काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 7
काशी काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर श्रंखला भाग 7
काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के उद्धारक रहे मराठा साम्राज्य और होलकर राजवंश
मनीष पाण्डेय
निश्चित रूप से जब हिंदुत्व की बात आती है तो उसमें सर्वोपरि रूप से महाराष्ट्र का नाम अवश्य आता है दूसरे अर्थों में अगर आप कहें कि हिंदुत्व की उत्पत्ति ही महाराष्ट्र से हुई है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी महाराष्ट्र मराठा साम्राज्य की उत्पत्ति हुई महाराष्ट्र की पवित्र पावन भूमि ने एक से एक वीर शिरोमणि को पैदा किया है जो ना सिर्फ हिंदुत्व की आन बान और शान के प्रतीक रहे बल्कि उन्होंने हिंदू धर्म ध्वजा को संपूर्ण विश्व में फहराने का कार्य भी किया है, मराठा साम्राज्य की नींव वीर शिरोमणि छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा 1645 ईसवी में रखी गई थी, जोकि 1818 ईसवी तक चली, संभाजी बाजीराव पेशवा बालाजी बाजीराव , मल्हार राव होलकर ,नारायण राव, जैसे हिंदू वीरों से होता हुआ यह कारवां यहीं नहीं रुका बल्कि हिंदुत्व की धर्म ध्वजा उठाने का कार्य कालांतर में वीर विनायक दामोदर सावरकर पंडित नाथूराम गोडसे बाला साहेब ठाकरे पर आकर समाप्त हुआ होलकर साम्राज्य जिसका राजवंश मराठा साम्राज्य ही था ने भी मल्हार राव होलकर से प्रारंभ होकर अहिल्याबाई होलकर तक एक सशक्त और सुव्यवस्थित शासन, राजनीतिक सूझबूझ, सहिष्णु धार्मिकता, प्रजा के हितचिंतन, दान पुण्य तथा तीर्थस्थानों में भवननिर्माण के लिए ने विख्यात हुआ, ऐसे समय में जब मैं काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस को लिख रहा हूं तो ऐसे में यह सातवां भाग बेहद महत्वपूर्ण है एक ऊर्जा मुगल आक्रांता हूं द्वारा काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का विध्वंस किया जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर मराठा और होलकर साम्राज्य अपनी धर्म परायणता और कट्टर हिंदूवादी सोच के कारण न सिर्फ उनका पुनः निर्माण करवा रहा था बल्कि हिंदू समाज के माथे पर कलंक के रूप में खड़ी मस्जिद को ध्वस्त करने योजना भी बना रहा था ठीक उसी तरह जिस तरह 1992 में श्री अयोध्या धाम स्थित राम जन्मभूमि के स्थान पर खड़ी बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने की योजना 1949 में ही हिंदू महासभा द्वारा बना ली गई थी, मराठा शासन इस बात के लिए हमेशा से प्रयत्नशील रहा की उसे प्रयाग गया बनारस अयोध्या आदि स्थान उसके कब्जे में आ जाए भले ही उसका कारण राजनैतिक रहा हो पर राजनीतिक से ज्यादा मराठों को अपनी धार्मिक प्रवृत्ति, मुगलों के विरुद्ध ना झुकने की प्रवृत्ति को पूरा करने के उद्देश्य से इन स्थानों पर अपना कब्जा चाहते थे मुगल आक्रांताओं द्वारा जिन मंदिरों का विध्वंस कर दिया गया था, उन मंदिरों को पुनः निर्माण कराना मराठा अपनी आन बान और शान समझते थे ,मराठे निरंतर यह प्रयत्न अपने वकीलों के माध्यम से कर रहे थे कि मुसलमान कुछ मुआवजा लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर पर से अपना दावा छोड़ दें, बालाजी बाजीराव 1740 ईस्वी लेकर 17 61 ईसवी भी अपनी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनारस पर कब्जा करना चाहते थे, किंतु उनकी यह योजना सफल नहीं हो सकी 1742 ईस्वी में अपनी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने मिर्जापुर में रुक कर बनारस कूच किया, जब अवध के नवाब सफदरजंग को यह बात पता पड़ी तो उन्होंने बनारस के ब्राह्मणों, पंडितों को जान से मारने की धमकी देते हुए बालाजी बाजीराव को बनारस आने से रोकने के लिए कहा इतिहास गवाह है कि अगर ब्राह्मण उस समय बालाजी बाजीराव की बात मान लेते अथवा उनका साथ देते तो निश्चित रूप से काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का उद्धार बालाजी बाजीराव के हाथों हो गया होता किंतु ब्राह्मणों के अपनी मृत्यु के भय ने पूरे मामले को तहस-नहस करके रख दिया उस समय सलाहकार नारायण दीक्षित के नेतृत्व में पंडितों और ब्राह्मणों का एक दल पेशवा बालाजी बाजीराव से मिला अपनी जान की मृत्यु का भय बताकर उन्हें बनारस की ओर कूच करने के लिए मना किया उसी प्रकार मल्हार राव होलकर द्वारा भी काशी विश्वनाथ स्थित मस्जिद को विध्वंस कर उस स्थान पर मंदिर बनाने का स्वप्न देखा गया था, 27 जून 1742 को लिखा गया एक पत्र प्राप्त हुआ है जिसमें लिखा हुआ है कि मल्हारराव विचार ज्ञानवापी मस्जिद को गिरा कर पुनः विशेष और मंदिर बनाने का हुआ परंतु पंच ब्राह्मण ब्राह्मण इसलिए चिंतित हुए कि यह मस्जिद अगर बादशाह की हुक्म के बगैर गिराई गई तो बादशाह क्रुद्ध होकर ब्राह्मणों को मार डालेगा इस प्रांत में यमन प्रबल है सब के चित्र में यह बात नहीं जचती है दूसरी जगह मंदिर बनाना अच्छा है पत्र में आगे लिखा गया है कि ब्राह्मण सोचते हैं कि उनकी दुर्दशा होगी मना करने वाला कोई नहीं है वह मना करने से देवस्थान को रोकने का दोष होगा जो विशेश्वर को नहीं जाएगा जो विश्व से चाहेंगे वही होगा चिंता करने से क्या होगा अगर मस्जिद गिरने लगेगी तो सब ब्राह्मण मिलकर विनती पत्र भेजेंगे ऐसा विचार है उक्त पत्र कायगांव कर दीक्षित के ऑफिस से प्राप्त हुआ है पत्र पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि ब्राह्मणों को अगर अपना धर्म प्यारा होता तो आज हमारे सम्मुख काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर खड़ा होता मस्जिद ध्वस्त हो चुकी होती किंतु ब्राह्मण ने अपनी जान के बदले अपने धर्म की बलि चढ़ा दी जिसे आज भी हिंदू समाज बुरी तरह भुगत रहा है किंतु मराठों को यह बात हमेशा परेशान करती रही और भी निरंतर इसी प्रयत्न में लगे रहे कि किस तरह काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का जीर्णोद्धार हो कालांतर में उनका यह सपना मल्हार राव होलकर की पुत्रवधू अहिल्याबाई होलकर के हाथों संपादित हुआ मल्हार राव होलकर के सपनों को उनकी बहू अहिल्याबाई होल्कर ने पूरा किया उन्होंने कहा था कि
ईश्वर ने मुझ पर जो उत्तरदायित्व रखा है,
उसे मुझे निभाना है.
मेरा काम प्रजा को सुखी रखना है.
मैं अपने प्रत्येक काम के लिये जिम्मेदार हूँ.
सामर्थ्य और सत्ता के बल पर मैं यहाँ- जो कुछ भी कर रही हूँ.
उसका ईश्वर के यहाँ मुझे जवाब देना होगा.
मेरा यहाँ कुछ भी नहीं हैं, जिसका है उसी के पास भेजती हूँ.
जो कुछ लेती हूँ, वह मेरे उपर कर्जा है,
न जाने कैसे चुका पाऊँगी. कहा जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने स्वप्न में अहिल्याबाई होल्कर के समक्ष उपस्थित होकर काशी विश्वनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की बात कही थी जिसका पालन उन्होंने सअक्षर किया था विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण सन 1777 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। सन 1853 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के दोनों शिखरों को 22 टन सोने से स्वर्णमंडित करवाया था।
उल्लेखनीय है विश्वनाथ मंदिर 30 वर्ग फीट में बनी है। इसके शिखर की ऊंचाई 51 फीट है। इसके पांच पंडप भी महारानी अहिल्याबाई ने ही बनवाए थे।
यहां पर पांच अति पवित्र घाटों में से एक मणिकर्णिका घाट और इसके चार और घाटों से विख्यात है इसके ऊपर मणिकर्णिका कुंड है इसी से इस घाट का नाम पड़ा है 70 वें शतक के अंत में बाई ने से बनवाया था राजघाट और असी संगम के मध्य विश्वनाथ जी का सुनहरा मंदिर है जो कि संपूर्ण शिवलिंग ओ में प्रधान है या मंदिर 51 फोटो और पत्थर का बना हुआ सुंदर शिखर दार है मंदिर के चारों और पीतल के केवल लगे हुए हैं मंदिर के पश्चिम में गुंबजदार जगमोहन और इसके पश्चिम से मिला हुआ दंड पानी स्वर का पूर्व होता शिखर दार मंदिर है इसका निर्माण भी बाई ने ही करवाया था
-अहिल्याबाई होलकर गोविंद राम केशव राम जोशी पृष्ठ संख्या 109
अहिल्याबाई होल्कर की त्याग तपस्या और धर्म परायणता प्रसिद्ध कवि पंडित अंबिका प्रसाद मिश्र ने 1928 वीणा पत्रिका के अहिल्यांक अंक में छपी अष्टक में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा था कि
शिष्टन की पालिकाऔ दुष्टन की घालिका, अनुपम शासिका तू, एक दिव्य स्फूर्ति थी तू।' शेष अगले अंक में•••••••••••
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पाण्डेय राष्ट्रीय प्रवक्ता हिन्दू महासभा
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काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के उद्धारक रहे मराठा साम्राज्य और होलकर राजवंश
मनीष पाण्डेय
निश्चित रूप से जब हिंदुत्व की बात आती है तो उसमें सर्वोपरि रूप से महाराष्ट्र का नाम अवश्य आता है दूसरे अर्थों में अगर आप कहें कि हिंदुत्व की उत्पत्ति ही महाराष्ट्र से हुई है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी महाराष्ट्र मराठा साम्राज्य की उत्पत्ति हुई महाराष्ट्र की पवित्र पावन भूमि ने एक से एक वीर शिरोमणि को पैदा किया है जो ना सिर्फ हिंदुत्व की आन बान और शान के प्रतीक रहे बल्कि उन्होंने हिंदू धर्म ध्वजा को संपूर्ण विश्व में फहराने का कार्य भी किया है, मराठा साम्राज्य की नींव वीर शिरोमणि छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा 1645 ईसवी में रखी गई थी, जोकि 1818 ईसवी तक चली, संभाजी बाजीराव पेशवा बालाजी बाजीराव , मल्हार राव होलकर ,नारायण राव, जैसे हिंदू वीरों से होता हुआ यह कारवां यहीं नहीं रुका बल्कि हिंदुत्व की धर्म ध्वजा उठाने का कार्य कालांतर में वीर विनायक दामोदर सावरकर पंडित नाथूराम गोडसे बाला साहेब ठाकरे पर आकर समाप्त हुआ होलकर साम्राज्य जिसका राजवंश मराठा साम्राज्य ही था ने भी मल्हार राव होलकर से प्रारंभ होकर अहिल्याबाई होलकर तक एक सशक्त और सुव्यवस्थित शासन, राजनीतिक सूझबूझ, सहिष्णु धार्मिकता, प्रजा के हितचिंतन, दान पुण्य तथा तीर्थस्थानों में भवननिर्माण के लिए ने विख्यात हुआ, ऐसे समय में जब मैं काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस को लिख रहा हूं तो ऐसे में यह सातवां भाग बेहद महत्वपूर्ण है एक ऊर्जा मुगल आक्रांता हूं द्वारा काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का विध्वंस किया जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर मराठा और होलकर साम्राज्य अपनी धर्म परायणता और कट्टर हिंदूवादी सोच के कारण न सिर्फ उनका पुनः निर्माण करवा रहा था बल्कि हिंदू समाज के माथे पर कलंक के रूप में खड़ी मस्जिद को ध्वस्त करने योजना भी बना रहा था ठीक उसी तरह जिस तरह 1992 में श्री अयोध्या धाम स्थित राम जन्मभूमि के स्थान पर खड़ी बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने की योजना 1949 में ही हिंदू महासभा द्वारा बना ली गई थी, मराठा शासन इस बात के लिए हमेशा से प्रयत्नशील रहा की उसे प्रयाग गया बनारस अयोध्या आदि स्थान उसके कब्जे में आ जाए भले ही उसका कारण राजनैतिक रहा हो पर राजनीतिक से ज्यादा मराठों को अपनी धार्मिक प्रवृत्ति, मुगलों के विरुद्ध ना झुकने की प्रवृत्ति को पूरा करने के उद्देश्य से इन स्थानों पर अपना कब्जा चाहते थे मुगल आक्रांताओं द्वारा जिन मंदिरों का विध्वंस कर दिया गया था, उन मंदिरों को पुनः निर्माण कराना मराठा अपनी आन बान और शान समझते थे ,मराठे निरंतर यह प्रयत्न अपने वकीलों के माध्यम से कर रहे थे कि मुसलमान कुछ मुआवजा लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर पर से अपना दावा छोड़ दें, बालाजी बाजीराव 1740 ईस्वी लेकर 17 61 ईसवी भी अपनी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनारस पर कब्जा करना चाहते थे, किंतु उनकी यह योजना सफल नहीं हो सकी 1742 ईस्वी में अपनी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने मिर्जापुर में रुक कर बनारस कूच किया, जब अवध के नवाब सफदरजंग को यह बात पता पड़ी तो उन्होंने बनारस के ब्राह्मणों, पंडितों को जान से मारने की धमकी देते हुए बालाजी बाजीराव को बनारस आने से रोकने के लिए कहा इतिहास गवाह है कि अगर ब्राह्मण उस समय बालाजी बाजीराव की बात मान लेते अथवा उनका साथ देते तो निश्चित रूप से काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का उद्धार बालाजी बाजीराव के हाथों हो गया होता किंतु ब्राह्मणों के अपनी मृत्यु के भय ने पूरे मामले को तहस-नहस करके रख दिया उस समय सलाहकार नारायण दीक्षित के नेतृत्व में पंडितों और ब्राह्मणों का एक दल पेशवा बालाजी बाजीराव से मिला अपनी जान की मृत्यु का भय बताकर उन्हें बनारस की ओर कूच करने के लिए मना किया उसी प्रकार मल्हार राव होलकर द्वारा भी काशी विश्वनाथ स्थित मस्जिद को विध्वंस कर उस स्थान पर मंदिर बनाने का स्वप्न देखा गया था, 27 जून 1742 को लिखा गया एक पत्र प्राप्त हुआ है जिसमें लिखा हुआ है कि मल्हारराव विचार ज्ञानवापी मस्जिद को गिरा कर पुनः विशेष और मंदिर बनाने का हुआ परंतु पंच ब्राह्मण ब्राह्मण इसलिए चिंतित हुए कि यह मस्जिद अगर बादशाह की हुक्म के बगैर गिराई गई तो बादशाह क्रुद्ध होकर ब्राह्मणों को मार डालेगा इस प्रांत में यमन प्रबल है सब के चित्र में यह बात नहीं जचती है दूसरी जगह मंदिर बनाना अच्छा है पत्र में आगे लिखा गया है कि ब्राह्मण सोचते हैं कि उनकी दुर्दशा होगी मना करने वाला कोई नहीं है वह मना करने से देवस्थान को रोकने का दोष होगा जो विशेश्वर को नहीं जाएगा जो विश्व से चाहेंगे वही होगा चिंता करने से क्या होगा अगर मस्जिद गिरने लगेगी तो सब ब्राह्मण मिलकर विनती पत्र भेजेंगे ऐसा विचार है उक्त पत्र कायगांव कर दीक्षित के ऑफिस से प्राप्त हुआ है पत्र पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि ब्राह्मणों को अगर अपना धर्म प्यारा होता तो आज हमारे सम्मुख काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर खड़ा होता मस्जिद ध्वस्त हो चुकी होती किंतु ब्राह्मण ने अपनी जान के बदले अपने धर्म की बलि चढ़ा दी जिसे आज भी हिंदू समाज बुरी तरह भुगत रहा है किंतु मराठों को यह बात हमेशा परेशान करती रही और भी निरंतर इसी प्रयत्न में लगे रहे कि किस तरह काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का जीर्णोद्धार हो कालांतर में उनका यह सपना मल्हार राव होलकर की पुत्रवधू अहिल्याबाई होलकर के हाथों संपादित हुआ मल्हार राव होलकर के सपनों को उनकी बहू अहिल्याबाई होल्कर ने पूरा किया उन्होंने कहा था कि
ईश्वर ने मुझ पर जो उत्तरदायित्व रखा है,
उसे मुझे निभाना है.
मेरा काम प्रजा को सुखी रखना है.
मैं अपने प्रत्येक काम के लिये जिम्मेदार हूँ.
सामर्थ्य और सत्ता के बल पर मैं यहाँ- जो कुछ भी कर रही हूँ.
उसका ईश्वर के यहाँ मुझे जवाब देना होगा.
मेरा यहाँ कुछ भी नहीं हैं, जिसका है उसी के पास भेजती हूँ.
जो कुछ लेती हूँ, वह मेरे उपर कर्जा है,
न जाने कैसे चुका पाऊँगी. कहा जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने स्वप्न में अहिल्याबाई होल्कर के समक्ष उपस्थित होकर काशी विश्वनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की बात कही थी जिसका पालन उन्होंने सअक्षर किया था विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण सन 1777 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। सन 1853 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के दोनों शिखरों को 22 टन सोने से स्वर्णमंडित करवाया था।
उल्लेखनीय है विश्वनाथ मंदिर 30 वर्ग फीट में बनी है। इसके शिखर की ऊंचाई 51 फीट है। इसके पांच पंडप भी महारानी अहिल्याबाई ने ही बनवाए थे।
यहां पर पांच अति पवित्र घाटों में से एक मणिकर्णिका घाट और इसके चार और घाटों से विख्यात है इसके ऊपर मणिकर्णिका कुंड है इसी से इस घाट का नाम पड़ा है 70 वें शतक के अंत में बाई ने से बनवाया था राजघाट और असी संगम के मध्य विश्वनाथ जी का सुनहरा मंदिर है जो कि संपूर्ण शिवलिंग ओ में प्रधान है या मंदिर 51 फोटो और पत्थर का बना हुआ सुंदर शिखर दार है मंदिर के चारों और पीतल के केवल लगे हुए हैं मंदिर के पश्चिम में गुंबजदार जगमोहन और इसके पश्चिम से मिला हुआ दंड पानी स्वर का पूर्व होता शिखर दार मंदिर है इसका निर्माण भी बाई ने ही करवाया था
-अहिल्याबाई होलकर गोविंद राम केशव राम जोशी पृष्ठ संख्या 109
अहिल्याबाई होल्कर की त्याग तपस्या और धर्म परायणता प्रसिद्ध कवि पंडित अंबिका प्रसाद मिश्र ने 1928 वीणा पत्रिका के अहिल्यांक अंक में छपी अष्टक में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा था कि
शिष्टन की पालिकाऔ दुष्टन की घालिका, अनुपम शासिका तू, एक दिव्य स्फूर्ति थी तू।' शेष अगले अंक में•••••••••••
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