काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 12
काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 12
जब कोर्ट में मुस्लिम पक्ष का दावा हुआ था बहिष्कृत
मनीष पाण्डेय
चाहे वह राम जन्मभूमि का मामला हो अथवा कृष्ण जन्मभूमि का या फिर काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का या फिर उन सभी मंदिरों का जिन्हें मुस्लिम आक्रांता ओं द्वारा ध्वस्त कर वहां पर मस्जिद का निर्माण करवा दिया गया कालांतर में जब इन जगहों पर हिंदुओं द्वारा दावा ठोका गया, तो वह साक्ष्य सबूत पूरी तरह से खुलकर सामने आ गए, जिन्हें मुस्लिम आक्रांता द्वारा इतिहास के पन्नों के पीछे दबा दिया था, और उसी आधार पर राम जन्मभूमि का ऐतिहासिक निर्णय भी हुआ, आगे जो लड़ाई काशी विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा कृष्ण जन्म भूमि के लिए लड़ी जा रही हैं निश्चित रूप से उसका भी ऐतिहासिक निर्णय न्यायालय द्वारा ही होगा, काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के मामले में पहला मुकदमा
11 अगस्त, 1936 को दीन मुहम्मद, मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद जकारिया ने स्टेट इन काउन्सिल में प्रतिवाद संख्या-62 दाखिल किया और दावा किया कि जो भूमि संख्या 9130 है सम्पूर्ण परिसर वक्फ की सम्पत्ति
है। इसीलिए उस पर मुस्लिमों के अधिकार को मानते हो वहां पर नमाज पढ़ना उनका अधिकार है, 6 अप्रैल 1937 को दीन मोहम्मद ने अपने बयान में कहा कि यह गलत है कि वहां कभी मंदिर था ,और उसे औरंगजेब ने तोड़ा था संपूर्ण ज्ञानवापी परिसर पर मुस्लिमों का यह तब से अधिकार है जबसे मस्जिद का निर्माण हुआ है, मस्जिद के पूर्व वहां दीन ए इलाही का इबादत खाना था, जो कब तोड़ा गया इसकी जानकारी मुझे नहीं है हिंदुओं द्वारा उस पर अपना अधिकार जताने की बात की है वह भी मुझे जानकारी में नहीं है, 7 अप्रैल 1937 को आगा मुनव्वर में बयान दिया कि संपूर्ण ज्ञान वापी की जमीन मस्जिद की है मेरे पूर्वज कहते हैं कि यह मस्जिद जहांगीर के समय की है, मैं नहीं जानता की मस्जिद को क्यों ज्ञानवापी कहा जाता है ,मैंने किसी को ऐसे ज्ञानवापी कहते नहीं सुना, मैं नहीं जानता कि कुएं को ज्ञानवापी कहते हैं, हिंदू लोग ग्रहण इत्यादि के अवसर पर आते हैं, और कुएं के चक्कर लगाते हैं,मैंने औरंगजेब के विषय में सुना है और उसने किसी मंदिर को नहीं तोड़ा केवल मंदिरों की संपत्ति को लूटा, 8 अप्रैल 1937 को मोहम्मद इकराम ने अपने बयान में कहा कि 1926 में वी एन मेहरा कलेक्टर थे उनके सामने एक मामला पीपल के पेड़ की कुछ टहनियों को काटने का आया, यह पेड़ मस्जिद के पूर्व में है, किंतु पेड़ की डालों को काटने का आदेश नहीं दिया गया क्योंकि पेड़ के नीचे मूर्तियां और टैंक जिसमें इसकी पत्तियां गिरती थी, के ऊपर टिन शेड बनवा दिया गया, पश्चिमी तरफ का अवशेष भाग अकबर के द्वारा बनवाया गया था ऐसा और सुना है साथ ही उसमें कोई प्रमाण हिंदू मंदिर के नहीं है क्योंकि मस्जिद के चार तक एक ही चार दिवारी है अतः संपूर्ण भूमि मुसलमानों की है ,19 मई 1937 को पुरातत्वविद डॉक्टर एएस अंल्टेकर ने अपने बयान में कहा कि तीनों पुराण अर्थात स्कंद पुराण लिंग पुराण ब्रह्मवैवर्त पुराण ज्ञानवापी के उत्तर में विश्वनाथ मंदिर की स्थिति मानते हैं तथा स्थली सेतु के उपरोक्त सभी उद्धरण उल्लिखित हैं जो 1580 में नारायण भट्ट द्वारा लिखी गई थी नारायण भट्ट स्थान पूजा महात्मा भी लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि किसी स्थान से देव प्रतिमा खंडित हो जाए या कोई स्थान प्रतिमा विहीन हो जाए तो भी उस स्थान का महत्व कम नहीं होता अतः जब तक गति का स्थायित्व हो स्थान पूजा करते रहना चाहिए, इसे स्पष्ट हो जाता है कि नारायण भट्ट ने मंदिर उसी स्थल पर बनवाया जहां पूर्व में था आधुनिक बनारस के निर्माता जॉर्ज प्रिंसेप द्वारा भी जो बातें काशी विश्वनाथ के संबंध में की गई तथा नक्शा बनाया गया वह भी सत्यता और तथ्यों पर ही आधारित था,
लम्बी एवं ऐतिहासिक प्रमाणों व शास्त्रों के आधार पर यह दावा गलत पाया गया और 24 अगस्त 1937 को मुस्लिम पक्ष के वाद खारिज कर दिया गया। न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि तथ्यों के अनुसार अकबर ने किसी भी प्रकार का कोई इबादत खाना बनारस में नहीं बनवाया था, उसने केवल एक इबादत खाना फतेहपुर सीकरी में बनवाया था ,यह कहना कि मस्जिद का निर्माण शाहजहां के समय में हुआ था, वह औरंगजेब ने इसकी केवल मरम्मत कराई थी, वह गलत है ऐसा तथ्य कहते हैं मंदिर की शैली मुस्लिम पूर्व की शैली है यह कहते हुए विद्वान जज ने कहा कि मस्जिद के पश्चिम भाग पर स्थित दीवाल के दरवाजे पूर्णतया सिद्ध करते हैं, कि वहां पूर्व में एक हिंदू मंदिर था, मंदिर के दरवाजे पर स्थित चित्रण के संबंध में इतिहासकारों का कहना है कि यह मुस्लिम पूर्वजों के पूर्व की शैली है, यद्यपि यह की मुस्लिम काल में इस शैली को बढ़ावा मिला किंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मुस्लिमों द्वारा अपनाई गई शैली को हिंदू नहीं अपना सकते, अपने बयानों में मुस्लिमों ने कभी इस स्थान को इबादत खाना कहा ,कभी मस्जिद कभी इस स्थान को दारा शिकोह का संस्कृत स्कूल बताया है ,तो कभी इसे औरंगजेब द्वारा निर्मित कभी इसे केवल उसके द्वारा मरम्मत कराया गया हुआ कहते हैं, अतः उनकी बातों में साम्यता नहीं है 1580 में लिखित तीर्थ स्थली सेतु के अनुसार विशेश्वर का लिंग वापी के उत्तर की तरफ था, और मुस्लिमों द्वारा मंदिर को तोड़ दिए जाने और यदि लिंग को भी अपने स्थान से हटा दिया जाता है तो भी स्थान महात्म्य के अनुसार उस स्थान की पूजा और परिक्रमा करनी चाहिए, ज्ञानवापी परिसर की चारों तरफ की दीवार मस्जिद की अपेक्षा पुरानी है, और वह लगभग अकबर के समय काल की है और यह कहीं से भी मस्जिद से मेल नहीं खाती मस्जिद के पश्चिम भाग में स्थित मंदिर की दीवाल में स्थित पान की पर्ची की तरह के आकार के मेहराब के विषय में यह कहना कि वह मुस्लिमों की शैली है और यह गलत है क्योंकि मान सिंह द्वारा मथुरा के वृंदावन में बनवाए गए गोविंद देव जी के मंदिर के भी वैसे ही डिजाइन है अतः से मुस्लिम शैली कहना उचित नहीं है यह मस्जिद काफी जल्दी में बनाई गई है, इसका पश्चिम भाग इस बात का प्रमाण है अतः यह कहना भी गलत है कि संपूर्ण परिसर मस्जिद का है क्योंकि मस्जिद ही जब ठीक से नहीं बन पाई तो परिसर को परिवर्तित करना संभव नहीं दिखता, मस्जिद के खंभों दीवाल पत्थर खंभों का चित्र सभी पुराने भवन मंदिर के ही हैं, यह संभव है कि कुछ पुराने मंदिर का कुछ अंश अति प्राचीन मंदिर का हिस्सा हो और अति प्राचीन मंदिर के कुछ पत्थरों का उपयोग इसमें किया गया हो ऐसा पीछे की दीवार को देखने से लगता है एम ए शेरिंग के अनुसार औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात सदैव हिंदुओं से इस परिसर को लेकर हर समय झगड़े होते रहते हैं शेरिंग कहते हैं कि मैंने यह निरीक्षण किया है कि मस्जिद में उपयोग किए गए पत्थरों पर त्रिकोण व स्वास्थ्य की आकृतियां हैं दक्षिणी सीढ़ियों के पत्थरों पर नागरी प्राकृत भाषा में कुछ बातें उल्लिखित हैं ,जिसकी एक फोटो यहां जमा है, लेकिन उन बातों को स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सका है फिर भी यदि निश्चित है कि मस्जिद की पूर्व का भवन गैर मुस्लिम संभवतः हिंदुओं का है 16 फरवरी 1935 में मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि मुस्लिमों को मस्जिद के बाहर नमाज अदा करने का कोई अधिकार नहीं है और भविष्य में पुलिस का यह दायित्व है कि वह संख्या से अधिक मुस्लिमों को अन्य मस्जिद की तरफ भेजें, विभिन्न तथ्यों के द्वारा यह सुनिश्चित है कि उत्तर पश्चिम भाग में 1943 तक वीरभद्रेश्वर की मूर्ति थी, 1899 तक उत्तर तक अभी मुक्तेश्वर का स्थान था, पूर्व की तरफ बिल्कुल मस्जिद के नजदीक एक पीपल का पेड़ है जिसके नीचे कुछ मूर्तियां हैं और मेरी जानकारी के अनुसार यह पीपल का पेड़ अति प्राचीन है, शायद यह मस्जिद से भी पुराना हो सकता है और पीपल का वृक्ष आमिर अली ने 822 के पैरा के अनुसार मुसलमान अपनी मस्जिद के अगल-बगल नहीं लगाते ,अतः वह वृक्ष हिंदुओं द्वारा ही रोपा गया होगा,न्यायाधीश महोदय ने आगे लिखा है कि मेरा निष्कर्ष यह है कि खंडहर को देखने से लगता है कि वहां मस्जिद बनाने के पूर्व एक मंदिर था ,और इस तथ्य को लगभग सभी इतिहासकारों द्वारा स्वीकार किया गया है, ज्ञानवापी कुए का अस्तित्व निश्चित रूप से यह सिद्ध करता है कि कुएं के उत्तर में जो मंदिर था वह विश्वनाथ का मंदिर था, अतः इस वाद में यह कहना आवश्यक है कि वह एक हिंदू मंदिर था, चारदीवारी मस्जिद से पुरानी है वह लगभग अकबर काल की है अतः मंदिर निश्चित ही अकबर के समय काल में कराया गया होगा शायद उसके लिए सामान्य अनुमति भी ली गई है पश्चिम तरफ के खंडहर प्रतिवादी की संपत्ति है यह आश्चर्य है कि 350 वर्षो से वह खंडार वहां अभी स्थित है, यह भी सत्य है कि मंदिर को औरंगजेब के 16 अप्रैल 1669 के फरमान के अंतर्गत तोड़ा गया ,जिसका उद्देश्य वहां मूर्तिपूजकओं के अध्यापन व पूजन को रोकने के लिए किया गया था, केवल ध्वस्तीकरण राजा के प्रतिनिधियों को जब व्यर्थ समझ में आया तो उन्होंने सोचा कि वहां मस्जिद बना दी जाए, मस्जिद बन जाने के कारण वहां पुनः मंदिर निर्माण का अवसर ही नहीं आया, इसी प्रकार से बनारस में और बहुत सी मस्जिदें हैं जो हिंदू मंदिरों के स्थानों पर और उनके मलबों से बनी हुई हैं कुछ इतिहासकारों का कहना है कि औरंगजेब ने अवशेष भाग को इसलिए छोड़ दिया, कि हिंदू भविष्य में यह समझें कि उसका दमन उसके अर्थात औरंगजेब के हाथों हुआ था ,औरंगजेब स्वयं 1705 तक जीवित था और उसने इस अवशेषों को कभी साफ करने का प्रयास नहीं किया, इससे लगता है कि यह एक राजनीतिक व्यवस्था थी जिससे हिंदुओं की बेइज्जती हो, अथवा यह कार्य तात्कालिक सरकार द्वारा धरोहर को सुरक्षित करने के रूप में किया गया हो सकता है, उत्तर दिशा स्थित अभी मुक्तेश्वर मंदिर का पूजन व्यास परिवार करता है जिस पर मुस्लिमों को कभी आपत्ति नहीं हुई, साथ ही उत्तर पश्चिम तरफ नमाज पढ़ना मुस्लिमों का अधिकार बनता है ऐसा सिद्ध नहीं कर सके, अगला प्रश्न उठता है कि क्या मस्जिद का निर्माण नियमत: सही है निश्चय ही मुस्लिमों के नियमों के अनुसार यह सही नहीं है ,मूर्तियों के नष्ट करने के मुस्लिम नियमो के अनुसार मंदिर को ध्वस्त करना तो सही है, लेकिन उक्त मंदिर की भूमि का प्रयोग करना नियम अनुसार गलत है, साथ ही नियम यह भी कहता है कि दूसरे की जमीन पर बिना उसकी अनुमति के नमाज पढ़ना भी गलत है, अतः जो तथ्य मेरे सामने हैं उसके आधार पर मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि मस्जिद का निर्माण व उसमें नमाज पढ़ना गलत है, 24 अगस्त 1937 ईस्वी को मुस्लिमों के वाद को खारिज कर दिया गया और पूर्व की स्थिति को बहाल कर दिया गया ,तब मुसलमानों द्वारा हाईकोर्ट इलाहाबाद में अपील संख्या 466 की गई, जिसे 1942 में हाईकोर्ट इलाहाबाद द्वारा खारिज कर दिया गया शेष अगले अंक में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
MCOM,LLB,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
प्लीज डू नॉट कट पेस्ट एंड कॉपी ओनली शेयर
जब कोर्ट में मुस्लिम पक्ष का दावा हुआ था बहिष्कृत
मनीष पाण्डेय
चाहे वह राम जन्मभूमि का मामला हो अथवा कृष्ण जन्मभूमि का या फिर काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का या फिर उन सभी मंदिरों का जिन्हें मुस्लिम आक्रांता ओं द्वारा ध्वस्त कर वहां पर मस्जिद का निर्माण करवा दिया गया कालांतर में जब इन जगहों पर हिंदुओं द्वारा दावा ठोका गया, तो वह साक्ष्य सबूत पूरी तरह से खुलकर सामने आ गए, जिन्हें मुस्लिम आक्रांता द्वारा इतिहास के पन्नों के पीछे दबा दिया था, और उसी आधार पर राम जन्मभूमि का ऐतिहासिक निर्णय भी हुआ, आगे जो लड़ाई काशी विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा कृष्ण जन्म भूमि के लिए लड़ी जा रही हैं निश्चित रूप से उसका भी ऐतिहासिक निर्णय न्यायालय द्वारा ही होगा, काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर के मामले में पहला मुकदमा
11 अगस्त, 1936 को दीन मुहम्मद, मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद जकारिया ने स्टेट इन काउन्सिल में प्रतिवाद संख्या-62 दाखिल किया और दावा किया कि जो भूमि संख्या 9130 है सम्पूर्ण परिसर वक्फ की सम्पत्ति
है। इसीलिए उस पर मुस्लिमों के अधिकार को मानते हो वहां पर नमाज पढ़ना उनका अधिकार है, 6 अप्रैल 1937 को दीन मोहम्मद ने अपने बयान में कहा कि यह गलत है कि वहां कभी मंदिर था ,और उसे औरंगजेब ने तोड़ा था संपूर्ण ज्ञानवापी परिसर पर मुस्लिमों का यह तब से अधिकार है जबसे मस्जिद का निर्माण हुआ है, मस्जिद के पूर्व वहां दीन ए इलाही का इबादत खाना था, जो कब तोड़ा गया इसकी जानकारी मुझे नहीं है हिंदुओं द्वारा उस पर अपना अधिकार जताने की बात की है वह भी मुझे जानकारी में नहीं है, 7 अप्रैल 1937 को आगा मुनव्वर में बयान दिया कि संपूर्ण ज्ञान वापी की जमीन मस्जिद की है मेरे पूर्वज कहते हैं कि यह मस्जिद जहांगीर के समय की है, मैं नहीं जानता की मस्जिद को क्यों ज्ञानवापी कहा जाता है ,मैंने किसी को ऐसे ज्ञानवापी कहते नहीं सुना, मैं नहीं जानता कि कुएं को ज्ञानवापी कहते हैं, हिंदू लोग ग्रहण इत्यादि के अवसर पर आते हैं, और कुएं के चक्कर लगाते हैं,मैंने औरंगजेब के विषय में सुना है और उसने किसी मंदिर को नहीं तोड़ा केवल मंदिरों की संपत्ति को लूटा, 8 अप्रैल 1937 को मोहम्मद इकराम ने अपने बयान में कहा कि 1926 में वी एन मेहरा कलेक्टर थे उनके सामने एक मामला पीपल के पेड़ की कुछ टहनियों को काटने का आया, यह पेड़ मस्जिद के पूर्व में है, किंतु पेड़ की डालों को काटने का आदेश नहीं दिया गया क्योंकि पेड़ के नीचे मूर्तियां और टैंक जिसमें इसकी पत्तियां गिरती थी, के ऊपर टिन शेड बनवा दिया गया, पश्चिमी तरफ का अवशेष भाग अकबर के द्वारा बनवाया गया था ऐसा और सुना है साथ ही उसमें कोई प्रमाण हिंदू मंदिर के नहीं है क्योंकि मस्जिद के चार तक एक ही चार दिवारी है अतः संपूर्ण भूमि मुसलमानों की है ,19 मई 1937 को पुरातत्वविद डॉक्टर एएस अंल्टेकर ने अपने बयान में कहा कि तीनों पुराण अर्थात स्कंद पुराण लिंग पुराण ब्रह्मवैवर्त पुराण ज्ञानवापी के उत्तर में विश्वनाथ मंदिर की स्थिति मानते हैं तथा स्थली सेतु के उपरोक्त सभी उद्धरण उल्लिखित हैं जो 1580 में नारायण भट्ट द्वारा लिखी गई थी नारायण भट्ट स्थान पूजा महात्मा भी लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि किसी स्थान से देव प्रतिमा खंडित हो जाए या कोई स्थान प्रतिमा विहीन हो जाए तो भी उस स्थान का महत्व कम नहीं होता अतः जब तक गति का स्थायित्व हो स्थान पूजा करते रहना चाहिए, इसे स्पष्ट हो जाता है कि नारायण भट्ट ने मंदिर उसी स्थल पर बनवाया जहां पूर्व में था आधुनिक बनारस के निर्माता जॉर्ज प्रिंसेप द्वारा भी जो बातें काशी विश्वनाथ के संबंध में की गई तथा नक्शा बनाया गया वह भी सत्यता और तथ्यों पर ही आधारित था,
लम्बी एवं ऐतिहासिक प्रमाणों व शास्त्रों के आधार पर यह दावा गलत पाया गया और 24 अगस्त 1937 को मुस्लिम पक्ष के वाद खारिज कर दिया गया। न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि तथ्यों के अनुसार अकबर ने किसी भी प्रकार का कोई इबादत खाना बनारस में नहीं बनवाया था, उसने केवल एक इबादत खाना फतेहपुर सीकरी में बनवाया था ,यह कहना कि मस्जिद का निर्माण शाहजहां के समय में हुआ था, वह औरंगजेब ने इसकी केवल मरम्मत कराई थी, वह गलत है ऐसा तथ्य कहते हैं मंदिर की शैली मुस्लिम पूर्व की शैली है यह कहते हुए विद्वान जज ने कहा कि मस्जिद के पश्चिम भाग पर स्थित दीवाल के दरवाजे पूर्णतया सिद्ध करते हैं, कि वहां पूर्व में एक हिंदू मंदिर था, मंदिर के दरवाजे पर स्थित चित्रण के संबंध में इतिहासकारों का कहना है कि यह मुस्लिम पूर्वजों के पूर्व की शैली है, यद्यपि यह की मुस्लिम काल में इस शैली को बढ़ावा मिला किंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मुस्लिमों द्वारा अपनाई गई शैली को हिंदू नहीं अपना सकते, अपने बयानों में मुस्लिमों ने कभी इस स्थान को इबादत खाना कहा ,कभी मस्जिद कभी इस स्थान को दारा शिकोह का संस्कृत स्कूल बताया है ,तो कभी इसे औरंगजेब द्वारा निर्मित कभी इसे केवल उसके द्वारा मरम्मत कराया गया हुआ कहते हैं, अतः उनकी बातों में साम्यता नहीं है 1580 में लिखित तीर्थ स्थली सेतु के अनुसार विशेश्वर का लिंग वापी के उत्तर की तरफ था, और मुस्लिमों द्वारा मंदिर को तोड़ दिए जाने और यदि लिंग को भी अपने स्थान से हटा दिया जाता है तो भी स्थान महात्म्य के अनुसार उस स्थान की पूजा और परिक्रमा करनी चाहिए, ज्ञानवापी परिसर की चारों तरफ की दीवार मस्जिद की अपेक्षा पुरानी है, और वह लगभग अकबर के समय काल की है और यह कहीं से भी मस्जिद से मेल नहीं खाती मस्जिद के पश्चिम भाग में स्थित मंदिर की दीवाल में स्थित पान की पर्ची की तरह के आकार के मेहराब के विषय में यह कहना कि वह मुस्लिमों की शैली है और यह गलत है क्योंकि मान सिंह द्वारा मथुरा के वृंदावन में बनवाए गए गोविंद देव जी के मंदिर के भी वैसे ही डिजाइन है अतः से मुस्लिम शैली कहना उचित नहीं है यह मस्जिद काफी जल्दी में बनाई गई है, इसका पश्चिम भाग इस बात का प्रमाण है अतः यह कहना भी गलत है कि संपूर्ण परिसर मस्जिद का है क्योंकि मस्जिद ही जब ठीक से नहीं बन पाई तो परिसर को परिवर्तित करना संभव नहीं दिखता, मस्जिद के खंभों दीवाल पत्थर खंभों का चित्र सभी पुराने भवन मंदिर के ही हैं, यह संभव है कि कुछ पुराने मंदिर का कुछ अंश अति प्राचीन मंदिर का हिस्सा हो और अति प्राचीन मंदिर के कुछ पत्थरों का उपयोग इसमें किया गया हो ऐसा पीछे की दीवार को देखने से लगता है एम ए शेरिंग के अनुसार औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात सदैव हिंदुओं से इस परिसर को लेकर हर समय झगड़े होते रहते हैं शेरिंग कहते हैं कि मैंने यह निरीक्षण किया है कि मस्जिद में उपयोग किए गए पत्थरों पर त्रिकोण व स्वास्थ्य की आकृतियां हैं दक्षिणी सीढ़ियों के पत्थरों पर नागरी प्राकृत भाषा में कुछ बातें उल्लिखित हैं ,जिसकी एक फोटो यहां जमा है, लेकिन उन बातों को स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सका है फिर भी यदि निश्चित है कि मस्जिद की पूर्व का भवन गैर मुस्लिम संभवतः हिंदुओं का है 16 फरवरी 1935 में मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि मुस्लिमों को मस्जिद के बाहर नमाज अदा करने का कोई अधिकार नहीं है और भविष्य में पुलिस का यह दायित्व है कि वह संख्या से अधिक मुस्लिमों को अन्य मस्जिद की तरफ भेजें, विभिन्न तथ्यों के द्वारा यह सुनिश्चित है कि उत्तर पश्चिम भाग में 1943 तक वीरभद्रेश्वर की मूर्ति थी, 1899 तक उत्तर तक अभी मुक्तेश्वर का स्थान था, पूर्व की तरफ बिल्कुल मस्जिद के नजदीक एक पीपल का पेड़ है जिसके नीचे कुछ मूर्तियां हैं और मेरी जानकारी के अनुसार यह पीपल का पेड़ अति प्राचीन है, शायद यह मस्जिद से भी पुराना हो सकता है और पीपल का वृक्ष आमिर अली ने 822 के पैरा के अनुसार मुसलमान अपनी मस्जिद के अगल-बगल नहीं लगाते ,अतः वह वृक्ष हिंदुओं द्वारा ही रोपा गया होगा,न्यायाधीश महोदय ने आगे लिखा है कि मेरा निष्कर्ष यह है कि खंडहर को देखने से लगता है कि वहां मस्जिद बनाने के पूर्व एक मंदिर था ,और इस तथ्य को लगभग सभी इतिहासकारों द्वारा स्वीकार किया गया है, ज्ञानवापी कुए का अस्तित्व निश्चित रूप से यह सिद्ध करता है कि कुएं के उत्तर में जो मंदिर था वह विश्वनाथ का मंदिर था, अतः इस वाद में यह कहना आवश्यक है कि वह एक हिंदू मंदिर था, चारदीवारी मस्जिद से पुरानी है वह लगभग अकबर काल की है अतः मंदिर निश्चित ही अकबर के समय काल में कराया गया होगा शायद उसके लिए सामान्य अनुमति भी ली गई है पश्चिम तरफ के खंडहर प्रतिवादी की संपत्ति है यह आश्चर्य है कि 350 वर्षो से वह खंडार वहां अभी स्थित है, यह भी सत्य है कि मंदिर को औरंगजेब के 16 अप्रैल 1669 के फरमान के अंतर्गत तोड़ा गया ,जिसका उद्देश्य वहां मूर्तिपूजकओं के अध्यापन व पूजन को रोकने के लिए किया गया था, केवल ध्वस्तीकरण राजा के प्रतिनिधियों को जब व्यर्थ समझ में आया तो उन्होंने सोचा कि वहां मस्जिद बना दी जाए, मस्जिद बन जाने के कारण वहां पुनः मंदिर निर्माण का अवसर ही नहीं आया, इसी प्रकार से बनारस में और बहुत सी मस्जिदें हैं जो हिंदू मंदिरों के स्थानों पर और उनके मलबों से बनी हुई हैं कुछ इतिहासकारों का कहना है कि औरंगजेब ने अवशेष भाग को इसलिए छोड़ दिया, कि हिंदू भविष्य में यह समझें कि उसका दमन उसके अर्थात औरंगजेब के हाथों हुआ था ,औरंगजेब स्वयं 1705 तक जीवित था और उसने इस अवशेषों को कभी साफ करने का प्रयास नहीं किया, इससे लगता है कि यह एक राजनीतिक व्यवस्था थी जिससे हिंदुओं की बेइज्जती हो, अथवा यह कार्य तात्कालिक सरकार द्वारा धरोहर को सुरक्षित करने के रूप में किया गया हो सकता है, उत्तर दिशा स्थित अभी मुक्तेश्वर मंदिर का पूजन व्यास परिवार करता है जिस पर मुस्लिमों को कभी आपत्ति नहीं हुई, साथ ही उत्तर पश्चिम तरफ नमाज पढ़ना मुस्लिमों का अधिकार बनता है ऐसा सिद्ध नहीं कर सके, अगला प्रश्न उठता है कि क्या मस्जिद का निर्माण नियमत: सही है निश्चय ही मुस्लिमों के नियमों के अनुसार यह सही नहीं है ,मूर्तियों के नष्ट करने के मुस्लिम नियमो के अनुसार मंदिर को ध्वस्त करना तो सही है, लेकिन उक्त मंदिर की भूमि का प्रयोग करना नियम अनुसार गलत है, साथ ही नियम यह भी कहता है कि दूसरे की जमीन पर बिना उसकी अनुमति के नमाज पढ़ना भी गलत है, अतः जो तथ्य मेरे सामने हैं उसके आधार पर मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि मस्जिद का निर्माण व उसमें नमाज पढ़ना गलत है, 24 अगस्त 1937 ईस्वी को मुस्लिमों के वाद को खारिज कर दिया गया और पूर्व की स्थिति को बहाल कर दिया गया ,तब मुसलमानों द्वारा हाईकोर्ट इलाहाबाद में अपील संख्या 466 की गई, जिसे 1942 में हाईकोर्ट इलाहाबाद द्वारा खारिज कर दिया गया शेष अगले अंक में
आपका ही
अधिवक्ता मनीष पांडेय
MCOM,LLB,MBA (HR)
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प्लीज डू नॉट कट पेस्ट एंड कॉपी ओनली शेयर
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