काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 13
काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 13
न्यायालय की प्रक्रिया और पुरातात्विक जांच से भागते मुस्लिम
मनीष पाण्डेय
इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 1942 में मुसलमानों का मुकदमा खारिज होने के बाद यह मामला ठंडा पड़ा रहा, कालांतर में अक्टूबर 1991 एक बार फिर से यह मुद्दा धीरे-धीरे गरमाने लगा, शिवभक्त जनता एक बार फिर से एकजुट होने लगी तब वाराणसी की शिवभक्त जनता ने ज्ञानवापी विशेषण मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए वर्ष 1991 श्री विश्वेश्वर विश्वनाथ मुक्ति संघर्ष समिति ज्ञानवापी वाराणसी का गठन किया जिसके अध्यक्ष बनारस के ही ख्याति प्राप्त अधिवक्ता श्री दान बहादुर सिंह एडवोकेट तथा वहां मंत्री श्री विजय शंकर रस्तोगी एडवोकेट को चुना गया उक्त समिति के तत्वाधान में ज्ञानवापी विशेषण मंदिर के तत्वों को दूर करने वार्ड संख्या 610 सन 1991 ईस्वी प्राचीन मूर्ति स्वयं को विशेष वर्ग व अन्य प्रति अंजुमन इंतजामियां मस्जिद दिनांक 15•10•1991में को न्यायालय सिविल जज वाराणसी में दाखिल किया गया, उसके बाद हिंदू जनता की ओर से आदेश 1 नियम जाब्ता दीवानी के अंतर्गत प्रतिनिधित्व वाद (रिप्रेजेंटेटिव सूट )दाखिल किया गया, इससे पहले कि मैं इसका विस्तृत वर्णन आप सबके समक्ष प्रस्तुत करूं प्रतिनिधि वाद क्या होता है इसके संबंध में संक्षेप में जानकारी देना आवश्यक समझता हूं, साथ ही साथ इस वाद में सीपीसी के अंतर्गत रिवीजन सीपीसी सेक्शन 115, प्लेसमेंट ऑफ वरशिप एक्ट 1991, आदेश 8 नियम 10 सीपीसी, आदेश 7 नियम 11 सीपीसी आदि संक्षिप्त वर्णन भी करता चल रहा हूं जिसे पाठकगणो को उक्त केस समझने में आसानी हो
सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के नियम I 8 में प्रतिनिधि मुकदमे की व्यवस्था है। एक प्रतिनिधि सूट एक ऐसा सूट है जिसे सूट में एक या एक से अधिक व्यक्तियों की ओर से दायर किया जाता है और दूसरों को भी इसमें रुचि होती है। सामान्य नियम यह है कि एक सूट में रुचि रखने वाले सभी व्यक्तियों को इसमें पार्टियों के रूप में शामिल होना चाहिए। नियम 8 इस सामान्य नियम का अपवाद है। अधिनियमित नियम कारण और अच्छी नीति के आधार पर सुविधा के लिए है क्योंकि यह व्यय और परेशानी से बचाता है जो अन्यथा ऐसे मामलों में खर्च करना होगा।
परिभाषा: एक प्रतिनिधि सूट एक सूट है जिसमें एक या एक से अधिक व्यक्तियों की ओर से और दूसरों के खिलाफ मुकदमा में समान रुचि वाले व्यक्ति द्वारा दायर किया जाता है। उक्त समिति के उक्त बाद में अंजुमन इंतजाम या मस्जिद के द्वारा फारसी लिपि में प्रार्थना पत्र प्रतिवाद दाखिल करने हेतु समय प्राप्त करने के लिए दाखिल किया गया उक्त बाद में स्वयं भगवान विशेश्वर का प्रतिनिधित्व उसके पुजारी कुल के कुलश्रेष्ठ श्री पंडित सोमनाथ व्यास ने किया है एवं उनके अतिरिक्त उक्त बाद में अन्य वादी श्री पंडित राम रंग शर्मा व अन्य हरिहर पांडे है जो वाराणसी शहर के निवासी शिव भक्त गण है, फरवरी 1942 में वादी गण द्वारा प्रतिवादी अंजुमन इंतजा मियां मस्जिद के फारसी लिपि के उक्त प्रार्थना पत्र का विरोध किया गया कि उक्त प्रार्थना पत्र देश की राष्ट्रभाषा हिंदी देवनागरी लिपि में होना चाहिए जो न्यायालय की भी भाषा है एवं तत्कालीन सिविल जज श्री एस के श्रीवास्तव के द्वारा आदेश दिनांक 14 292 ईसवी पारित किया गया जिसके द्वारा प्रतिवादी को निर्देशित किया गया कि फारसी लिपि के उक्त प्रार्थना पत्र की हिंदी देवनागरी लिपि में 2 प्रतियां तैयार की जाए एक प्रति न्यायालय की पत्रावली में रखा जाए तथा एक प्रतिवादी गण के अधिवक्ता को दी जाए मई 1992 में उक्त आदेश दिनांक 14 292 के विरुद्ध प्रतिवादी अंजुमन जामिया मस्जिद की तरफ से सिविल निगरानी संख्या 58 सन 1992 ईस्वी जामिया मस्जिद बनाम एन्सिएन्ट आइडल आफ स्वयंभू लॉर्ड विशेश्वर व अन्य न्यायालय जिला जज वाराणसी में अंतर्गत धारा 115 जाता दीवानी दाखिल किया गया जो स्थानांतरित होकर न्यायालय में अतिरिक्त जनपद न्यायाधीश वाराणसी में विचाराधीन हुआ उक्त निर्माण की सुनवाई उक्त न्यायालय के तत्कालीन पीठासीन अधिकारी श्री कामता प्रसाद मिश्र के समक्ष हुई जिन्होंने दोनों पक्षों की विस्तृत वह सुनने के पश्चात बना विस्तृत निर्णय दिनांक 12 मई सन 1992 को दिया जिसके अंतर्गत यह निर्णय किया गया कि आवर न्यायालय का आदेश दिनांक 14 दो 92 ईसवी उचित था एवं प्रतिवादी की निगरानी व्यय सहित निरस्त कर दी गई,
REVISION -Section 115 CPC
पुनरीक्षण (निगरानी) - धारा 115 सीपीसी
धारा 115 सिविल प्रक्रिया संहिता - पुनरीक्षण -
(1) उच्च न्यायालय किसी भी ऐसे मामले के अभिलेखो मंगवा सकेगा जिसका ऐसे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय ने विनिश्चय किया है और जिसकी कोई अपील भी नहीं होती है और यदि यह प्रतीत होता है कि -
(क) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो उसने विधि द्वारा निहित नहीं है, अथवा
ख) ऐसा अधीनस्थ न्यायालय ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है जो इस प्रकार निहित है, अथवा
ग) ऐसे न्यायालय ने अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने में अवैध रूप से या तात्विक अनियमितता से कार्य किया है,
तो उच्च न्यायालय उस मामले में ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे:
परंतु उच्च न्यायालय, किसी वाद या अन्य कार्रवाई के अनुक्रम में इस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश में या कोई विवाद्यक विनिश्चित करने वाले किसी आदेश में तभी फेरफार करेगा या उसे उल्टेगा जब ऐसा आदेश यदि वह पुनरीक्षण के लिए आवेदन करने वाले पक्षकार के पक्ष में किया गया होता तो वाद या अन्य कार्यवाही का अंतिम रूप से निपटारा कर देता।
2) उच्च न्यायालय इस धारा के अधीन किसी ऐसे डिक्री या आदेश में, जिसके विरुद्ध या तो उच्च न्यायालय में या उसके अधीनस्थ किसी न्यायालय में अपील होती है, फेरफार नहीं करेगा अथवा उसे नहीं उलटेगा।
(3) पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष वाद या अन्य कार्यवाही के स्थगन स्थगन के रूप में प्रवर्त होगा, जब ऐसे वाद या अन्य कार्यवाही को उच्च न्यायालय द्वारा स्थगित कर दिया जाता है।
स्पष्टीकरण- इस धारा में " ऐसे मामले के अभिलेखों मंगवा सकेगा जिसका ऐसे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय ने विनिश्चय किया है" अभिव्यक्ति के अंतर्गत किसी वाद या अन्य कार्यवाही के अनुक्रम में किया गया कोई आदेश या कोई विवाद्यक विनिश्चित करने वाला कोई आदेश भी है।
सिविल प्रक्रिया संहिता में यह एक महत्वपूर्ण उपबंध है। स्वच्छ न्याय प्रशासन की अवधारणा न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति में निहित है, चाहे ऐसा अन्याय किसी भी न्यायालय द्वारा क्यों ना प्रदान किया गया हो। यह बात महत्वपूर्ण नहीं है कि निर्णय निम्न न्यायालय द्वारा प्रदान किया गया है अथवा अपर न्यायालय द्वारा। निम्न न्यायालय द्वारा प्रदत निर्णय यदि न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त कर लेता है तो उसका उतना ही महत्व होगा जितना की अपर न्यायालय के निर्णय का होता, और ऐसी अवस्था में निम्न न्यायालय के निर्णय मैं अपर न्यायालय कभी भी हस्तक्षेप नहीं करेगा। लेकिन जहां निम्न न्यायालय का निर्णय न्याय के सारभूत उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहता है, वहां पर अप्पर न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
इस प्रकार पुनरीक्षण का मुख्य उद्देश्य अधीनस्थ न्यायालय के क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटियां, अनियमिताएं एवं और अवैधानिकता को दूर कर न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करना है।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 115 के अनुसार पुनरीक्षण निम्न अवस्था में किया जा सकेगा -
( 1) जहां कोई मामला उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय द्वारा विनिश्चित किया जाता है और जिसकी अपीलीय न्यायालय में अपील नहीं होती है और यदि यह प्रतीत होता है कि-
क) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने ऐसे क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया है जो उसमें विधि द्वारा निहित नहीं है, या
ख) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने ऐसे क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने में असफल रहा है जो उसने विधि द्वारा निहित है, या
ग) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने अपने क्षेत्र अधिकार का प्रयोग करने में अवैध रूप से सारवान अनियमितता से कार्य किया है,
तो ऐसा उच्च न्यायालय ऐसे किसी मामले के अभिलेखों मंगवा सकेगा और उच्च न्यायालय उस मामले में ऐसा आदेश दे सकेगा जैसा कि वह ठीक समझता है।
लेकिन उच्च न्यायालय किसी मामले में विनिश्चित किसी वाद पद अथवा आदेश को तब तक ना तो उल्टेगा ना उसमें परिवर्तन करेगा जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि यदि ऐसा बाद पद या आदेश पुनरीक्षण करने वाले पक्षकार के पक्ष में पारित किया गया होता तो मामले का अंतिम रूप से निपटारा हो जाता।
अगस्त 1992 में उक्त निर्णय दिनांक 14 292 के विरुद्ध प्रतिवादी अंजुमन इंतजा मियां मस्जिद के द्वारा माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट पिटिशन जिसकी संख्या 30559 1992 अंजुमन इस्लामिया मस्जिद वाराणसी बनाम प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विशेश्वर वगैरा दिनांक 17 अक्टूबर को दाखिल की गई जिसमें रेस्पोंडेंट के तरफ से सीनियर अधिवक्ता श्री रविंद्र नारायण सिंह एडवोकेट हाई कोर्ट इलाहाबाद कार्य कर रहे थे उक्त अधिवेशन में विपक्षी गण के तरफ से लिखित आपत्ति पत्र प्रस्तुत किया गया जिस पर माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा कोई अंतरिम स्थगन आदेश पारित नहीं किया गया मूल वाद संख्या 610 91 में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ की तरफ से पक्षकार बनने हेतु प्रार्थना पत्र इस आधार पर प्रस्तुत किया गया कि कथित मस्जिद यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ के कार्यालय में वर्क फोन नंबर शो वाराणसी दर्ज है इसलिए वर्तमान वाद में बतौर प्रतिवादी बनाया जाना उचित है जिसका प्रतिवाद गण की तरफ से किया गया है कि उक्त विवादित संपत्ति स्वयं भगवान विश्वेश्वर का मंदिर है जिसे वह फोन नहीं किया जा सकता और ना ही किसी को वर्क करने का अधिकार है यूपी लखनऊ के संबंध में एतराज बिल्कुल गलत वाह बिना अधिकार की के किया गया है, फिर भी यदि वाद में प्रतिवादी बनना चाहता है, वादी गण को कोई एतराज नहीं है इस प्रकार न्यायालय प्रथम अतिरिक्त सिविल जज वाराणसी के आदेश के द्वारा पक्षकार बनाया गया
जनवरी 1995 में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ के द्वारा वर्तमान वाद में प्रतिवादी पत्र दिनांक 17 एक 1995 को दाखिल किया गया था जिसमें बोर्ड द्वारा वादी के वाद पत्र के कथनों को इनकार किया गया है एवं उनका मूल कथा यह है कि वादी कर्ण का वध उपासना स्थल विशेष उपबंध अधिनियम 1991 के द्वारा बाधित है परंतु अंजुमन जामिया मस्जिद वाराणसी की तरफ से आज तक कोई भी प्रतिनिधि वाद दाखिल नहीं किया गया है वह समय पर समय लेते चले आ रहे हैं
उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991
(1991 का अधिनियम संख्यांक 42)
[18 सितंबर, 1991]
किसी उपासना स्थल का संपरिवर्तन प्रतिषिद्ध करनेके लिए
और 15 अगस्त, 1947 को यथाविद्यमान किसीउपासना
स्थल के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने
तथा उससे संसक्त या उसके
आनुषंगिक विषयों का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बयालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) इस अधिनियम की धारा 3, धारा 6 और धारा 8 के उपबंध तुरंत प्रवृत्त होंगे और इसके शेष उपबंध 11 जुलाई, 1991 को प्रवृत्त हुए समझे जाएंगे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) इस अधिनियम का प्रारंभ" से 11 जुलाई, 1991 को इस अधिनियम का प्रारंभ अभिप्रेत है ;
(ख) संपरिवर्तन" के अंतर्गत, उसके व्याकरणिक रूपभेदों संहित, किसी भी प्रकार का परिवर्तन या तब्दीली है ;
(ग) उपासना स्थल" से कोई मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर, मठ या किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके अनुभाग का, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, लोक धार्मिक उपासना का कोई अन्य स्थल अभिप्रेत है ।
3. उपासना स्थलों के संपरिवर्तन का वर्जन-कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग के किसी उपासना स्थल का उसी धार्मिक संप्रदाय के भिन्न अनुभाग के या किसी भिन्न धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग के उपासना स्थल में संपरिवर्तन नहीं करेगा ।
4. कतिपय उपासना स्थलों के धार्मिक स्वरूप के बारेमें घोषणा और न्यायालयों, आदि की अधिकारिता कावर्जन-(1) यह घोषित किया जाता है कि 15 अगस्त, 1947 को विद्यमान उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहेगा जैसा वह उस दिन विद्यमान था ।
(2) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ पर, 15 अगस्त, 1947 को विद्यमान किसी उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप के संपरिवर्तन के बारे में कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लम्बित है तो वह उपशमित हो जाएगी और ऐसे किसी मामले की बाबत कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही ऐसे प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष नहीं होगी :
परंतु यदि इस आधार पर कि ऐसे किसी स्थल के धार्मिक स्वरूप में 15 अगस्त, 1947 के पश्चात् संपरिवर्तन हुआ है, संस्थित या फाइल किया गया कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही इस अधिनियम के प्रारंभ पर लम्बित है, तो ऐसा वाद, अपील या अन्य कार्यवाही इस प्रकार उपशमित नहीं होगी और ऐसे प्रत्येक वाद, अपील या अन्य कार्यवाही का निपटारा उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) की कोई बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी,-
(क) उक्त उपधाराओं में निर्दिष्ट कोई उपासना स्थल, जो प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (1958 का 24) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अन्तर्गत आने वाला कोई प्राचीन और ऐतिहासिक संस्मारक या कोई पुरातत्वीय स्थल या अवशेष है ;
(ख) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी मामले की बाबत कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, जिसका इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा अंतिम रूप से विनिश्चय, परिनिर्धारण या निपटारा कर दिया गया है ;
(ग) ऐसे किसी मामले के बारे में कोई विवाद जो ऐसे प्रारंभ के पूर्व पक्षकारों द्वारा आपस में तय हो गया है ;
(घ) ऐसे किसी स्थल का कोई संपरिवर्तन जो ऐसे प्रारंभ के पूर्व उपमति द्वारा किया गया है ;
(ङ) ऐसे प्रारंभ के पूर्व ऐसे किसी स्थल का किया गया कोई संपरिवर्तन, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन परिसीमा द्वारा वर्जित होने के कारण किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष आक्षेपणीय नहीं है ।
5. अधिनियम का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद कोलागू न होना-इस अधिनियम की कोई बात उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या में स्थित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के रूप में सामान्यतया ज्ञात स्थान या उपासना स्थल को और उक्त स्थान या उपासना स्थल से संबंधित किसी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही को लागू नहीं होगी ।
6. धारा 3 के उल्लंघन के लिए दंड-(1) जो कोई धारा 3 के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक ही हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के अधीन दंडनीय कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा अपराध कराएगा और ऐसे प्रयत्न में अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करेगा, वह उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा ।
(3) जो कोई उपधारा (1) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा या उसे करने में आपराधिक षड्यंत्र का पक्षकार होगा, चाहे ऐसा अपराध ऐसी दुष्प्रेरणा के परिणामस्वरूप या ऐसे आपराधिक षड्यंत्र के अनुसरण में किया गया हो या न किया गया हो, वह भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 116 में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा ।
7. अधिनियम का अन्य अधिनियमितियों परअध्यारोही होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
मार्च 1995 में एक बार फिर अंजुमन इंतजाम या मस्जिद की तरफ से एक प्रार्थना पत्र दिनांक 233 1995 इससे से दाखिल किया गया कि वाद उपासना स्थल विशेष उपबंध अधिनियम 1991 के प्रावधानों से बाधित नहीं है इसलिए वाद अंतर्गत आदेश 7 नियम 11 निरस्त किया जाए जिसके विरुद्ध वादी गढ़ में आपत्ति दाखिल कर दिया है न्यायालय को वादपत्र को एक सार्थक रूप से पढ़ना चाहिए और यदि वह स्पष्ट रूप से विवादास्पद या गुणहीन है (मुकदमा दायर करने के स्पष्ट अधिकार का खुलासा नहीं करने के अर्थ में) तो अदालत सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 11 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकती है और वाद-पत्र (Plaint) को खारिज कर सकती है।
और यहां आपत्ति दर्ज की गई है कि वादी करण का बाद उक्त उपासना स्थल अधिनियम में शुक्राणु से बाधित नहीं है वरना बाद इस स्तर पर मात्र प्रार्थना पत्र के द्वारा निरस्त किया जा सकता है जिसका निस्तारण होना है इसके अतिरिक्त वादी गण की तरफ से प्रार्थना पत्र नगद अंतर्गत आदेश 8 नियम जाब्ता दीवानी इससे का दाखिल किया गया कि ज्योति प्रतिवादी संख्या एक अंजुमन जामिया मस्जिद वाराणसी न्यायालय के द्वारा समय नियत किए जाने के बावजूद भी प्रतिवाद पत्र दाखिल नहीं किया है इसलिए बाद की कार्यवाही उनके विरुद्ध एक पक्षी चलाया जाए जिसका निस्तारण होना बाकी है
ऑर्डर VIII नियम 10 में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है जो कि 90 दिनों की समाप्ति के बाद, अदालत द्वारा प्रतिवादी को आगे समय देने से रोके। ... हालाँकि जैसा तमाम मामलों में कहा गया है, लिखित कथन दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने के आदेश को नियमित तौर पर पारित नहीं किया जा सकता है। केवल असाधारण मामलों में ही यह समय बढ़ाया जा सकता है।
वादी गण की तरफ से वाद की पैरवी दान बहादुर सिंह एडवोकेट, श्री विजय शंकर रस्तोगी, व श्री अमरनाथ शर्मा, एडवोकेट अधिवक्ता कर रहे थे,
न्यायालय की प्रक्रिया और पुरातात्विक जांच से भागते मुस्लिम
मनीष पाण्डेय
इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 1942 में मुसलमानों का मुकदमा खारिज होने के बाद यह मामला ठंडा पड़ा रहा, कालांतर में अक्टूबर 1991 एक बार फिर से यह मुद्दा धीरे-धीरे गरमाने लगा, शिवभक्त जनता एक बार फिर से एकजुट होने लगी तब वाराणसी की शिवभक्त जनता ने ज्ञानवापी विशेषण मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए वर्ष 1991 श्री विश्वेश्वर विश्वनाथ मुक्ति संघर्ष समिति ज्ञानवापी वाराणसी का गठन किया जिसके अध्यक्ष बनारस के ही ख्याति प्राप्त अधिवक्ता श्री दान बहादुर सिंह एडवोकेट तथा वहां मंत्री श्री विजय शंकर रस्तोगी एडवोकेट को चुना गया उक्त समिति के तत्वाधान में ज्ञानवापी विशेषण मंदिर के तत्वों को दूर करने वार्ड संख्या 610 सन 1991 ईस्वी प्राचीन मूर्ति स्वयं को विशेष वर्ग व अन्य प्रति अंजुमन इंतजामियां मस्जिद दिनांक 15•10•1991में को न्यायालय सिविल जज वाराणसी में दाखिल किया गया, उसके बाद हिंदू जनता की ओर से आदेश 1 नियम जाब्ता दीवानी के अंतर्गत प्रतिनिधित्व वाद (रिप्रेजेंटेटिव सूट )दाखिल किया गया, इससे पहले कि मैं इसका विस्तृत वर्णन आप सबके समक्ष प्रस्तुत करूं प्रतिनिधि वाद क्या होता है इसके संबंध में संक्षेप में जानकारी देना आवश्यक समझता हूं, साथ ही साथ इस वाद में सीपीसी के अंतर्गत रिवीजन सीपीसी सेक्शन 115, प्लेसमेंट ऑफ वरशिप एक्ट 1991, आदेश 8 नियम 10 सीपीसी, आदेश 7 नियम 11 सीपीसी आदि संक्षिप्त वर्णन भी करता चल रहा हूं जिसे पाठकगणो को उक्त केस समझने में आसानी हो
सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के नियम I 8 में प्रतिनिधि मुकदमे की व्यवस्था है। एक प्रतिनिधि सूट एक ऐसा सूट है जिसे सूट में एक या एक से अधिक व्यक्तियों की ओर से दायर किया जाता है और दूसरों को भी इसमें रुचि होती है। सामान्य नियम यह है कि एक सूट में रुचि रखने वाले सभी व्यक्तियों को इसमें पार्टियों के रूप में शामिल होना चाहिए। नियम 8 इस सामान्य नियम का अपवाद है। अधिनियमित नियम कारण और अच्छी नीति के आधार पर सुविधा के लिए है क्योंकि यह व्यय और परेशानी से बचाता है जो अन्यथा ऐसे मामलों में खर्च करना होगा।
परिभाषा: एक प्रतिनिधि सूट एक सूट है जिसमें एक या एक से अधिक व्यक्तियों की ओर से और दूसरों के खिलाफ मुकदमा में समान रुचि वाले व्यक्ति द्वारा दायर किया जाता है। उक्त समिति के उक्त बाद में अंजुमन इंतजाम या मस्जिद के द्वारा फारसी लिपि में प्रार्थना पत्र प्रतिवाद दाखिल करने हेतु समय प्राप्त करने के लिए दाखिल किया गया उक्त बाद में स्वयं भगवान विशेश्वर का प्रतिनिधित्व उसके पुजारी कुल के कुलश्रेष्ठ श्री पंडित सोमनाथ व्यास ने किया है एवं उनके अतिरिक्त उक्त बाद में अन्य वादी श्री पंडित राम रंग शर्मा व अन्य हरिहर पांडे है जो वाराणसी शहर के निवासी शिव भक्त गण है, फरवरी 1942 में वादी गण द्वारा प्रतिवादी अंजुमन इंतजा मियां मस्जिद के फारसी लिपि के उक्त प्रार्थना पत्र का विरोध किया गया कि उक्त प्रार्थना पत्र देश की राष्ट्रभाषा हिंदी देवनागरी लिपि में होना चाहिए जो न्यायालय की भी भाषा है एवं तत्कालीन सिविल जज श्री एस के श्रीवास्तव के द्वारा आदेश दिनांक 14 292 ईसवी पारित किया गया जिसके द्वारा प्रतिवादी को निर्देशित किया गया कि फारसी लिपि के उक्त प्रार्थना पत्र की हिंदी देवनागरी लिपि में 2 प्रतियां तैयार की जाए एक प्रति न्यायालय की पत्रावली में रखा जाए तथा एक प्रतिवादी गण के अधिवक्ता को दी जाए मई 1992 में उक्त आदेश दिनांक 14 292 के विरुद्ध प्रतिवादी अंजुमन जामिया मस्जिद की तरफ से सिविल निगरानी संख्या 58 सन 1992 ईस्वी जामिया मस्जिद बनाम एन्सिएन्ट आइडल आफ स्वयंभू लॉर्ड विशेश्वर व अन्य न्यायालय जिला जज वाराणसी में अंतर्गत धारा 115 जाता दीवानी दाखिल किया गया जो स्थानांतरित होकर न्यायालय में अतिरिक्त जनपद न्यायाधीश वाराणसी में विचाराधीन हुआ उक्त निर्माण की सुनवाई उक्त न्यायालय के तत्कालीन पीठासीन अधिकारी श्री कामता प्रसाद मिश्र के समक्ष हुई जिन्होंने दोनों पक्षों की विस्तृत वह सुनने के पश्चात बना विस्तृत निर्णय दिनांक 12 मई सन 1992 को दिया जिसके अंतर्गत यह निर्णय किया गया कि आवर न्यायालय का आदेश दिनांक 14 दो 92 ईसवी उचित था एवं प्रतिवादी की निगरानी व्यय सहित निरस्त कर दी गई,
REVISION -Section 115 CPC
पुनरीक्षण (निगरानी) - धारा 115 सीपीसी
धारा 115 सिविल प्रक्रिया संहिता - पुनरीक्षण -
(1) उच्च न्यायालय किसी भी ऐसे मामले के अभिलेखो मंगवा सकेगा जिसका ऐसे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय ने विनिश्चय किया है और जिसकी कोई अपील भी नहीं होती है और यदि यह प्रतीत होता है कि -
(क) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो उसने विधि द्वारा निहित नहीं है, अथवा
ख) ऐसा अधीनस्थ न्यायालय ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है जो इस प्रकार निहित है, अथवा
ग) ऐसे न्यायालय ने अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने में अवैध रूप से या तात्विक अनियमितता से कार्य किया है,
तो उच्च न्यायालय उस मामले में ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे:
परंतु उच्च न्यायालय, किसी वाद या अन्य कार्रवाई के अनुक्रम में इस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश में या कोई विवाद्यक विनिश्चित करने वाले किसी आदेश में तभी फेरफार करेगा या उसे उल्टेगा जब ऐसा आदेश यदि वह पुनरीक्षण के लिए आवेदन करने वाले पक्षकार के पक्ष में किया गया होता तो वाद या अन्य कार्यवाही का अंतिम रूप से निपटारा कर देता।
2) उच्च न्यायालय इस धारा के अधीन किसी ऐसे डिक्री या आदेश में, जिसके विरुद्ध या तो उच्च न्यायालय में या उसके अधीनस्थ किसी न्यायालय में अपील होती है, फेरफार नहीं करेगा अथवा उसे नहीं उलटेगा।
(3) पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष वाद या अन्य कार्यवाही के स्थगन स्थगन के रूप में प्रवर्त होगा, जब ऐसे वाद या अन्य कार्यवाही को उच्च न्यायालय द्वारा स्थगित कर दिया जाता है।
स्पष्टीकरण- इस धारा में " ऐसे मामले के अभिलेखों मंगवा सकेगा जिसका ऐसे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय ने विनिश्चय किया है" अभिव्यक्ति के अंतर्गत किसी वाद या अन्य कार्यवाही के अनुक्रम में किया गया कोई आदेश या कोई विवाद्यक विनिश्चित करने वाला कोई आदेश भी है।
सिविल प्रक्रिया संहिता में यह एक महत्वपूर्ण उपबंध है। स्वच्छ न्याय प्रशासन की अवधारणा न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति में निहित है, चाहे ऐसा अन्याय किसी भी न्यायालय द्वारा क्यों ना प्रदान किया गया हो। यह बात महत्वपूर्ण नहीं है कि निर्णय निम्न न्यायालय द्वारा प्रदान किया गया है अथवा अपर न्यायालय द्वारा। निम्न न्यायालय द्वारा प्रदत निर्णय यदि न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त कर लेता है तो उसका उतना ही महत्व होगा जितना की अपर न्यायालय के निर्णय का होता, और ऐसी अवस्था में निम्न न्यायालय के निर्णय मैं अपर न्यायालय कभी भी हस्तक्षेप नहीं करेगा। लेकिन जहां निम्न न्यायालय का निर्णय न्याय के सारभूत उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहता है, वहां पर अप्पर न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
इस प्रकार पुनरीक्षण का मुख्य उद्देश्य अधीनस्थ न्यायालय के क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटियां, अनियमिताएं एवं और अवैधानिकता को दूर कर न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करना है।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 115 के अनुसार पुनरीक्षण निम्न अवस्था में किया जा सकेगा -
( 1) जहां कोई मामला उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय द्वारा विनिश्चित किया जाता है और जिसकी अपीलीय न्यायालय में अपील नहीं होती है और यदि यह प्रतीत होता है कि-
क) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने ऐसे क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया है जो उसमें विधि द्वारा निहित नहीं है, या
ख) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने ऐसे क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने में असफल रहा है जो उसने विधि द्वारा निहित है, या
ग) ऐसे अधीनस्थ न्यायालय ने अपने क्षेत्र अधिकार का प्रयोग करने में अवैध रूप से सारवान अनियमितता से कार्य किया है,
तो ऐसा उच्च न्यायालय ऐसे किसी मामले के अभिलेखों मंगवा सकेगा और उच्च न्यायालय उस मामले में ऐसा आदेश दे सकेगा जैसा कि वह ठीक समझता है।
लेकिन उच्च न्यायालय किसी मामले में विनिश्चित किसी वाद पद अथवा आदेश को तब तक ना तो उल्टेगा ना उसमें परिवर्तन करेगा जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि यदि ऐसा बाद पद या आदेश पुनरीक्षण करने वाले पक्षकार के पक्ष में पारित किया गया होता तो मामले का अंतिम रूप से निपटारा हो जाता।
अगस्त 1992 में उक्त निर्णय दिनांक 14 292 के विरुद्ध प्रतिवादी अंजुमन इंतजा मियां मस्जिद के द्वारा माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट पिटिशन जिसकी संख्या 30559 1992 अंजुमन इस्लामिया मस्जिद वाराणसी बनाम प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विशेश्वर वगैरा दिनांक 17 अक्टूबर को दाखिल की गई जिसमें रेस्पोंडेंट के तरफ से सीनियर अधिवक्ता श्री रविंद्र नारायण सिंह एडवोकेट हाई कोर्ट इलाहाबाद कार्य कर रहे थे उक्त अधिवेशन में विपक्षी गण के तरफ से लिखित आपत्ति पत्र प्रस्तुत किया गया जिस पर माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा कोई अंतरिम स्थगन आदेश पारित नहीं किया गया मूल वाद संख्या 610 91 में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ की तरफ से पक्षकार बनने हेतु प्रार्थना पत्र इस आधार पर प्रस्तुत किया गया कि कथित मस्जिद यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ के कार्यालय में वर्क फोन नंबर शो वाराणसी दर्ज है इसलिए वर्तमान वाद में बतौर प्रतिवादी बनाया जाना उचित है जिसका प्रतिवाद गण की तरफ से किया गया है कि उक्त विवादित संपत्ति स्वयं भगवान विश्वेश्वर का मंदिर है जिसे वह फोन नहीं किया जा सकता और ना ही किसी को वर्क करने का अधिकार है यूपी लखनऊ के संबंध में एतराज बिल्कुल गलत वाह बिना अधिकार की के किया गया है, फिर भी यदि वाद में प्रतिवादी बनना चाहता है, वादी गण को कोई एतराज नहीं है इस प्रकार न्यायालय प्रथम अतिरिक्त सिविल जज वाराणसी के आदेश के द्वारा पक्षकार बनाया गया
जनवरी 1995 में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ के द्वारा वर्तमान वाद में प्रतिवादी पत्र दिनांक 17 एक 1995 को दाखिल किया गया था जिसमें बोर्ड द्वारा वादी के वाद पत्र के कथनों को इनकार किया गया है एवं उनका मूल कथा यह है कि वादी कर्ण का वध उपासना स्थल विशेष उपबंध अधिनियम 1991 के द्वारा बाधित है परंतु अंजुमन जामिया मस्जिद वाराणसी की तरफ से आज तक कोई भी प्रतिनिधि वाद दाखिल नहीं किया गया है वह समय पर समय लेते चले आ रहे हैं
उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991
(1991 का अधिनियम संख्यांक 42)
[18 सितंबर, 1991]
किसी उपासना स्थल का संपरिवर्तन प्रतिषिद्ध करनेके लिए
और 15 अगस्त, 1947 को यथाविद्यमान किसीउपासना
स्थल के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने
तथा उससे संसक्त या उसके
आनुषंगिक विषयों का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बयालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) इस अधिनियम की धारा 3, धारा 6 और धारा 8 के उपबंध तुरंत प्रवृत्त होंगे और इसके शेष उपबंध 11 जुलाई, 1991 को प्रवृत्त हुए समझे जाएंगे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) इस अधिनियम का प्रारंभ" से 11 जुलाई, 1991 को इस अधिनियम का प्रारंभ अभिप्रेत है ;
(ख) संपरिवर्तन" के अंतर्गत, उसके व्याकरणिक रूपभेदों संहित, किसी भी प्रकार का परिवर्तन या तब्दीली है ;
(ग) उपासना स्थल" से कोई मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर, मठ या किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके अनुभाग का, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, लोक धार्मिक उपासना का कोई अन्य स्थल अभिप्रेत है ।
3. उपासना स्थलों के संपरिवर्तन का वर्जन-कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग के किसी उपासना स्थल का उसी धार्मिक संप्रदाय के भिन्न अनुभाग के या किसी भिन्न धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग के उपासना स्थल में संपरिवर्तन नहीं करेगा ।
4. कतिपय उपासना स्थलों के धार्मिक स्वरूप के बारेमें घोषणा और न्यायालयों, आदि की अधिकारिता कावर्जन-(1) यह घोषित किया जाता है कि 15 अगस्त, 1947 को विद्यमान उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहेगा जैसा वह उस दिन विद्यमान था ।
(2) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ पर, 15 अगस्त, 1947 को विद्यमान किसी उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप के संपरिवर्तन के बारे में कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लम्बित है तो वह उपशमित हो जाएगी और ऐसे किसी मामले की बाबत कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही ऐसे प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष नहीं होगी :
परंतु यदि इस आधार पर कि ऐसे किसी स्थल के धार्मिक स्वरूप में 15 अगस्त, 1947 के पश्चात् संपरिवर्तन हुआ है, संस्थित या फाइल किया गया कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही इस अधिनियम के प्रारंभ पर लम्बित है, तो ऐसा वाद, अपील या अन्य कार्यवाही इस प्रकार उपशमित नहीं होगी और ऐसे प्रत्येक वाद, अपील या अन्य कार्यवाही का निपटारा उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) की कोई बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी,-
(क) उक्त उपधाराओं में निर्दिष्ट कोई उपासना स्थल, जो प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (1958 का 24) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अन्तर्गत आने वाला कोई प्राचीन और ऐतिहासिक संस्मारक या कोई पुरातत्वीय स्थल या अवशेष है ;
(ख) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी मामले की बाबत कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, जिसका इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा अंतिम रूप से विनिश्चय, परिनिर्धारण या निपटारा कर दिया गया है ;
(ग) ऐसे किसी मामले के बारे में कोई विवाद जो ऐसे प्रारंभ के पूर्व पक्षकारों द्वारा आपस में तय हो गया है ;
(घ) ऐसे किसी स्थल का कोई संपरिवर्तन जो ऐसे प्रारंभ के पूर्व उपमति द्वारा किया गया है ;
(ङ) ऐसे प्रारंभ के पूर्व ऐसे किसी स्थल का किया गया कोई संपरिवर्तन, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन परिसीमा द्वारा वर्जित होने के कारण किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष आक्षेपणीय नहीं है ।
5. अधिनियम का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद कोलागू न होना-इस अधिनियम की कोई बात उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या में स्थित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के रूप में सामान्यतया ज्ञात स्थान या उपासना स्थल को और उक्त स्थान या उपासना स्थल से संबंधित किसी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही को लागू नहीं होगी ।
6. धारा 3 के उल्लंघन के लिए दंड-(1) जो कोई धारा 3 के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक ही हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के अधीन दंडनीय कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा अपराध कराएगा और ऐसे प्रयत्न में अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करेगा, वह उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा ।
(3) जो कोई उपधारा (1) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा या उसे करने में आपराधिक षड्यंत्र का पक्षकार होगा, चाहे ऐसा अपराध ऐसी दुष्प्रेरणा के परिणामस्वरूप या ऐसे आपराधिक षड्यंत्र के अनुसरण में किया गया हो या न किया गया हो, वह भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 116 में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा ।
7. अधिनियम का अन्य अधिनियमितियों परअध्यारोही होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
मार्च 1995 में एक बार फिर अंजुमन इंतजाम या मस्जिद की तरफ से एक प्रार्थना पत्र दिनांक 233 1995 इससे से दाखिल किया गया कि वाद उपासना स्थल विशेष उपबंध अधिनियम 1991 के प्रावधानों से बाधित नहीं है इसलिए वाद अंतर्गत आदेश 7 नियम 11 निरस्त किया जाए जिसके विरुद्ध वादी गढ़ में आपत्ति दाखिल कर दिया है न्यायालय को वादपत्र को एक सार्थक रूप से पढ़ना चाहिए और यदि वह स्पष्ट रूप से विवादास्पद या गुणहीन है (मुकदमा दायर करने के स्पष्ट अधिकार का खुलासा नहीं करने के अर्थ में) तो अदालत सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 11 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकती है और वाद-पत्र (Plaint) को खारिज कर सकती है।
और यहां आपत्ति दर्ज की गई है कि वादी करण का बाद उक्त उपासना स्थल अधिनियम में शुक्राणु से बाधित नहीं है वरना बाद इस स्तर पर मात्र प्रार्थना पत्र के द्वारा निरस्त किया जा सकता है जिसका निस्तारण होना है इसके अतिरिक्त वादी गण की तरफ से प्रार्थना पत्र नगद अंतर्गत आदेश 8 नियम जाब्ता दीवानी इससे का दाखिल किया गया कि ज्योति प्रतिवादी संख्या एक अंजुमन जामिया मस्जिद वाराणसी न्यायालय के द्वारा समय नियत किए जाने के बावजूद भी प्रतिवाद पत्र दाखिल नहीं किया है इसलिए बाद की कार्यवाही उनके विरुद्ध एक पक्षी चलाया जाए जिसका निस्तारण होना बाकी है
ऑर्डर VIII नियम 10 में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है जो कि 90 दिनों की समाप्ति के बाद, अदालत द्वारा प्रतिवादी को आगे समय देने से रोके। ... हालाँकि जैसा तमाम मामलों में कहा गया है, लिखित कथन दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने के आदेश को नियमित तौर पर पारित नहीं किया जा सकता है। केवल असाधारण मामलों में ही यह समय बढ़ाया जा सकता है।
वादी गण की तरफ से वाद की पैरवी दान बहादुर सिंह एडवोकेट, श्री विजय शंकर रस्तोगी, व श्री अमरनाथ शर्मा, एडवोकेट अधिवक्ता कर रहे थे,
Comments
Post a Comment