काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर श्रंखला भाग 11
काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 11
पुरातात्विक साक्ष्य को नकारती जिहादी मुस्लिम मानसिकता और अंग्रेजों की कुटिल कूटनीति
मनीष पाण्डेय
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जिहादी मुस्लिम आक्रांता ओं द्वारा सनातन हिंदू धर्म को नष्ट भ्रष्ट तथा मिट्टी में मिला देने की कुत्सित मानसिकता के चलते तथा भारतीय संस्कृति को समाप्त कर देने की प्रवृत्ति के चलते हिंदू सनातन धर्म और संस्कृति पर ना जाने कितने आघात किए गए हिंदू मंदिरों को तोड़ने और हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियों का भंजन करना मुस्लिम आक्रांताओं की हिट लिस्ट में हुआ करता था न सिर्फ काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर बल्कि राम जन्मभूमि कृष्ण जन्मभूमि सहित अनेक हिंदू मंदिरों के साथ मुस्लिम आक्रांताओं ने यही किया कालांतर में जब अंग्रेजी शासन आया तो वह इस विषय को अच्छी तरह जानते थे कि सभी मंदिरों को तोड़कर वहां मुस्लिमों द्वारा मस्जिद बनाई गई है इस सच्चाई से वाकिफ होने के बावजूद भी जानबूझकर वैमनस्यता पैदा करने का कार्य अंग्रेजों द्वारा किया गया और उन्होंने इस विषय को अनावश्यक रूप से बढ़ाते चले गए जो निर्णय हिंदू पक्ष में होना चाहिए था वह नहीं हो सका किंतु कालांतर में जैसे-जैसे हिंदू शक्ति जागृत अवस्था में पहुंची वह अपने अधिकार को पाने के लिए पुनः उठ खड़ी हुई मुसलमानों और कुछ सेकुलर हिंदुओं द्वारा यह भरपूर प्रयास किया गया कि सच्चाई को छुपाया जा सके, किंतु क्या ऐसा हो सका? जिस तरह काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर में औरंगजेब के इंजीनियरों ने पूरे मंदिर परिसर का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए कर दिया मंदिर के अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए किया गया, जैसा कि राम जन्मभूमि में भी हुआ था, तथाकथित बाबरी मस्जिद बनाने के लिए उस समय मीर बांकी द्वारा नष्ट किए गए मंदिरों के अवशेष से ही एक तथाकथित मस्जिद ए बाबरी खड़ी कर दी गई, किंतु उसके दीवारों और अवशेषों को देखने के उपरांत ही यह स्थिति साफ हो गई कि किस तरह मीर बाकी के लोगों ने मंदिर को ध्वस्त कर एक असफल मस्जिद बनाने का प्रयास किया है, काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के साथ भी यही हुआ काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के मामले में जिस तरह मंदिर अवशेषों का उपयोग किया गया उसके दर्शन आज तथाकथित मस्जिद में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं औरंगजेब के इंजीनियरों ने मंदिर के पश्चिमी हाल एवं उससे संबंधित मंदिर को गिरा देने का निर्णय लिया था मंदिर के अंदर जितने भी उपयोगी और कीमती सामान थे उनको अलग कर लिया गया तथा मलबे को ही समतल कर मस्जिद के पीछे के भाग को उसी अभद्र स्वरूप में रहने दिया गया जिसके दर्शन आज ही किए जा सकते हैं अवशिष्ट भाग का स्तर भी मस्जिद स्तर के समान ही है जो प्रदक्षिणा पथ से 4 से 6 फुट ऊंचा है, पश्चिमी मंडप का ऊपरी भाग आज भी विद्यमान है, जिससे कि हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि गुंबद को पूर्णतया वृत्ताकार नहीं बनाया गया जो कि प्रायः मुस्लिमों द्वारा मस्जिदों में बनाया जाता है इसे पत्थरों के किनारे को काटकर व क्रम से जोड़कर चौकोर मंदिर को बहुकोणीय व क्रमशः गोले रूप में परिणित किया गया, मंडप व उसके मंदिरों के गिराने के बाद औरंगजेब के कलाकारों ने मंदिर के पश्चिमी दरवाजे को बंद कर दिया साथ ही साथ मंडपो के दोनों पश्चिम दरवाजों को बंद कर मस्जिद की पश्चिमी दीवार तैयार कराई गई, इन तीनों दरवाजों को आज भी देखा जा सकता है, पश्चिमी दीवारों का हिस्सा वहां तक रखा गया जहां से की मंदिर के शिखर प्रारंभ होते थे ,कोई भी देखकर यह निश्चित तौर पर इसे हिंदू मंदिर के अवशिष्ट भाग के रूप में निष्कर्ष निकाल सकता है कि शिखरों को निकाल कर वहां गुंबद बना दिए गए, मंदिर का नक्शा इस प्रकार था कि औरंगजेब के इंजीनियर निर्माण में केवल गर्भ ग्रह और उत्तरी दक्षिणी मंडपो को का ही प्रयोग कर सकते थे, उन्होंने गर्भ ग्रह को मस्जिद के केंद्रीय कक्ष में परिणित कर दिया जो कि 32 फुट का था, और वह आज भी 32 फुट का ही है, केंद्रीय कक्ष के चारों तरफ चार दलानी जो 16 ×10 फुट की थी वह नए निर्माण में बनाए रखी गई, और इससे आज भी मस्जिद की केंद्रीय कच्छ के चारों तरफ देखा जा सकता है ,उत्तर और दक्षिण की मंडप मस्जिद के पार्षदों में परिवर्तित किए गए, वह 16 ×16 फुट की थी ,जो उनके उद्देश्य से काफी छोटी थी, उसे 24× 24 फुट कर दिया गया, जिसे उन छोटे वालों से सटे हुए 8 फुट चौड़ाई के दानों को मिलाकर और पूर्व की दीवारों की चौड़ाई को पूर्व व पश्चिम की तरफ से चार चार फुट घटाकर बनाया गया, मंदिर के पूर्वी भाग का उपयोग नहीं किया जा सकता था, इसीलिए उसे नष्ट कर दिया गया और उसका कुछ भाग मस्जिद की तीनों वालों के सामने के बड़े बरामदे को बनाने में किया गया, खंबे जो इसके उपयोग किए गए उन पर हिंदू कलाकृतियां आकृतियां भी अंकित है, जिस प्रकार राजा टोडरमल ने पूरब की हाल को 125 × 35 का उसके पुराने तल पर रखा था औरंगजेब के इंजीनियर ने उसे पत्थर की पटरियों से ढककर मस्जिद के सामने एक बड़ा चबूतरा तैयार किया, यदि वे ऐसा नहीं करते तो मस्जिद के सामने केवल 125 ×25 आकार का एक आंगन रहता और वह बड़े अफसरों के लिए अत्यंत छोटा साबित होता ,जैसा कि पूर्व में प्राया देखा जाता है बड़े मंडप को ढककर उस चबूतरे को 125 × 58 फुट का आकार दे दिया गया जिससे कि वहां एक बड़ा जनसमूह एकत्रित हो सके, और हाथ पैर धोने के लिए एक तालाब का निर्माण हो सके, जो कि मुस्लिम अपनी पूजा के पूर्व प्रयोग करते हैं मस्जिद की उत्तरी पश्चिमी और दक्षिणी दीवार उस पुराने हिंदू मंदिर की है जिसे राजा टोडरमल की सहायता से जगतगुरु नारायण भट्ट ने बनवाया था और सामने का आंगन 15वीं शती के हिंदू मंदिर का रंग मंडप है, जिसे ढक दिया गया है, इस मस्जिद के संबंध में एक महत्वपूर्ण संस्था फारसी के साहित्यक क्षेत्र में भी बचा रहा है औरंगजेब के दरबार में एक वृद्ध भी ब्राह्मण शायर थे जिसका उपनाम बरहमन और चंद्रभानु था जब मस्जिद बन चुकी तब किसी अवसर पर औरंगजेब ने उसे ताना मार कर कहा कि मियां शायद तुम्हारे विश्वनाथ की मंदिर की जगह अब मस्जिद बन गई है क्या कहते हो बूढ़े ब्राह्मण ने तत्काल बेधड़क उत्तर दिया जहांपना शेर हाजिर है हुक्म हो तो अर्ज करूं "बेवीं करामतेबुतखान ए मराए ए शेख ,कि चूं खराबशवद खान ए खुदा गरदद -कुल्लियाते बरहमन
अर्थात हे शेख हमारे मंदिर का यह कब तक देख कि बर्बाद होने पर ही तेरे खुदा की जहां तक पहुंच हो पाई इतिहास गवाह है कि अंग्रेज चाहती तो इसका हल बड़ी आसानी से कर लेते हैं किंतु किंतु अपनी मानसिकता के चलते वैसा ना कर सके सन 7 अगस्त 1790 ईसवी को महादजी सिंधिया ने विश्वनाथ मंदिर को पुनर्निर्माण कराने का शाह आलम से फरमान जारी करवा लिया इसके लिए मुआवजा देने की बात भी तय हो गई थी किंतु अंग्रेजों ने मुस्लिमों के विरोधी से बचने के लिए ऐसा नहीं किया टीपू सुल्तान से हुए युद्ध में सहयोग के लिए नाना फडणवीस ने अंग्रेजों से समझौता किया है कि विजय के पश्चात वे विश्वनाथ मंदिर को हिंदुओं को सौंप देंगे किंतु विजय के पश्चात अंग्रेजों ने अपनी बात से मुकर गए और विश्वनाथ मंदिर पुनः नहीं बन सका 30 दिसंबर 1810 को उस वक्त के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट मिस्टर वाटसन ने एक पत्र जो कि 21 दिसंबर 1809 वाइस प्रेसिडेंट इन काउंसिल को लिखा गया जिसमें उन्होंने गवर्नमेंट को सुझाव दिया कि ज्ञानवापी आता को हिंदुओं को सदा के लिए सौंप देना चाहिए क्योंकि वह हिंदुओं का प्राचीन धार्मिक स्थल रहा है और प्राचीन विशेश्वर मंदिर के एक भाग को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है जो हिंदुओं और मुसलमानों के झगड़े की जड़ है किंतु 12 मार्च 1810 को एक्टिंग (कार्यकारी) मजिस्ट्रेट मिस्टर डब्लू डब्लू वर्ड ने अपने एक पत्र में वाइस प्रेसिडेंट इन काउंसिल को मिस्टर वाटसन के सुझाव के विपरीत सुझाव दिया कि ज्ञानवापी में हिंदू और मुसलमानों के अपने-अपने धार्मिक कार्यों को पूर्ण वक्त बहाल किया जाए विवादित ढांचे में हिंदू व मुसलमान लोग दोनों को समान अधिकार दिया जाए जिसे वाइस प्रेसिडेंट इन काउंसिल ने 23 मार्च 1810 स्वीकार किया, मुसलमानों की विरोध के चलते अंग्रेजों ने मुस्लिमों को विशेष अवसरों पर नमाज पढ़ने की छूट भी दी थी और कब्जा हिंदुओं को दे दिया था अट्ठारह सौ सत्तावन को पूरा भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लड़ रहा था तब मुसलमानों ने नए विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उस पर हरा झंडा लहराने का प्रयास किया था किंतु सेना की सक्रियता के कारण एक बड़ी घटना होने से बच गई थी एम•ए•शेरिंग ने 1868 ने एम•ए•शेरिंग (Matthew Atmore Sherring) 1868 ने the sacred city of the hindus: an account of benares in ancient and modern times) में लिखा था कि औरंगज़ेब द्वारा नष्ट किए गए मंदिर के "व्यापक अवशेष" अभी भी दिखाई दे रहे हैं, जो मस्जिद की "पश्चिमी दीवार का एक बड़ा हिस्सा" है। उन्होंने उल्लेख किया कि अवशेष संरचना में हिंदू लोगों के अलावा जैन और बौद्ध तत्व भी थे।
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
M•COM,LLB,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
प्लीज डू नॉट कट पेस्ट एंड ओनली शेयर
पुरातात्विक साक्ष्य को नकारती जिहादी मुस्लिम मानसिकता और अंग्रेजों की कुटिल कूटनीति
मनीष पाण्डेय
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जिहादी मुस्लिम आक्रांता ओं द्वारा सनातन हिंदू धर्म को नष्ट भ्रष्ट तथा मिट्टी में मिला देने की कुत्सित मानसिकता के चलते तथा भारतीय संस्कृति को समाप्त कर देने की प्रवृत्ति के चलते हिंदू सनातन धर्म और संस्कृति पर ना जाने कितने आघात किए गए हिंदू मंदिरों को तोड़ने और हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियों का भंजन करना मुस्लिम आक्रांताओं की हिट लिस्ट में हुआ करता था न सिर्फ काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर बल्कि राम जन्मभूमि कृष्ण जन्मभूमि सहित अनेक हिंदू मंदिरों के साथ मुस्लिम आक्रांताओं ने यही किया कालांतर में जब अंग्रेजी शासन आया तो वह इस विषय को अच्छी तरह जानते थे कि सभी मंदिरों को तोड़कर वहां मुस्लिमों द्वारा मस्जिद बनाई गई है इस सच्चाई से वाकिफ होने के बावजूद भी जानबूझकर वैमनस्यता पैदा करने का कार्य अंग्रेजों द्वारा किया गया और उन्होंने इस विषय को अनावश्यक रूप से बढ़ाते चले गए जो निर्णय हिंदू पक्ष में होना चाहिए था वह नहीं हो सका किंतु कालांतर में जैसे-जैसे हिंदू शक्ति जागृत अवस्था में पहुंची वह अपने अधिकार को पाने के लिए पुनः उठ खड़ी हुई मुसलमानों और कुछ सेकुलर हिंदुओं द्वारा यह भरपूर प्रयास किया गया कि सच्चाई को छुपाया जा सके, किंतु क्या ऐसा हो सका? जिस तरह काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर में औरंगजेब के इंजीनियरों ने पूरे मंदिर परिसर का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए कर दिया मंदिर के अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए किया गया, जैसा कि राम जन्मभूमि में भी हुआ था, तथाकथित बाबरी मस्जिद बनाने के लिए उस समय मीर बांकी द्वारा नष्ट किए गए मंदिरों के अवशेष से ही एक तथाकथित मस्जिद ए बाबरी खड़ी कर दी गई, किंतु उसके दीवारों और अवशेषों को देखने के उपरांत ही यह स्थिति साफ हो गई कि किस तरह मीर बाकी के लोगों ने मंदिर को ध्वस्त कर एक असफल मस्जिद बनाने का प्रयास किया है, काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के साथ भी यही हुआ काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के मामले में जिस तरह मंदिर अवशेषों का उपयोग किया गया उसके दर्शन आज तथाकथित मस्जिद में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं औरंगजेब के इंजीनियरों ने मंदिर के पश्चिमी हाल एवं उससे संबंधित मंदिर को गिरा देने का निर्णय लिया था मंदिर के अंदर जितने भी उपयोगी और कीमती सामान थे उनको अलग कर लिया गया तथा मलबे को ही समतल कर मस्जिद के पीछे के भाग को उसी अभद्र स्वरूप में रहने दिया गया जिसके दर्शन आज ही किए जा सकते हैं अवशिष्ट भाग का स्तर भी मस्जिद स्तर के समान ही है जो प्रदक्षिणा पथ से 4 से 6 फुट ऊंचा है, पश्चिमी मंडप का ऊपरी भाग आज भी विद्यमान है, जिससे कि हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि गुंबद को पूर्णतया वृत्ताकार नहीं बनाया गया जो कि प्रायः मुस्लिमों द्वारा मस्जिदों में बनाया जाता है इसे पत्थरों के किनारे को काटकर व क्रम से जोड़कर चौकोर मंदिर को बहुकोणीय व क्रमशः गोले रूप में परिणित किया गया, मंडप व उसके मंदिरों के गिराने के बाद औरंगजेब के कलाकारों ने मंदिर के पश्चिमी दरवाजे को बंद कर दिया साथ ही साथ मंडपो के दोनों पश्चिम दरवाजों को बंद कर मस्जिद की पश्चिमी दीवार तैयार कराई गई, इन तीनों दरवाजों को आज भी देखा जा सकता है, पश्चिमी दीवारों का हिस्सा वहां तक रखा गया जहां से की मंदिर के शिखर प्रारंभ होते थे ,कोई भी देखकर यह निश्चित तौर पर इसे हिंदू मंदिर के अवशिष्ट भाग के रूप में निष्कर्ष निकाल सकता है कि शिखरों को निकाल कर वहां गुंबद बना दिए गए, मंदिर का नक्शा इस प्रकार था कि औरंगजेब के इंजीनियर निर्माण में केवल गर्भ ग्रह और उत्तरी दक्षिणी मंडपो को का ही प्रयोग कर सकते थे, उन्होंने गर्भ ग्रह को मस्जिद के केंद्रीय कक्ष में परिणित कर दिया जो कि 32 फुट का था, और वह आज भी 32 फुट का ही है, केंद्रीय कक्ष के चारों तरफ चार दलानी जो 16 ×10 फुट की थी वह नए निर्माण में बनाए रखी गई, और इससे आज भी मस्जिद की केंद्रीय कच्छ के चारों तरफ देखा जा सकता है ,उत्तर और दक्षिण की मंडप मस्जिद के पार्षदों में परिवर्तित किए गए, वह 16 ×16 फुट की थी ,जो उनके उद्देश्य से काफी छोटी थी, उसे 24× 24 फुट कर दिया गया, जिसे उन छोटे वालों से सटे हुए 8 फुट चौड़ाई के दानों को मिलाकर और पूर्व की दीवारों की चौड़ाई को पूर्व व पश्चिम की तरफ से चार चार फुट घटाकर बनाया गया, मंदिर के पूर्वी भाग का उपयोग नहीं किया जा सकता था, इसीलिए उसे नष्ट कर दिया गया और उसका कुछ भाग मस्जिद की तीनों वालों के सामने के बड़े बरामदे को बनाने में किया गया, खंबे जो इसके उपयोग किए गए उन पर हिंदू कलाकृतियां आकृतियां भी अंकित है, जिस प्रकार राजा टोडरमल ने पूरब की हाल को 125 × 35 का उसके पुराने तल पर रखा था औरंगजेब के इंजीनियर ने उसे पत्थर की पटरियों से ढककर मस्जिद के सामने एक बड़ा चबूतरा तैयार किया, यदि वे ऐसा नहीं करते तो मस्जिद के सामने केवल 125 ×25 आकार का एक आंगन रहता और वह बड़े अफसरों के लिए अत्यंत छोटा साबित होता ,जैसा कि पूर्व में प्राया देखा जाता है बड़े मंडप को ढककर उस चबूतरे को 125 × 58 फुट का आकार दे दिया गया जिससे कि वहां एक बड़ा जनसमूह एकत्रित हो सके, और हाथ पैर धोने के लिए एक तालाब का निर्माण हो सके, जो कि मुस्लिम अपनी पूजा के पूर्व प्रयोग करते हैं मस्जिद की उत्तरी पश्चिमी और दक्षिणी दीवार उस पुराने हिंदू मंदिर की है जिसे राजा टोडरमल की सहायता से जगतगुरु नारायण भट्ट ने बनवाया था और सामने का आंगन 15वीं शती के हिंदू मंदिर का रंग मंडप है, जिसे ढक दिया गया है, इस मस्जिद के संबंध में एक महत्वपूर्ण संस्था फारसी के साहित्यक क्षेत्र में भी बचा रहा है औरंगजेब के दरबार में एक वृद्ध भी ब्राह्मण शायर थे जिसका उपनाम बरहमन और चंद्रभानु था जब मस्जिद बन चुकी तब किसी अवसर पर औरंगजेब ने उसे ताना मार कर कहा कि मियां शायद तुम्हारे विश्वनाथ की मंदिर की जगह अब मस्जिद बन गई है क्या कहते हो बूढ़े ब्राह्मण ने तत्काल बेधड़क उत्तर दिया जहांपना शेर हाजिर है हुक्म हो तो अर्ज करूं "बेवीं करामतेबुतखान ए मराए ए शेख ,कि चूं खराबशवद खान ए खुदा गरदद -कुल्लियाते बरहमन
अर्थात हे शेख हमारे मंदिर का यह कब तक देख कि बर्बाद होने पर ही तेरे खुदा की जहां तक पहुंच हो पाई इतिहास गवाह है कि अंग्रेज चाहती तो इसका हल बड़ी आसानी से कर लेते हैं किंतु किंतु अपनी मानसिकता के चलते वैसा ना कर सके सन 7 अगस्त 1790 ईसवी को महादजी सिंधिया ने विश्वनाथ मंदिर को पुनर्निर्माण कराने का शाह आलम से फरमान जारी करवा लिया इसके लिए मुआवजा देने की बात भी तय हो गई थी किंतु अंग्रेजों ने मुस्लिमों के विरोधी से बचने के लिए ऐसा नहीं किया टीपू सुल्तान से हुए युद्ध में सहयोग के लिए नाना फडणवीस ने अंग्रेजों से समझौता किया है कि विजय के पश्चात वे विश्वनाथ मंदिर को हिंदुओं को सौंप देंगे किंतु विजय के पश्चात अंग्रेजों ने अपनी बात से मुकर गए और विश्वनाथ मंदिर पुनः नहीं बन सका 30 दिसंबर 1810 को उस वक्त के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट मिस्टर वाटसन ने एक पत्र जो कि 21 दिसंबर 1809 वाइस प्रेसिडेंट इन काउंसिल को लिखा गया जिसमें उन्होंने गवर्नमेंट को सुझाव दिया कि ज्ञानवापी आता को हिंदुओं को सदा के लिए सौंप देना चाहिए क्योंकि वह हिंदुओं का प्राचीन धार्मिक स्थल रहा है और प्राचीन विशेश्वर मंदिर के एक भाग को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है जो हिंदुओं और मुसलमानों के झगड़े की जड़ है किंतु 12 मार्च 1810 को एक्टिंग (कार्यकारी) मजिस्ट्रेट मिस्टर डब्लू डब्लू वर्ड ने अपने एक पत्र में वाइस प्रेसिडेंट इन काउंसिल को मिस्टर वाटसन के सुझाव के विपरीत सुझाव दिया कि ज्ञानवापी में हिंदू और मुसलमानों के अपने-अपने धार्मिक कार्यों को पूर्ण वक्त बहाल किया जाए विवादित ढांचे में हिंदू व मुसलमान लोग दोनों को समान अधिकार दिया जाए जिसे वाइस प्रेसिडेंट इन काउंसिल ने 23 मार्च 1810 स्वीकार किया, मुसलमानों की विरोध के चलते अंग्रेजों ने मुस्लिमों को विशेष अवसरों पर नमाज पढ़ने की छूट भी दी थी और कब्जा हिंदुओं को दे दिया था अट्ठारह सौ सत्तावन को पूरा भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लड़ रहा था तब मुसलमानों ने नए विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उस पर हरा झंडा लहराने का प्रयास किया था किंतु सेना की सक्रियता के कारण एक बड़ी घटना होने से बच गई थी एम•ए•शेरिंग ने 1868 ने एम•ए•शेरिंग (Matthew Atmore Sherring) 1868 ने the sacred city of the hindus: an account of benares in ancient and modern times) में लिखा था कि औरंगज़ेब द्वारा नष्ट किए गए मंदिर के "व्यापक अवशेष" अभी भी दिखाई दे रहे हैं, जो मस्जिद की "पश्चिमी दीवार का एक बड़ा हिस्सा" है। उन्होंने उल्लेख किया कि अवशेष संरचना में हिंदू लोगों के अलावा जैन और बौद्ध तत्व भी थे।
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
M•COM,LLB,MBA (HR)
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प्लीज डू नॉट कट पेस्ट एंड ओनली शेयर
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