति निकलती है तो भी यह सारी भूमि श्री राम की है आर्कियोलॉजी सर्वे आफ इंडिया की रिपोर्ट है जो यह साफ-साफ दर्शाती हैं कि उस जमीन के नीचे एक भव्य मंदिर था ऐसे में मेरे पिछले आर्टिकल एक मंदिर सदा सर्वदा मंदिर के संबंध में जो केस प्रस्तुत किया वह यहां पर सटीक बैठता है ऐसे में सुप्रीम कोर्ट सारी भूमि सरकार को हैंड ओवर कर अपने निर्देशन में एक ट्रस्ट का गठन करें और सभी हिंदू पक्षकारों को उसमें सदस्य बनाकर भव्य राम मंदिर का निर्माण प्रशस्त करें मैंने इतनी बातें इस पूरे घटनाक्रम में एक किरदार को मैं बार-बार भूल रहा था और वे थे अयोध्या के महाराजा मानसिंह उनका क्या हुआ तो हुआ यह है कि अयोध्या राजा नरेश मानसिंह इन सब को घटनाओं को देख अत्यंत व्यथित हुए और उनका मन संसार से उचट गया विरक्ति की भावना पैदा हुई तो वह सब कुछ छोड़ कर वृंदावन चले गए जहां 11 अक्टूबर सन 1870 को उनका स्वर्गवास हो गया इस प्रकार जिस राम जन्म भूमि की समस्या का समाधान अंग्रेजी शासन काल के समय हो जाना चाहिए था वह अंग्रेजों की दमनकारी कुनीति व कूटनीति के कारण राम जन्मभूमि उद्धार होने से एक बार फिर वंचित हो गई जय श्री राम वंदे मातरम हर-हर महादेव
आपका ही
मनीष पांडेय अधिवक्ता
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा

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