कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास भाग 2

कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास( श्रंखला) भाग 2
अनेकों बार विध्वंस और पुनः निर्माण की साक्षी बनी है कृष्ण जन्मभूमि
मनीष पांडेय 
मथुरा जो कई बार उजड़ी और कई बार बसाई गई सर्वप्रथम मथुरा को मधु नामक दैत्य ने बसाया था कालांतर में जब मधु दैत्य के पुत्र लवणासुर ने मथुरा का शासन संभाला तो उसके कार्यकाल में नागरिक गण त्रस्त रहने लगे तब राजा राम के भाई शत्रुघ्न ने लवणासुर को मारकर मथुरा का पुनः निर्माण किया था, एक और तो मथुरा की वैभवता और समृद्धता ,अधर्मियो और विधर्मीयो,तथा लुटेरों को हमेशा खटकती रहती थी, वहीं दूसरी ओर कृष्ण जन्मभूमि होने के कारण भी इस्लामिक दुराआत्माएं, उस पर कब्जा करने के उद्देश्य से निरंतर प्रयत्नशील रहती थी  उनकी मंशा मंदिर को ध्वस्त करके, उसकी संपत्ति को लूट कर उस पर कब्जा करके मस्जिदों का निर्माण करने के लिए प्रयत्नशील रहा करती थी मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा कृष्ण जन्म भूमि को तीन बार अलग-अलग कालखंड में तोड़ा गया था पहली बार महमूद गजनवी द्वारा दूसरी बार सिकंदर लोदी द्वारा और तीसरी बार औरंगजेब द्वारा, हुण और कुषाण द्वारा भी कृष्ण जन्मभूमि को नष्ट किए जाने के भी प्रमाण मिलते हैं किंतु मुस्लिम आतताइयों द्वारा यह तीन तोड़ी गई इसके प्रमाण स्पष्ट प्रमुख रूप से मौजूद हैं, इतिहास हमें यह बताता है कि भगवान कृष्ण जब परलोक गमन वासी हो गए तो उनके प्रपौत्र व्रजनाभ का राजतिलक अर्जुन के कहने पर अभिमन्यु पुत्र राजा परीक्षित द्वारा किया गया था कालांतर में महाराजा व्रजनाभ द्वारा कृष्ण जन्मभूमि के मंदिर का निर्माण करवाया गया, इतिहास हमें यह भी बतलाता है कि शोडास के समय की कौन्तेय (अर्जुनायन) जाट राजा अरलिक वासु कौन्तेय का एक लेख जो सिरदल पर ब्राह्मी लिपि द्वारा लिखा गया है मथुरा छावनी पर कुए पर मिली थी जो प्रारंभ में केशव देव कटरा मंदिर पर खुदा हुआ था इसके शुरू की पांच पंक्तियाँ नष्ट हो चुकी है शेष लेख इस प्रकार है - 
वसुना कौन्तेय भगवतो वासुदेवस्य महास्थाने चतु: शालं तोरण वे 
दिका प्रति ष्ठापिता प्रीतो भवतु वासु देव : स्वमिस्य महाक्षत्र पस्य 
शोदसस्य सम्वते यातं|
अर्थ –महाक्षत्रप शोडास के शासनकाल में वसु कौन्तेय ने भगवान् वासुदेव कृष्ण के जन्म स्थान पर एक चतु शाला मंदिर के तोरण से सुसज्जित द्वार तथा वेदिका की स्थापना की, महाराजा व्रजनाभ के मंदिर बनाने के पश्चात अगले 400 वर्षों के काल क्रम में यह मंदिर पूरी तरह जीर्ण शीर्ण अवस्था में पहुंच गया और तब 400 वर्षों बाद गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने इसका पुनः जीर्णोद्धार/निर्माण करवाया अपनी यात्रा वृतांत ओं में चीनी यात्री हेनसांग ऑफ फाह्यान ने भी इसका वर्णन किया है, यहां चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का वर्णन जब चल ही रहा है तो कई दिलचस्प बातें प्रश्न अपने आप ही पैदा हो जाते हैं जिनका निराकरण किया जाना अत्यंत आवश्यक है जब भगवान श्री कृष्ण यदुवंशी थे तब उन्हें जाट राजा क्यों माना गया इसमें कोई शक नहीं है कि कृष्ण जन्म भूमि को मुक्त कराने हेतु अनेक जाट राजाओं ने न सिर्फ बलिदान दिया बल्कि समय-समय पर कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का पुनः निर्माण भी करवाया है यदुवंश और जाट का यह परस्पर मेल और श्रीकृष्ण को अपना अपना पूर्वज मानने का दावा और उसकी ऐतिहासिकता पर किसी अन्य लेख में वर्णन करूंगा फिलहाल यहां यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि यदुवंशी और जाट समुदाय दोनों ही भगवान श्री कृष्ण को अपना पूर्वज मानकर निरंतर कार्य करता हुआ आया है इतिहासकार अलबरूनी निधि भगवान कृष्ण को जाट राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया है, ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि  कुछ अन्य पंथो जिसमें बौद्ध पंथ प्रमुख रूप से है उसने तो भगवान कृष्ण के अस्तित्व को मानने से ही मना कर दिया है  और कनिष्क को ही  कंस के रूप में प्रतिष्ठित कर डाला है अब अगर कंस ही कनिष्क है तो भगवान कृष्ण क्या हुए इस बात को आसानी से समझा जा सकता है इस प्रकार के भटकाव संदेहो, का उत्तर फिर कभी खोजने की कोशिश करूंगा फिलहाल यह जान लेना  आवश्यक है कि 1017 ईस्वी में महमूद गजनवी ने चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा बनाए गए कृष्ण जन्मभूमि के मंदिर को ध्वस्त कर दिया खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है कि 1150 ई. में राजा विजयपाल देव के शासनकाल के दौरान जाजन सिंह जिन्हें जण्ज या जज्ज भी कहा गया ने तीसरी बार कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का निर्माण करवाया,इनके वंशज आज जाजन पट्टी , नगला झींगा, नगला कटैलिया में निवास करते है।खुदाई में मिले संस्कृत के एक  संस्कृत शिलालेख से भी जाजन सिंह (जज्ज) के मंदिर बनाने का पता चलता है। शिलालेख के अनुसार मंदिर के व्यय के लिए दो मकान, छः दूकान और एक वाटिका भी दान दी गई दिल्ली के राजा के परामर्श से 14 व्यक्तियों का एक समूह बनाया गया जिसके प्रधान जाजन सिंह था। जाट शासक जाजन सिंह द्वारा बनवाए गए कृष्ण जन्मभूमि के मंदिर को 16 वीं शताब्दी में सिकंदर लोदी ने ध्वस्त कर दिया , 125 साल बाद जहांगीर के काल में अर्थात सन 1618 में ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव बुंदेला द्वारा श्री कृष्ण जन्म भूमि स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया 250 फीट ऊंची भव्य मंदिर के ऊपर स्थित स्वर्ण शिखरों को 56 किलोमीटर दूर आगरा से भी देखा जाता था यहां प्राप्त शिलालेख बताते हैं कि मंदिर के चारों ओर ऊंची ऊंची दीवारें थी मंदिर के दक्षिण पश्चिम में एक कुआं भी बनवाया था लोग बताते हैं कि मंदिर से पानी 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदिर परिसर में ही बने हुए फव्वारे को चलाया जाता था आज भी मंदिर परिसर में कुआं और फव्वारे के अवशेष विद्यमान हैं इतिहासकार बताते हैं कि उस समय इस मंदिर को बनाने का कुल खर्चा ₹33लाख आया था, औरंगजेब की सेना का इटालियन कमांडर लिकोलाओ मानूची ने अपने यात्रा वृतांत में इस मंदिर की भव्यता का वर्णन किया है सन 1627 में वीर सिंह जूदेव की मृत्यु हो गई,1662 में ही मुगल सम्राट औरंगजेब आदेश दिया था कि कटरा केशवपुर के पूर्व में एक मस्जिद का निर्माण किया जाए सन 1665 में ही औरंगजेब ने होली और दीपावली जैसे त्योहारों को मनाने से भी मना कर दिया था तथा यमुना के किनारे दाह संस्कार करने से भी मना कर दिया था,सन 1669 में औरंगजेब द्वारा पुनः मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया 13 फरवरी 1707 जाट राजा सूरजमल, जो इतिहास में एक बाहुबली राजा के रूप में प्रतिष्ठित है जिन्होंने मुगलों से जीवन पर्यंत युद्ध किया और एक स्वतंत्र हिंदू राज्य की स्थापना की उन्होंने चौथी बार इस कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का निर्माण करवाया, 1707 में ही औरंगजेब की मृत्यु हुई,•••••••••••••••••
शेष भाग अगले भाग में 
आपका ही मनीष पांडेय
अधिवक्ता 
राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू महासभा
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