काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिरविध्वंस श्रंखला भाग 4
काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 4
विदेशी यात्रियों, इतिहासकारों, लेखकों, की दृष्टि में काशी विश्वनाथ मंदिर विध्वंस
मनीष पाण्डेय
काशी महादेव की नगरी है, काशी मोक्ष की नगरी है कहते हैं काशी स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर के जिसने दर्शन कर गंगा नदी में स्नान कर लिया उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है पुराणों में कथा का वर्णन आता है जिसमें हिम पुत्री पार्वती का विवाह भगवान शंकर के साथ संपन्न होता है भगवान शंकर कैलाश पर्वत में ही रहने लगते हैं किंतु पार्वती को यह पसंद नहीं आता और वह शंकर से बार-बार आग्रह करती है कि वह अपने स्थान पर ले चले अपने देश ले चले, भगवान शंकर की बात को मान जाते हैं और पार्वती संग काशी चले जाते हैं, कहते हैं कि काशी में आकर भगवान शंकर यहीं पर 12वें ज्योतिर्लिंग के रूप में विश्वनाथ अथवा विशेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हो गए, दुर्भाग्यवश इसी काशी विश्वनाथ मंदिर जहां भगवान शिव स्वयं विराजे को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए ना जाने कितनी बार मुगल आक्रांताओं ने इस ओर रुख किया, अपनी जिहादी और आतंकी प्रवृत्ति से वशीभूत इन जिहादी लुटेरों ने न जाने कितनी बार काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त किया, समय-समय पर लेखकों इतिहासकारों इत्यादि के द्वारा इस विषय पर काफी कुछ लिखा गया है 1912 में पंडित वाचस्पति मिश्र द्वारा लिखित तीर्थ चिंतामणि संस्कृत भाषा में लिखा गया था मिथिला के रहने वाले पंडित वाचस्पति मिश्र को मिथिला नरेश हरिनारायण देव द्वारा मिश्र को स्मृति श्रंखला kirtya manarnava को लिखने का कार्य सौंपा था उसी स्मृति चिंतामणि के अंतर्गत पीर के चिंतामणि ही मिश्र द्वारा लिखी गई थी जिसमें भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ गया, पुरी, (पुरुषोत्तमा) गंगा नदी, आदि के विषय में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया था वाचस्पति मिश्र द्वारा तीर्थ चिंतामणि में ना सिर्फ काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में सविस्तार से वर्णन किया गया है, बल्कि ज्ञानवापी कुंड के बारे में भी विस्तार पूर्वक से वर्णित किया गया है इसी में उन्होंने अभी मुक्तेश्वर व विशेश्वर को एक ही लिंग माना है, इसी प्रकार संस्कृत सिंधी भाषा में ही लिखा गया 1934 में श्री जिन प्रभु सूरी द्वारा रचित विविध तीर्थ स्थल में भी बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र बताते हुए वर्णित किया गया है कि वाराणसी चेयं संप्रति चतुर्धा विभक्ता, दृश्यते,तद् यथा देव वाराणसी यत्र विश्वनाथ प्रासाद:
इसी प्रकार राल्फ फिंच 1583 -1591 काशी विश्वनाथ भगवान विशेश्वर के बारे में लिखता है कि बहुत से देवताओं में से एक हैं जिनका हिंदू बहुत आदर करते हैं उनके अनुसार वे सारे संसार को खाना और कपड़ा देते हैं उनकी मूर्ति के पास बैठकर एक आदमी हमेशा पंखा किया करता है इसके विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि उस समय काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हो चुका था--
विलियम फास्टर अर्ली ट्रैवल इन इंडिया पृष्ठ 176
ज्ञानवापी मस्जिद का 125×18 फुट नाप का पूरब की ओर का चबूतरा 14वीं शताब्दी के विश्वनाथ मंदिर का ही एक भाग है शेष अगले अंक में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
M•COM,LLB,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
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विदेशी यात्रियों, इतिहासकारों, लेखकों, की दृष्टि में काशी विश्वनाथ मंदिर विध्वंस
मनीष पाण्डेय
काशी महादेव की नगरी है, काशी मोक्ष की नगरी है कहते हैं काशी स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर के जिसने दर्शन कर गंगा नदी में स्नान कर लिया उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है पुराणों में कथा का वर्णन आता है जिसमें हिम पुत्री पार्वती का विवाह भगवान शंकर के साथ संपन्न होता है भगवान शंकर कैलाश पर्वत में ही रहने लगते हैं किंतु पार्वती को यह पसंद नहीं आता और वह शंकर से बार-बार आग्रह करती है कि वह अपने स्थान पर ले चले अपने देश ले चले, भगवान शंकर की बात को मान जाते हैं और पार्वती संग काशी चले जाते हैं, कहते हैं कि काशी में आकर भगवान शंकर यहीं पर 12वें ज्योतिर्लिंग के रूप में विश्वनाथ अथवा विशेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हो गए, दुर्भाग्यवश इसी काशी विश्वनाथ मंदिर जहां भगवान शिव स्वयं विराजे को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए ना जाने कितनी बार मुगल आक्रांताओं ने इस ओर रुख किया, अपनी जिहादी और आतंकी प्रवृत्ति से वशीभूत इन जिहादी लुटेरों ने न जाने कितनी बार काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त किया, समय-समय पर लेखकों इतिहासकारों इत्यादि के द्वारा इस विषय पर काफी कुछ लिखा गया है 1912 में पंडित वाचस्पति मिश्र द्वारा लिखित तीर्थ चिंतामणि संस्कृत भाषा में लिखा गया था मिथिला के रहने वाले पंडित वाचस्पति मिश्र को मिथिला नरेश हरिनारायण देव द्वारा मिश्र को स्मृति श्रंखला kirtya manarnava को लिखने का कार्य सौंपा था उसी स्मृति चिंतामणि के अंतर्गत पीर के चिंतामणि ही मिश्र द्वारा लिखी गई थी जिसमें भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ गया, पुरी, (पुरुषोत्तमा) गंगा नदी, आदि के विषय में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया था वाचस्पति मिश्र द्वारा तीर्थ चिंतामणि में ना सिर्फ काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में सविस्तार से वर्णन किया गया है, बल्कि ज्ञानवापी कुंड के बारे में भी विस्तार पूर्वक से वर्णित किया गया है इसी में उन्होंने अभी मुक्तेश्वर व विशेश्वर को एक ही लिंग माना है, इसी प्रकार संस्कृत सिंधी भाषा में ही लिखा गया 1934 में श्री जिन प्रभु सूरी द्वारा रचित विविध तीर्थ स्थल में भी बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र बताते हुए वर्णित किया गया है कि वाराणसी चेयं संप्रति चतुर्धा विभक्ता, दृश्यते,तद् यथा देव वाराणसी यत्र विश्वनाथ प्रासाद:
इसी प्रकार राल्फ फिंच 1583 -1591 काशी विश्वनाथ भगवान विशेश्वर के बारे में लिखता है कि बहुत से देवताओं में से एक हैं जिनका हिंदू बहुत आदर करते हैं उनके अनुसार वे सारे संसार को खाना और कपड़ा देते हैं उनकी मूर्ति के पास बैठकर एक आदमी हमेशा पंखा किया करता है इसके विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि उस समय काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हो चुका था--
विलियम फास्टर अर्ली ट्रैवल इन इंडिया पृष्ठ 176
ज्ञानवापी मस्जिद का 125×18 फुट नाप का पूरब की ओर का चबूतरा 14वीं शताब्दी के विश्वनाथ मंदिर का ही एक भाग है शेष अगले अंक में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
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