काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 8

काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर विध्वंस श्रंखला भाग 8
मंदिर निर्माण में, और बनारस में अपना अमूल्य योगदान देने राजा टोडरमल, राजा पटणीमल, और जेम्स प्रिंसेप
मनीष पाण्डेय
मुगल आक्रांता ओं द्वारा न जाने कितनी बार काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर का विध्वंस किया गया मुगल आक्रांता कुतुबुद्दीन ऐबक से प्रारंभ हुआ यह विध्वंस औरंगजेब पर आकर रुका ऐसा नहीं है किस विध्वंस में सृजन नहीं हो रहा था जहां एक और मुगल आक्रांता इस मंदिर का बार-बार विध्वंस कर रहे थे वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे हिंदू वीर भी थे जो बार-बार इस मंदिर का सृजन भी कर रहे थे, ऐसी दानवीर भी थे जिन्होंने अपनी थैलियां इस मंदिर के लिए खोल दी थी, इस कड़ी में सर्वप्रथम नाम आता है राजा टोडरमल का 1 जनवरी 1503 को पैदा हुए राजा टोडरमल मुगल शासन काल में अपने गुरु के कारण शहजाद और अवनी राय की बारी सम्मानित किया गया था एक धर्म प्राण अपने धर्म पर अधिक रहने वाले रायपुर अमन को राजा की उपाधि प्रदान की गई थी 8 नवंबर 1589 को उनकी हत्या उन्हीं के सजातीय द्वारा कर दी गई थी, बनारस के मुगलकालीन धार्मिक इतिहास में सबसे प्रसिद्ध घटना अकबर के राज्य काल में मंदिर की पुनर्रचना है विश्वनाथ का मंदिर शारकी अथवा सिकंदर लोदी के समय तोड़ा गया था ऐसा माना जाता है विश्वनाथ के मंदिर को पुनः गिराए जाने का उल्लेख नारायण भट्ट ने अपनी पुस्तक त्रिस्थली केतु देश का वर्णन करते हुए लिखा है कि नारायण भट्ट और राजा टोडरमल द्वारा काशी विश्वनाथ के मंदिर का पुनः निर्माण करवाया गया था इसी प्रकार डॉ एस भट्ट ने अपनी पुस्तक दान हरावली में भी कहा है कि" श्री रामेश्वरसूरि सुनुर भवन्नारायणोख्यो महान येना कार्य विमुक्तकै सुविधिना विशेश्वर स्थापना" अर्थात रामेश्वर भट्ट के पुत्र नारायण भट्ट ने अविमुक्त क्षेत्र वाराणसी में विधिपूर्वक विशेश्वर की स्थापना की- इंडिया ऑफिस कैटलॉग ऑफ संस्कृतम् मेनस्क्रिप्ट्स
इस संबंध में डॉ आईटी कर कहते हैं कि टोडरमल की सहायता से नारायण भट्ट ने 1585 ईसवी के करीब यह मंदिर निर्माण का कार्य संपादित किया था बताते हैं कि 15 80 में नारायण भट्ट को इस मंदिर बनाने के लिए राजा टोडरमल ने प्रेरित किया था, प्राचीन मंडप में पांच मंडप थे इनमें से पूर्व की ओर पांचवें मंडप की नाप 125 ×35 फुट थी, इसी रंग महल के नाम से जाना जाता था इस रंग महल में धार्मिक उपदेश और प्रवचन हुआ करते थे राजा टोडरमल लेकिन मन डिपो की मरम्मत करवाई थी मंदिर की कुर्सी 7 फुट ऊंची थी जो कि सड़क के बराबर कर दी गई थी मुसलमानों के डर से मंदिर की मूर्तियों को खोदा नहीं गया था, 19वीं शताब्दी का विश्वनाथ मंदिर चौखटा था इसकी प्रत्येक भुजा 124 फुट थी मुख्य मंदिर बीच में 32 फुट के मुरब्बे के जलधारी के अंदर था, गर्भ गृह में सटे हुए 16 ×10 फुट के चार अंतर ग्रह थे इसके बाद 12 ×8 के छोटे अंतर्गह रहे थे जो 4 मिनट में जाते थे पूरब और पश्चिम मंडल में दंड पानी और द्वारपालों के मंदिर थे उनकी मूर्तियां आलो अथवा ताखो में स्थित थी - इतिहास संग्रह बनारस 1908
राय पटनीमल एक बड़े बैंकर व व्यापारी थे ,जिनका जन्म 1770 जून को हुआ था मुगल साम्राज्य द्वारा पटनीमल को राय की उपाधि दी गई थी, राजा पत्नीमल को राजा की उपाधि किस तरह मिली इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है जेम्स प्रिंसेप जिन्हें आधुनिक बनारस का जन्मदाता माना जाता है ने राय पटनीमल जो कि एक बड़े दानवीर के रूप में चर्चित थे उन्हें कर्मनाशा पुल को बनाने की जिम्मेदारी दी थी तब राय पटनीमल्ल ने ₹100000 की लागत से उस पुल का निर्माण किया था जब लॉर्ड विलियम बैटिंग उस पुल से होकर गुजरा तो पुल को देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ और उसने राय पटनीमल को राजा की उपाधि देते हुए सम्मानित किया था यह राजा पटनी वही है जिन्होंने मथुरा स्थित कृष्ण जन्मभूमि को नीलामी में ईस्ट इंडिया कंपनी से खरीद लिया था बाद में राजा पत्नीमल के वंशजों से जुगल किशोर बिरला ने खरीदा था सवाल यह है कि राजा पटनीमल ने काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी क्या कोई रणनीति बनाई थी फिलहाल ये इतिहास के गर्भ में है क्योंकि जिस तरह महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, राजा पटनीमल का संबंध मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि से जुड़ा था जो रणनीति थी वही रणनीति कहीं ना कहीं राजा पटनीमल द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी कार्य कर रही थी, कालांतर में वही रणनीति महामना द्वारा भी किया जा रहा था, मेरी जानकारी के अनुसार इसका वर्णन जेम्स प्रिंसप अपने अपनी पुस्तकों में किया है, किंतु पुस्तके उपलब्ध ना होने के कारण उस इतिहास को मैं दर्ज नहीं कर पा रहा हूं राजा पटनीमल की मृत्यु 1844 ईस्वी में हुई थी, जेम्स प्रिंसेप का जन्म 20 अगस्त 1799 को इंग्लैंड में हुआ था जेम्स प्रिंसेप ने बनारस के लिए बहुत कुछ कार्य किया आधुनिक बनारस को बसाने के लिए उनके कार्य, योगदान है, जेम्स प्रिंसेप एक उच्च कोटि के चित्रकार भी थे, 1835 में चित्रित उनका काशी विश्वनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध चित्र काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मंदिर की सही दशा दर्शाने में एक महत्वपूर्ण कदम रखता है जेम्स प्रिंसेप ने काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में अपनी पुस्तकों में भी वर्णन किया है 22 अप्रैल 1840 को लंदन में जेम्स प्रिंसेप की मृत्यु विक्षिप्त अवस्था में हो गई थी विक्षिप्त अवस्था में भी वह सिर्फ बनारस बनारस और गंगा मां चिल्ला रहा था
आपका ही अधिवक्ता मनीष पांडेय
MCOM,LLB,MBA (HR)
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा

Comments

Popular posts from this blog

कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास भाग 3

इस्लाम और ईसाई पंथ की गंगोत्री है यहूदी पंथ भाग 1